Subscribe for notification

अरावली में उजाड़े ग़रीबों के आशियाने; निजी यूनिवर्सिटी, स्कूल, आश्रम को बांटी वन क्षेत्र की भूमि

फरीदाबाद। हरियाणा के नेताओं ने फ़रीदाबाद में अरावली पहाड़ में वन क्षेत्र की ज़मीनों को न सिर्फ़ फ़ॉर्म हाउसों बल्कि प्राइवेट शिक्षण संस्थानों, आश्रमों, मंदिरों को लुटा डाला। अरावली के खोरी, लकड़पुर में नगर निगम फरीदाबाद (एमसीएफ) ने हाल ही में सैकड़ों गरीब मजदूर परिवारों को उजाड़ दिया, लेकिन इसी इलाके में अवैध रूप से कई शिक्षण संस्थान और मंदिर की अवैध बिल्डिंगों को छोड़ दिया गया। दस्तावेज बता रहे हैं कि हरियाणा में लागू पंजाब भूमि संरक्षण कानून (पीएलपीए) सन् 1900 की धज्जियां उड़ाकर मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट, अरावली इंटरनेशनल स्कूल, मॉडर्न विद्या निकेतन स्कूल को जमीन दी गई।

खोरी और लकड़पुर में गरीब मज़दूरों को उजाड़ते हुए एमसीएफ के अफसरों ने कहा था कि ये बस्तियां वन विभाग की जमीन पर अवैध रूप से बनी हैं, जिनमें पीएलपीए कानून को तोड़ा गया है। पीएलपीए जमीन पर बने इन अवैध शिक्षण संस्थानों के मामले को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका को स्वीकार कर लिया गया है। इस मामले में एमसीएफ के अलावा हरियाणा सरकार, हरियाणा वन विभाग और भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय को भी पार्टी बनाया गया है।

सरकारी जमीन पर शिक्षा के अवैध महल
अरावली में मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, मॉडर्न विद्या निकेतन (एमवीएन) स्कूल और अरावली इंटरनेशनल स्कूल की बिल्डिंगों को जिन लोगों ने देखा होगा, उन्हें लगा होगा कि इसके मालिकों ने बड़ी मेहनत से इन इमारतों को खड़ा किया होगा, लेकिन जिस जमीन पर ये भव्य इमारतें खड़ी हैं, उन्हें गलत ढंग से हासिल किया गया है। भजन लाल से लेकर देवीलाल, बंसीलाल, ओमप्रकाश चौटाला, भाजपा राज में इन ज़मीनों को लुटाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई बंधुआ मुक्ति मोर्चा की याचिका के साथ लगाए गए दस्तावेजों के जरिए इस संवाददाता ने मामले की जब पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी जिस जमीन पर है, उसका खसरा नंबर 35//1/2, 2, 3/1,8/2,9, 10/1, 11, 12, 19/2, 20, 36, 16/1 राजस्व क्षेत्र मेवला महाराजपुर है। एमवीएन स्कूल जिस जमीन पर है, उसका खसरा नंबर 37(62-16-17),38(11-1-19-20-2), 14(2) और राजस्व क्षेत्र मेवला महाराजपुर का गैर मुमकिन पहाड़ इसमें शामिल है। अरावली इंटरनेशनल स्कूल का खसरा नंबर 34(1-10-12), 35(4-5-6-7) राजस्व क्षेत्र मेवला महाराजपुर है। जिन जमीनों पर शिक्षा की इन इमारतों को खड़ा किया गया है, वहां पीएलपीए कानून की धारा 3, 4 और 5 लागू है।

पीएलपीए के सेक्शन 3.4 और 5 जहां लागू होते हैं, वह जगह वन क्षेत्र होता है और इसी के तहत इन जमीनों का मालिकाना हक वन विभाग हरियाणा सरकार के पास है। इन जमीनों पर न तो पेड़, पौधे काटे जा सकते हैं, न कोई निर्माण किया जा सकता है और न ही खनन हो सकता है।

यहां ये साफ कर देना ठीक होगा कि 2004 में पर्यावरणविद एमसी मेहता बनाम भारत सरकार के केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने इन जगहों को पीएलपीए के तहत यानी वन क्षेत्र माना था और इसी वजह से कांत एनक्लेव पर तोड़फोड़ की कार्रवाई हुई थी। कांत एनक्लेव भी पीएलपीए लैंड पर बना था। अरावली के अधिकांश फॉर्म हाउस पीएलपीए लैंड पर हैं। बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने अपनी याचिका के साथ उस ऐतिहासिक फैसले की कॉपी लगाई है। फैसले में कहा गया है कि हरियाणा सरकार की इस दलील को अदालत नामंजूर करती है कि पीएलपीए लैंड वन क्षेत्र नहीं है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने उसी समय अरावली और दिल्ली-फरीदाबाद सीमा के पांच किलोमीटर क्षेत्र में बोरिंग पर भी पाबंदी लगा दी थी।

एमसी मेहता बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का यह अंश अपनी कहानी खुद बताता है- “हमें इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हरियाणा सरकार ने अरावली में जिन जमीनों को पीएलपी में नोटिफाई किया है वे वन और वन क्षेत्र की जमीनें हैं। हकीकत यह है कि खुद हरियाणा सरकार अरावली को कई दशक से वन क्षेत्र मानती रही है। उसके तमाम दस्तावेज इसके सबूत हैं। इसलिए इस वैधानिक स्थिति को बदलने या इसमें कोई संशोधन करना अदालत जरूरी नहीं समझती।”

सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले में यह भी साफ किया था कि अगर इस इलाके और खासकर पीएलपीए जमीनों पर कोई निर्माण किया गया हो तो उसे अवैध घोषित करते हुए गिरा दिया जाए।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने भी खोला भेद
मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, मॉडर्न विद्या निकेतन (एमवीएन) स्कूल और अरावली इंटरनेशनल स्कूल वन विभाग हरियाणा की जमीन पर हैं, इसकी पुष्टि कुछ और तथ्यों की पड़ताल से भी होती है, जिसमें केंद्रीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का पक्ष स्पष्ट है। बंधुआ मुक्ति मोर्चा के रमेश आर्य ने 22 और 23 जनवरी 2020 को आरटीआई के तहत केंद्रीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से पूछा कि क्या मंत्रालय ने इन तीनों शिक्षण संस्थानों को कोई एनओसी (अनापत्ति प्रमाणपत्र) और वन क्षेत्र को अनारक्षित घोषित करने का कोई प्रमाणपत्र जारी किया है। इसके जवाब में केन्द्र सरकार के इस मंत्रालय ने 14 फरवरी 2020 को जवाब दिया कि इस तारीख तक अब तक 12 प्रस्ताव हरियाणा सरकार ने एनओसी और अनारक्षित घोषित करने के लिए भेजे हैं। मंत्रालय ने इन 12 प्रस्तावों में से तीन पर विचार किया, लेकिन इन तीनों शिक्षण संस्थानों का जिक्र मंत्रालय की सूची में नहीं हैं।

इसके बाद 27 अगस्त 2020 को आरटीआई के तहत एमसीएफ से पूछा गया कि क्या नगर निगम फरीदाबाद ने इन तीनों संस्थानों को चेंज ऑफ लैंड यूज (सीएलयू) में बदलाव की अनुमति दी है। क्या इन तीनों संस्थानों ने वन विभाग से कोई एनओसी हासिल की है। एमसीएफ ने इस आरटीआई का जवाब 27 सितंबर 2020 को देते हुए लिखा कि अभी तक वन विभाग ने मानव रचना और एमवीएन को एनओसी देने की जानकारी एमसीएफ को नहीं दी है, लेकिन एमसीएफ ने अरावली इंटरनेशनल के बारे में जिला योजनाकार (डीटीपी फरीदाबाद) से सूचना मांगी है। अलबत्ता एमसीएफ ने इन तीनों शिक्षण संस्थानों को सीएलयू प्रमाण पत्र जारी कर दिया है।

बहरहाल, 27 अगस्त 2020 को आरटीआई के तहत डिप्टी कंजरवेटर वन (डीसीएफ) फरीदाबाद से पूछा गया कि क्या इन तीनों शिक्षण संस्थानों ने विभाग से इन जमीनों का इस्तेमाल गैर वन वाले (नॉन फॉरेस्ट) क्षेत्र के तहत इस्तेमाल की अनुमति मांगी है।

वन विभाग के अफसर ने इस आरटीआई का जवाब 19 अक्तूबर 2020 को देते हुए लिखा कि इन तीनों शिक्षण संस्थानों ने पीएलपीए लैंड पर अपनी बिल्डिंगें खड़ी की हैं। अधिकारी ने कहा कि यह मामला वन संरक्षण कानून के तहत देखा जाना चाहिए। इन तीनों शिक्षण संस्थानों को गैर वन कामों के लिए कोई प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया है।

एमसीएफ क्या करेगा
नगर निगम फ़रीदाबाद के ज्वाइंट कमिश्नर प्रशांत अटकान ने इस मामले में तीनों शिक्षण संस्थानों को कल यानी शुक्रवार को तलब किया है। उनका कहना है कि वो सोमवार तक इस मामले की रिपोर्ट सरकार को भेजना चाहते हैं।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई शुरू होने पर नगर निगम फरीदाबाद को एनओसी के बारे में स्थिति स्पष्ट करनी होगी। उसे यह भी बताना होगा कि जब यह जमीन पीएलपीए में आती है तो उसने किस तरह मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, मॉडर्न विद्या निकेतन (एमवीएन) स्कूल और अरावली इंटरनेशनल स्कूल को सीएलयू जारी कर दिया। अरावली में सूरजकुंड का यह इलाका ज्वाइंट कमिश्नर एमसीएफ के कार्य क्षेत्र में आता है, ऐसे में देखना है कि वे सुप्रीम कोर्ट में इस बाबत क्या तथ्य रखते हैं। पीएलपीए पर इमारतें कैसे खड़ी की जा सकती हैं, फिलहाल इसका माकूल जवाब एमसीएफ अफसरों के पास नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में तथ्यों को छिपाने या तोड़ मरोड़ कर पेश करने की हिम्मत एमसीएफ के अफसर नहीं जुटा पाएंगे। देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट कांत एन्क्लेव की तरह ही मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, मॉडर्न विद्या निकेतन (एमवीएन) स्कूल और अरावली इंटरनेशनल स्कूल को गिराने का आदेश देता है या फिर मोटा जुर्माना लगा कर छोड़ देगा। अलबत्ता खोरी और लकड़पुर में जिन गरीब मजदूरों को उजाड़ा जा चुका है, वे अब यहां नहीं बस पाएंगे।

क्या सिद्धदाता आश्रम अवैध है
अरावली इलाके में ही सिद्धदाता आश्रम है। इस बेशकीमती जमीन को हरियाणा के सीएम रहे भजनलाल ने मंदिर को दिलाया था। हालांकि भजनलाल इस मंदिर को जमीन नहीं देना चाहते थे, लेकिन बड़ी ही रहस्यमय परिस्थितियों में उन्होंने यह जमीन अफसरों पर दबाव डालकर आश्रम को दिलवाई थी। बाद में आश्रम में गद्दी को लेकर विवाद हुआ और मामले ने कई मोड़ लिए। हालांकि पूरा आश्रम पीएलपीए लैंड पर बना है यानी वन क्षेत्र की जगह पर बना है। इस आश्रम का संचालक खुद को हरियाणा और इन्द्रप्रस्थ का पीठाधीश्वर और जगदगुरु कहलावाता है। इसके हर दल के नेताओं और अफसरों से संबंध हैं।

(यूसुफ किरमानी वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on April 15, 2021 5:38 pm

Share