Monday, December 5, 2022

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर फैसला सुरक्षित, सुप्रीम सवाल-एक ही दिन में कैसे फाइनल हुआ अरुण गोयल का नाम?

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केएम जोसेफ, अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार की 5 जजों वाली संविधान पीठ ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र मैकेनिज्म की मांग करने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। संविधान पीठ ने सभी पक्षों को 5 दिनों के भीतर 6 पेज तक का संक्षिप्त नोट दाखिल करने के लिए कहा है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति को लेकर संविधान पीठ नेकेंद्र सरकार से कई कड़े सवाल पूछे।

संविधान पीठ ने बुधवार (23 नवंबर) को केंद्र से चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज तलब किए थे। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को फिर सुनवाई हुई। केंद्र ने नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ी फाइल कोर्ट को सौंपी। इसे देखने के बाद संविधान पीठ ने कई सवाल पूछे। यह भी पूछा क‍ि अरुण गोयल का नाम एक ही द‍िन में कैसे फाइनल हो गया?

संविधान पीठ ने सवाल पूछा कि चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति के लिए कानून मंत्री द्वारा प्रधानमंत्री की मंजूरी के लिए भेजे गए चार नामों को शॉर्टलिस्ट करने के पीछे क्या मानदंड थे? पीठ ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र तंत्र की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की थी कि यह उचित होता अगर मामले की सुनवाई के दौरान नियुक्ति नहीं की जाती।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को सूचित किया था कि गोयल को गुरुवार को सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दी गई थी और उनकी नियुक्ति को दो दिनों के भीतर पक्का किया गया था। आज भारत के अटॉर्नी जनरल द्वारा पेश की गई फाइलों को देखने के बाद पीठ ने इस बात पर सवाल उठाए कि एक दिन के भीतर ही नियुक्ति क्यों की गई? पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि से यह भी पूछा कि एक व्यक्ति, जिसका कार्यकाल 6 वर्ष की अवधि का भी नहीं होगा उसे नियुक्त क्यों किया गया?

जस्टिस रस्तोगी ने कहा कि 15 मई को पद खाली हुआ, ऐसे में सरकार ने इस पर नियुक्ति के लिए जल्दबाजी क्यों की? उसी दिन क्लीयरेंस, उसी दिन नोटिफिकेशन, उसी दिन मंजूरी। फाइल 24 घंटे भी नहीं घूमी। यह तो बिजली की गति से भी तेज हुआ। जस्टिस ने कहा कि हम जानना चाहते हैं कि क्या व्यवस्था कायम है और प्रक्रिया ठीक काम कर रही है? डेटाबेस सार्वजनिक डोमेन में है और कोई भी इसे देख सकता है?

दरअसल गुरुवार को केंद्र सरकार ने संविधान पीठ को अरुण गोयल की निर्वाचन आयुक्त पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया से संबंधित फाइल सौंपी। सरकार ने कहा कि नियुक्ति की ओरिजिनल फाइल की प्रतियां पांचों जजों को दी गई हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने नियुक्ति के तरीके पर भी सवाल उठाए। जस्टिस अजय रस्तोगी ने इतनी तेजी से फाइल आगे बढ़ने और नियुक्ति करने पर सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा कि 24 घंटे के भीतर सारी जांच पड़ताल कैसे कर ली गई?

अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट से कहा कि फिलहाल वह बातों पर विराम दे और पूरे मामले की व्यापकता को देखें।

संविधान पीठ ने कहा कि 1985 बैच के आइएएस ऑफिसर ने वीआरएस लिया। बड़ी बात यह है कि मिनिस्ट्री ने फाइल क्लियर किया, उसके ठीक एक दिन पहले वीआरएस लिया। यानी, एक ही दिन में उनका फाइल क्लियर हो गया। लॉ मिनिस्ट्री ने चार नाम को शॉर्टलिस्ट किया और पीएम को रेफर किया और 24 घंटे के भीतर गोयल के नाम पर राष्ट्रपति की मुहर लग गई। संविधान पीठ ने कहा कि जिन नामों को लॉ मिनिस्टर ने चुना, उन्हें इस तरह से चुना जाना चाहिए था कि वह छह साल का कार्यकाल पूरा करता।

प्रशांत भूषण ने कहा कि गोयल की नियुक्ति से पहले उन्हें अपने पद से वीआरएस दिलाया गया और फिर दो दिनों के भीतर ही पिछले गुरुवार को उनकी नियुक्ति चुनाव आयुक्त के पद पर की गई।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जोसेफ ने कहा कि हम किसी व्यक्तिगत के खिलाफ कुछ नहीं कह रहे हैं। जिनकी नियुक्ति हुई है उनका एकेडमिक करियर बेहतरीन है। लेकिन हमें नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल है। 18 नवंबर को हमने सुनवाई शुरू की और उसी दिन आपने फाइल बढ़ाई और पीएम के पास फाइल गई और मंजूरी हो गई। ऐसी क्या अर्जेंसी थी। लिस्ट में चार नाम थे और ये चार नाम भेजे गए थे। हम यह जानना चाहते हैं कि आखिर नामों का चुनाव कैसे हुआ। जो सबसे यंग हैं, चारों में क्या उनकी सिफारिश हुई? आपने कैसे किसी का चयन किया? संविधान पीठ ने केंद्र की ओर से पेश दस्तावेज देखने के बाद कहा कि यह किस तरह का आंकलन है?

जस्टिस अजय रस्तोगी ने कहा कि कई बार जल्दीबाजी का कोई और कारण होता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि 15 मई को यह वेकेंसी हुई थी और 15 मई से लेकर 18 नवंबर के बीच आपने क्या किया? ऐसा क्या कारण था कि आपने एक दिन में सुपर फास्ट तरीके से नियुक्ति कर दी? एक ही दिन में प्रोसेस ऑन हुआ और उसी दिन क्लियरेंस हुआ, उसी दिन आवेदन और उसी दिन नियुक्ति। फाइल 24 घंटे भी नहीं चला यह तो लाइट की स्पीड से चला। हालांकि इस दौरान अटॉर्नी जनरल ने कहा कि सभी चुनाव आयुक्त की नियुक्ति ऐसे ही जल्दी में होती है। आमतौर पर तौर पर तीन दिन से ज्यादा वक्त नहीं लगता है।

संविधान पीठ ने सवाल किया कि सरकार बताए कि आखिर लॉ मिनिस्टर ने जिन चार नामों को शॉर्ट लिस्ट किया और नामों की सिफारिश पीएम को की, उसके पीछे क्राइटेरिया क्या रहा था? अटॉर्नी जनरल ने कहा कि शॉर्टलिस्ट वरीयता, रिटायरमेंट और चुनाव आयोग में कार्यकाल आदि को देखकर तय किया गया है। यह भी ध्यान में रखा गया है कि कार्यकाल छह साल का चुनाव आयोग में मिले।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि सरकार ने जिस नाम को चारों में फाइनल किया, उसे भी छह साल का कार्यकाल नहीं मिलेगा। आपको ऐसे लोगों को चुनना चाहिए जिन्हें छह साल का कार्यकाल मिले। यह एक्ट की धारा 6 कहती है। संविधान पीठ ने सवाल किया कि हम यह जानना चाहते हैं कि कैसे आप नाम तक पहुंचे। आपके डाटाबेस में ज्यादा यंग लोग भी हैं, हम आपसे यह जानना चाहते हैं कि क्या मैकेनिजम आपने एडॉप्ट किया हुआ है और क्या उम्र को फिल्टर करने का क्राइटेरिया है? अटॉर्नी जनरल ने कहा कि क्राइटेरिया जन्म तिथि और सीनिॉरिटी के आधार पर है।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि यानी छह साल का कार्यकाल नहीं मिलेगा। हम साफ करना चाहते हैं कि एक्ट के तहत आप सेक्शन छह का उल्लंघन कर रहे हैं। सेक्शन का महत्वपूर्ण पार्ट यह है कि छह साल का कार्यकाल हो।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि आज तक, केंद्र सरकार ने किसी को भी नियुक्त नहीं किया है, जिसे चुनाव आयुक्त के रूप में निर्धारित 6 वर्ष का कार्यकाल (कार्यालय संभालने के लिए 65 वर्ष की ऊपरी आयु सीमा) मिलता है। यह, याचिकाकर्ताओं के अनुसार, चुनाव आयोग को एक झटके में रखता है और संस्था की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि जब संविधान कहता है तो आप किसी को 6 साल से कम कैसे कर सकते हैं? चुनाव आयोग अब नौकरशाह से कैडर बन गया है। वरिष्ठता के आधार पर लोगों को नियुक्त किया जाता है। कानून पूरी तरह से अलग है। संसद ने कहा है कि आपको यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।यह 6 साल के कार्यकाल की सुरक्षा के लिए है। आपने 6 महीने के लिए एक आदमी को रखा। हमें नहीं लगता कि यह संस्था स्वतंत्र रह सकती है या सुरक्षित रह सकती है।

उन्होंने कहा कि बेंच इस खालीपन को भर सकती है। कोई कानून नहीं है। यदि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है, तो एक धारणा भी उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। प्रणाली को यथोचित रूप से स्वतंत्र होना चाहिए। मुझे न्यायपालिका के साथ इसकी तुलना करने दें। अदालत एक खालीपन ढूंढा और उसे भर दिया। अब अगर चुनाव आयोग में है तो उसे भी भरना चाहिए।

इस बीच कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उनके द्वारा की गई सभी नियुक्तियों और फैसलों में संविधान की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। कांग्रेस के मीडिया प्रमुख और प्रवक्ता पवन खेड़ा ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयुक्त के तौर पर अरुण गोयल की नियुक्ति में जल्दबाजी पर सवाल उठाने के बाद केंद्र पर तीखा हमला बोला।

पवन खेड़ा ने ट्वीट कर कहा कि यह कोई नई बात नहीं है। प्रधानमंत्री के फैसले विचार-विमर्श के बिना होते हैं।पवन खेड़ा ने ट्वीट में लिखा, “उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि नए मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति में जल्दबाजी की गई। यह कोई नई बात नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के लगभग सभी फैसलों और उनके द्वारा की जाने वाली नियुक्तियों में लोकतांत्रिक परिपाटी और संविधान का उल्लंघन होता रहा है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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