सच्चर कमेटी की सिफारिशों के ख़िलाफ़ भगवा संगठन ने दायर की सुप्रीम कोर्ट में याचिका

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हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ते आक्रमण के साथ-साथ सामाजिक न्याय की सारी नीतियों, योजनाओं और क़ानूनों को तिलांजली दे दी जा रही है। आरक्षण जैसे सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के अधिकार को पुख्ता करने वाली प्रणाली को कमजोर करने के साथ ही अब दूसरी योजनाओं और सिफारिशों की बारी है।

इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने से रोकने की गुहार लगाई गई है। ‘सनातन वैदिक धर्म’ के अनुयायियों ने एक याचिका दायर कर इस रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू होने से रोकने की गुहार लगाई है। ये याचिका ऐसे समय में दायर की गई है जब केंद्र ने विशेष रूप से धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए अनुसूचित जाति कल्याण योजनाओं में बचाव किया है, जिसमें कहा गया है कि ये योजनाएं हिंदुओं के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करती हैं और समानता के सिद्धांत के ख़िलाफ़ नहीं हैं।

इसमें कहा गया है कि सच्चर समिति असंवैधानिक और अवैध है क्योंकि यह राष्ट्रपति के आदेश के तहत नहीं है।

उत्तर प्रदेश के पांच लोगों द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि नौ मार्च 2005 को प्रधानमंत्री कार्यालय से समिति के गठन के लिए जारी अधिसूचना में ”कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि यह मंत्रिमंडल के किसी निर्णय के बाद जारी की जा रही है। इन लोगों ने जनहित याचिका दायर कर नौ मार्च 2005 को प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से सच्चर समिति का गठन करने वाली अधिसूचना को चुनौती दी है। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि वह अधिसूचना किसी कैबिनेट निर्णय का नतीजा नहीं थी बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इच्छा पर आधारित थी। याचिका में दावा किया गया है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपनी मर्जी से मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का परीक्षण करने के लिए समिति नियुक्त करने का निर्देश जारी किया जबकि अनुच्छेद 14 व 15 के आधार पर किसी भी धार्मिक समुदाय के साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।

याचिका में आगे शीर्षस्थ अदालत को बताया गया है कि इस तरह के आयोग का गठन करने की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत राष्ट्रपति के पास है। याचिका में दावा किया गया है कि समिति की नियुक्ति अनुच्छेद 77 का उल्लंघन थी और यह ”असंवैधानिक तथा अवैध है। याचिका में आग्रह किया गया है कि केंद्र को मुस्लिम समुदाय के लिए कोई योजना शुरू करने के लिए रिपोर्ट का क्रियान्वयन करने से रोका जाए।

सामाजिक न्याय के सिद्धांत को अमली जामा पहनाने और अल्पसंख्यक समुदाय के कल्याण के लिये ज़मीनी हक़ीक़त की जांच के बाद की गई सच्चर कमेटी की सिफारिशों से आखिर किसी को क्या परेशानी है। बता दें कि देश में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के हालातों को जानने के लिए सच्चर कमेटी बनाई गई थी। साल 2006 में इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी थी।

संप्रग सरकार ने मार्च 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया था। समिति को देश में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार करनी थी।

याचिका में कहा गया है कि समिति यह समझने में विफल रही कि मुस्लिम माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने की बजाए ‘मदरसों’ में धार्मिक शिक्षा देने में अधिक रुचि क्यों रखते हैं। सरकार को निर्देश दिया जाना चाहिए कि वह सच्चर समिति की रिपोर्ट पर भरोसा कर मुसलमानों के पक्ष में कोई नई योजना न लाए।

 इस याचिका में यह भी कहा गया है कि ‘मुसलमानों की परिवार नियोजन में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसी वजह से उनका परिवार आमतौर पर काफी बड़ा होता है और बच्चों को उचित भोजन और पोषण नहीं मिल पाता है। इसके अनुसार समिति ने इन सभी पहलुओं पर कोई विचार नहीं किया है।

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