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मध्य प्रदेश में सरकार बचाने के लिए जारी है विधायकों की खरीद फरोख्त!

मध्य प्रदेश में सात महीने पहले कांग्रेस की सरकार गिराने के लिए उसके एक मुश्त 22 विधायकों का विधानसभा से इस्तीफा करा देने वाली भारतीय जनता पार्टी अपनी सरकार को बचाए रखने के लिए किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहती। यही वजह है कि प्रदेश में विधानसभा की 28 सीटों के उपचुनाव के लिए जारी प्रक्रिया के बीच भी उसने कांग्रेस के विधायकों को तोड़कर अपने पाले में लाने के अभियान को विराम नहीं दिया है।

पिछले सप्ताह भाजपा उन दो निर्दलीय विधायकों को साध कर अपने खेमे में ले आई थी, जो 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस के साथ बने हुए थे। अब उसने एक कांग्रेस विधायक का विधानसभा से इस्तीफा करा कर उसे भी अपने कुनबे में शामिल कर लिया है। भाजपा से जुड़े भरोसमंद सूत्रों के मुताबिक अगले कुछ दिनों में कांग्रेस के और 5-6 विधायक विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम सकते हैं।

तीन दिन पहले 23 अक्टूबर को पश्चिमी निमाड़ के खरगौन जिले की भगवानपुरा सीट से निर्दलीय विधायक चिड़ाभाई डावर और पूर्वी निमाड़ की बुरहानपुर सीट से सुरेंद्र सिंह शेरा ने राज्य की भाजपा सरकार को अपना समर्थन देने संबंधी पत्र विधानसभा स्पीकर को सौंप दिए हैं। इस कवायद के दो दिन बाद ही 25 अक्तूबर को दमोह से निर्वाचित कांग्रेस विधायक राहुल लोधी विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए। विधानसभा के प्रोटेम स्पीकर रामेश्वर शर्मा ने बिना देर किए लोधी का इस्तीफा स्वीकार कर लिया। लोधी के इस्तीफे के बाद विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने वाले विधायकों की संख्या 26 हो गई है।

कांग्रेस विधायकों को अपने पाले में लाने की भाजपा की इस ताजा कवायद को देखते हुए यह माना जा रहा है कि उसे शायद उपचुनाव के नतीजे अपने अनुकूल न रहने का अंदेशा सता रहा है, इसीलिए उसकी ओर से विधानसभा में अपनी सरकार की स्थिरता और आरामदायक बहुमत कायम करने के लिए ही कांग्रेस विधायक दल में सेंधमारी का यह खेल खेला जा रहा है। अगले कुछ दिनों में कांग्रेस के और 5-6 विधायकों के विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

गौरतलब है कि इसी साल मार्च महीने में कांग्रेस के 22 विधायक विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए थे। इस थोकबंद दलबदल के चलते कांग्रेस की 15 महीने पुरानी कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई थी। विधानसभा की प्रभावी सदस्य संख्या के आधार पर भाजपा को स्वत: बहुमत हासिल हो गया था और वह फिर से सत्ता पर काबिज हो गई थी।

राज्य में भाजपा की सरकार बनने के कुछ दिनों के भीतर ही तीन और कांग्रेस विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया था। इसी बीच विधानसभा की तीन सीटें तीन विधायकों के निधन की वजह से खाली हो गई थीं। इस प्रकार विधानसभा की कुल 28 सीटें खाली हो गई थीं, जिनके लिए आगामी तीन नवंबर को उपचुनाव होने जा रहे हैं।

भाजपा से इस्तीफा देने वाले ज्यादातर विधायक पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक और उन्हीं के प्रभाव वाले ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के हैं। भाजपा ने उन सभी को उपचुनाव में अपना प्रत्याशी बनाया है, लेकिन उनके चुनाव क्षेत्रों से आ रही सूचनाएं भाजपा को परेशान करने वाली हैं। सिंधिया के दलबदल करने और कांग्रेस की सरकार गिराने के खेल को उनके क्षेत्र की जनता ने पसंद नहीं किया है, लिहाजा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवारों को भी जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। इस तरह की सूचनाएं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा कराए गए सर्वे के जरिए भी आई हैं और राज्य सरकार को मिली इसी आशय की खुफिया रिपोर्ट ने भी भाजपा नेताओं को हैरान-परेशान कर दिया है।

फिलहाल 230 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में 202 सदस्य हैं, जिनमें भाजपा के 107, कांग्रेस के 88, बसपा के दो, सपा का एक तथा चार निर्दलीय विधायक हैं। इस संख्या बल के लिहाज से भाजपा को 230 के सदन में बहुमत के लिए महज नौ सीटें और चाहिए, जबकि कांग्रेस को फिर से सत्ता हासिल करने के लिए उपचुनाव वाली सभी 28 सीटें जीतना होंगी।

हालांकि मध्य प्रदेश में कांग्रेस संगठन की जैसी स्थिति है, उसे देखते हुए उसके लिए सभी 28 सीटें जीतना बेहद मुश्किल है, लेकिन भाजपा और खासकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बेहद घबराए हुए हैं। शिवराज सिंह का आगे मुख्यमंत्री बने रहना काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि उपचुनाव में भाजपा कैसा प्रदर्शन करती है और विधानसभा में उसका बहुमत का आंकड़ा कितने ऊपर तक जाता है। यही वजह है कि वे कांग्रेस के कई विधायकों से संपर्क बनाए हुए हैं और विधानसभा से उनका इस्तीफा करा कर उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

चूंकि दलबदल निरोधक कानून को धता बताते हुए विपक्षी विधायकों और सांसदों से इस्तीफा करा कर उन्हें अपने पाले में लाने का खेल भाजपा अन्य कई राज्यों में भी बिना किसी शर्म-संकोच के पिछले छह सालों से खेलती आ रही है, इसलिए मध्य प्रदेश में भी ऐसा करना उसके लिए कोई नई बात नहीं है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों से सत्ता और पैसे के बूते दलबदल कराने का भाजपा का यह खेल सरेआम नैतिकता लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने वाला है, लेकिन इससे कांग्रेस के राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेतृत्व की क्षमता पर भी यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि वे चुनाव में किस तरह के लोगों को उम्मीदवार बनाते हैं, जिन्हें जीतने के बाद बिकने में और दलबदल करने में कोई संकोच नहीं होता है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on October 26, 2020 7:00 pm

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