Tuesday, December 7, 2021

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खास रिपोर्ट: आदिम जनजाति दंपति जिसे माड़-भात में डालने के लिए मांगनी पड़ती है नमक की भी भीख

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अगामी 15 नवंबर, 2021 को सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर से बड़े धूमधाम से बिरसा मुंडा की 146वीं जयंती मनाई जाएगी, साथ ही झारखंड का 21वां स्थापना दिवस भी मनाया जाएगा। अवसर पर पक्ष-विपक्ष के नेताओं द्वारा लंबे-लंबे भाषण दिए जाएंगे, दिल को छूने वाले भावनात्मक जुमले दोहराए जाएंगे, बिरसा के सपनों को साकार करने के संकल्प दोहराए जाएंगे आदि आदि।

जो शायद दूसरे ही दिन से सुनने वालों और बोलने वालों, सभी के जेहन से पिछले 20 वर्षों के विकास की तरह ही कहीं गुम हो जाएगा और फिर कुछ प्रगतिशील व जनवाद पसंद लोग गढ़वा जिले के मानदोहर गांव के (आदिम जनजाति) लकवाग्रस्त नि:संतान 65 वर्षीया जगीया परहिया व उनके 70 वर्षीय अंधे पति हलकन परहिया इसी तरह से लातेहार जिले के केराखाड़ गांव के रहने वाले 80 वर्षीय रंजन मुण्डा, इसी जिले के ही सुरकई गांव के रहने वाले विकलांग 45 वर्षीय राजेन्द्र नगेसिया, पश्चिम सिंहभूम जिले के पोड़ाहाट गांव की 5 बच्चों की मां 35 वर्षीया जनजाति समुदाय की विधवा गुम्मी दिग्गी और लातेहार में स्थित अम्बाकोना गांव की विधवा आदिवासी महिला कुन्ती नगेसिया वगैरह की दुर्दशा पर विलाप करेंगे। और कहेंगे कि आजादी के 74 साल बाद और अलग राज्य गठन के 20 साल बाद भी अभी तक ऐसे लोगों को सरकारी योजना का कोई भी लाभ नहीं मिल पाया है। रुदन इस पर भी होगा कि अलग राज्य गठन के 21 साल में एक गैरआदिवासी मुख्यमंत्री को छोड़ बाकी 10 आदिवासी मुख्यमंत्री हुए हैं, फिर भी आदिवासी विकास की अवधारणा से गठित झारखंड में आज भी आदिवासी समुदाय हाशिए पर है। जो आए दिन खबरों की सुखियों में देखने को मिलते रहे हैं।

बताना जरूरी होगा कि झारखंड में 32 जनजातियां हैं, जो राज्य के कुल आबादी का 27.67 फीसदी हैं। जिनमें आठ आदिम जनजातियां असुर, बिरहोर, बिरजिया, कोरवा, माल पहाड़िया, परहिया, सौरिया पहाड़िया और सबर, जो विलुप्ति के कगार हैं। 2011 की जनगणना के आधार पर पूरे झारखंड में इन आदिम जनजातियों में असुर की कुल जनसंख्या 22,459, बिरहोर 10,736, बिरजिया 6,276, कोरवा 35,606, माल पहाड़िया 1,35,797, परहिया 25,585, सौरिया पहाड़िया 46,222 और सबर की जनसंख्या 9,688 है।

इन आदिम जनजातियों को बचाए रखने के लिए झारखंड सरकार ने इन परिवारों को बिरसा आवास के तहत पक्का घर देने के अलावा मुख्यमंत्री डाकिया योजना, मुख्यमंत्री राज्य आदिम जनजाति पेंशन योजना, बच्चों की शिक्षा, गांवों में पानी, बिजली, सड़क जैसी सुविधाएं बहाल करने के लिए योजना बनायी है। सितंबर 2020 में सरकार ने राज्य में निवास करने वाले इन 8 आदिम जनजातियों के विकास में 5 करोड़ रुपये वित्तीय वर्ष 2020-21 में खर्च करने की योजना बनायी है। इसके लिए आदिवासी कल्याण आयुक्त झारखंड, को 5 करोड़ दिये गए। आवंटित राशि विभाग को प्राप्त होने के बाद आदिवासी कल्याण आयुक्त हर्ष मंगला ने राज्य के उपायुक्तों को पत्र लिख कर आदिम जनजातियों के ग्रामोत्थान योजना से संबंधित कार्य योजना प्रस्ताव बना कर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। इसकी जानकारी झारखंड आदिम जनजाति विकास समिति प्रदेश अध्यक्ष डॉ मनोज कुमार अगरिया ने दी।

कहने को तो सरकार ने अपने स्तर पर इन जनजातियों के लिए तमाम योजनाएं घोषित कर रखी हैं लेकिन इनका लाभ कितना नीचे पहुंच रहा है और कितना भ्रष्टाचार के रास्ते नौकरशाहों और सरकार में बैठे दूसरे लोगों के मुंह में चला जा रहा है यह सबसे बड़ा प्रश्न है। मुख्यमंत्री डाकिया योजना झारखंड के विलुप्तप्राय आदिम जनजाति समुदाय को घर बैठे अनाज (केवल चावल) पहुंचाने की प्रक्रिया है। सरकार की मानें तो आदिम जनजाति आबादी को पूरी तरह से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कराने के लिए झारखंड सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना है। इसी के साथ ही राज्य में डाकिया योजना वर्ष 2017 में शुरु की गई। इस योजना के कुल लाभुक अभी केवल 73,386 हैं। यह वही संख्या है जो 2017 में थी, जबकि वर्तमान में पूरे राज्य में आदिम जनजातियों की जनसंख्या 2,92,369 है।


इस योजना के तहत चयनित आदिम जनजातीय समुदायों के घर तक बंद बोरी में नि:शुल्क 35 किलोग्राम चावल पहुंचाया जाना है। योजना में भ्रष्टाचार का आलम यह है कि लगभग लाभुकों को 35 किलो चावल के स्थान पर केवल 20 से 30 किलो ही दिया जाता है। बाकी चावल बोरी को खोलकर निकाल लिया जाता है।
बता दें कि जिले के रंका प्रखण्ड में सिंजों गांव के आदिम जनजाति के लोगों को डाकिया योजना के चावल को बंद बोरी को खोल कर दिया जाता है, जिसे वे आपस में बांट लेते हैं, जो तस्वीरों में देखा जा सकता है। वहीं जिले का प्रखण्ड मेराल के चामा पंचायत के कुशमही गांव के आदिम जनजाति के लोग 7 किलोमीटर दूर जाकर अपना भाड़ा देकर राशन लाते हैं और आपस में बांटते हैं। इसमें घपला यह किया जाता है कि 10 लोगों के लिए मिले 10 बोरी राशन की जगह 7-8 बोरी ही दिया जाता है, जिसे वे लोग आपस में बांटते हैं। इन आदिम जनजाति परिवारों में कुछ ही परिवार को चावल के साथ अलग से दाल व साग-सब्जी नसीब हो पाता है।

इसका उदाहरण राज्य के गढ़वा जिले के मानदोहर गांव के एक आदिम जनजाति दम्पति की कहानी में देखा जा सकता है। 65 वर्षीया जगीया परहिया व 70 वर्षीय उनके पति हलकन परहिया वृद्ध हैं और शरीर से बिल्कुल असहाय हैं। इस दम्पति की कोई संतान नहीं है। ऊपर से जगीया परहिया का बांया हाथ लकवाग्रस्त है और हलकन परहिया की आंखों से दिखाई नहीं देता है। दोनों को न तो वृद्धा पेंशन मिलता है और न ही आदिम जनजाति पेंशन ही मिल रही है। सरकारी लाभ में मात्र उन्हें एक बिरसा आवास मिला है। मुख्यमंत्री डाकिया योजना के तहत प्रखण्ड रमना से 30 किलो राशन जरूर मिलता है। जिसका वे केवल भात बनाकर उससे निकले मांड़ के साथ खाकर अपना गुजारा करते हैं। माड़-भात के साथ नमक के लिए भी इन्हें दूसरों से भीख मांगनी पड़ती है। क्योंकि इनके पास पैसा नहीं है कि वे साग-सब्जी के साथ नमक भी खरीद सकें। नाम वृद्धा पेंशन में जोड़ने के सवाल पर प्रखण्ड विकास पदाधिकारी का कहना था कि खतियौनी जाति बनाकर दीजिए, तब पेंशन योजना में नाम जोड़ा जायेगा।

इस शर्त को पूरा करने की क्षमता इस परहिया दम्पति में नहीं है। लिहाजा वे निराश होकर बैठ गये हैं और अब वृद्धा पेंशन की उम्मीद छोड़ चुके हैं। जबकि श्रम नियोजन प्रशिक्षण एवं कौशल विकास विभाग झारखंड सरकार के सामाजिक सुरक्षा निदेशालय से जारी पत्रांक 277, दिनांक 8 जुलाई, 2015 से लागू हो गया है। जिसके तहत राज्य के आदिम जनजातियों के लिए नयी पेंशन योजना लागू की गयी है। इस पेंशन योजना के तहत आदिम जनजाति परिवार के सदस्यों को 600 रुपये प्रतिमाह पेंशन राशि का भुगतान किये जाने का प्रावधान है, जिसे महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग, झारखंड सरकार के सचिव अमिताभ कौशल द्वारा “आदिम जनजाति पेंशन योजना” के स्थान पर “मुख्यमंत्री राज्य आदिम जनजाति पेंशन योजना” कर दिया गया और 600 रुपये की राशि को बढ़ा कर 1000 रूपए कर दिया गया। इस योजना के अंतर्गत पेंशन आदिम जनजाति समूह के ऐसे सदस्य को दिया जाता है, जिसे किसी अन्य पेंशन योजना का लाभ नहीं मिलता है या फिर वह किसी सरकारी, निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरी नहीं करता है तथा नियमित मासिक आय प्राप्त नहीं करता है। इस योजना के लाभ के लिए बीपीएल सूची में नाम या वार्षिक आय प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है। जाहिर है उक्त योजना के लाभ के लिए आदिम जनजातियों को किसी डॉक्यूमेंट की जरूरत नहीं है, तो आखिर क्यों नहीं जगीया परहिया व हलकन परहिया को इस पेंशन योजना का लाभ मिल रहा है?

आदिम जनजातियों के रखरखाव के लिए मुख्यत: तीन योजनाएं हैं- आदिम जनजाति पेंशन योजना या वृद्धा पेंशन योजना, बिरसा आवास और डाकिया योजना। जिसके लिए किसी दस्तावेज की जरूरत नहीं है, केवल प्रखंड कार्यालय में अपना नाम दर्ज करवाना होता है। आधार कार्ड की जरूरत केवल बैंक में खाता खुलवाने के लिए होती है। जगीया परहिया व हलकन परहिया का बैंक एकाउंट भी है, फिर भी ये आदिम जनजाति पेंशन योजना या वृद्धा पेंशन योजना के लाभ से वंचित हैं।

जिले के आदिम जनजाति समुदाय से जुड़े मानिकचंद कोरवा बताते हैं कि जब कभी जगीया परहिया व हलकन परहिया में से किसी एक की तबियत खराब होती है, तो गांव का ही कोई शख्स किसी झोला छाप डॉक्टर से दस पांच रुपए की गोली खरीद कर दे देता है, जिससे हल्का फुल्का जर बुखार ठीक हो जाता है। मगर किसी कारण कोई लम्बी बीमारी हुई तो वह उनका अंतिम समय ही होगा। वैसे जगीया व उसका पति चावल से बना माड़-भात ही खाकर गुजारा कर लेते हैं। हालांकि कभी-कभी जगीया जंगल से साग लाती है, तब उस दिन उन्हें चावल के साथ साग भी खाने को मिल जाता है। अगर उन्हें आदिम जनजाति पेंशन योजना या वृद्धा पेंशन योजना का लाभ मिलता तो शायद साग-सब्जी के साथ कभी-कभी दाल व अन्य पौष्टिक आहार में मांस-मछली-अंडा भी खाने को मिल जाता।

मानिकचंद कोरवा बताते हैं कि आदिम जनजाति सामुदाय को जो बिरसा आवास दिया जाता है, वह इतना घटिया होता है कि जिसमें जानवर को भी नहीं रखा जा सकता है। वे आगे बताते हैं कि कोई इंसान इस तरह के घर में रहना पसंद नहीं करेगा, मगर आदिम जनजाति समुदाय को जबरदस्ती कहा जा रहा है कि आप लोग इसी तरह रहें। वे आहत स्वर में सवाल करते हैं कि क्या आदिम जनजाति सामुदाय इंसान नहीं होते?

बताते चलें कि गुलाम भारत में पैदा हुए लातेहार जिला के केराखाड़ गांव के रहने वाले 80 वर्षीय रंजन मुण्डा को आजादी अर्थहीन लगती है। रंजन मुण्डा को ‘गुलाम भारत और आजाद भारत’ में कोई फर्क नहीं दिखता है। वे कहते हैं आजादी के पहले मेरा जन्म हुआ लेकिन आजाद भारत में हमें अभी तक कोई सुविधा नहीं मिली है, तो काहे की आजादी! रंजन मुण्डा का कहना है कि आजादी के बाद से अभी तक उनका न राशन कार्ड बना है और न ही सरकार की जनाकांक्षी योजनाओं का उन्हें कोई लाभ अभी तक मिला है, जबकि आजादी के बाद कई सरकारें आईं और गईं।
काफी मशक्कत के बाद रंजन मुण्डा का 2008 में वृद्धा पेंशन शुरू हुयी थी, जो 2018 में बंद हो गयी। वृद्धा पेंशन बंद होने का सबसे बड़ा कारण रहा, बैंक एकाउंट का आधार से जोड़ने का क्रम। क्योंकि 2008 के बैंक एकाउंट में रंजन मुण्डा की अंकित जन्मतिथि, 2016 में बने आधार कार्ड में अंकित जन्मतिथि से मेल नहीं खायी।
कहना ना होगा कि ऐसी दशा का शिकार अकेले रंजन मुण्डा ही नहीं हैं। कितने ही रंजन मुण्डा हैं, जिन पर हमारी नजर नहीं जाती है, या हम उन्हें देखकर भी अनदेखा कर देते हैं।

उल्लेखनीय है कि 27 मार्च 2017 को झारखंड की रघुवर सरकार की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा ने कहा था कि ”सभी राशन कार्ड जिन्हें आधार नंबर के साथ जोड़ा नहीं गया है, वे 5 अप्रैल 2017 को निरर्थक हो जाएंगे … लगभग 3 लाख राशन कार्ड अवैध घोषित किए गए हैं।”
इस बाबत सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, झारखंड सरकार द्वारा 27 मार्च 2017 एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गयी।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रका विशद कुमार की रिपोर्ट।)
जारी….

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