Subscribe for notification

किताबों से लेकर उत्तराखंड की सड़कों पर दर्ज है त्रेपन सिंह के संघर्षों की इबारत

उत्तराखंड के जुझारू जन-आन्दोलनकारी और सुप्रसिद्ध लेखक कामरेड त्रेपन सिंह चौहान नहीं रहे। का. त्रेपन सिंह चौहान का जाना उत्तराखंड के आम जनों के संघर्षों के लिए और जन-पक्षधर साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

का. त्रेपन सिंह चौहान सच्चे अर्थों में जनता के आदमी थे। उत्तराखंड के जनांदोलनों के वह एक जाना-पहचाना चेहरा थे। उनके जुझारू, बेदाग़ और सरल-निश्छल व्यक्तित्व को सिर्फ़ आन्दोलनों के साथी और बुद्धिजीवी-लेखक गण ही नहीं, आम मेहनतकश जन भी गहराई से प्यार करते थे। फलेंडा आन्दोलन के दौरान का. चौहान ने हिमालय में बड़े बाँध बनाने की जन-विरोधी सरकारी नीति के विरुद्ध जमकर लिखा, व्यापक जनमत तैयार किया और आन्दोलन में अहम नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।

जब तक उनका शरीर साथ देता रहा, ‘चेतना आन्दोलन’ के जरिये वह पहाड़ के आम जनों के जीवन और संघर्षों से जैविक रूप से जुड़े रहे और बिस्तर पर पड़े हुए भी उसे दिशा देने का काम करते रहे। देहरादून घाटी में असंगठित मज़दूरों को संगठित करने की पहल लेकर का. चौहान ने एक बहुत महत्वपूर्ण काम किया और बिस्तर पर लेटे-लेटे भी संगठन की गतिविधियों का मार्ग-दर्शन करते रहे। वह हिन्दुत्ववादी फ़ासीवाद के समझौताहीन विरोधी थे और उसके विरुद्ध जुझारू संघर्ष संगठित करने पर हमेशा बल देते रहे।

पिछले चार वर्षों से वह ‘मोटर-न्यूरोन’ की गंभीर बीमारी की चपेट में थे। धीरे-धीरे उनका पूरा शरीर पंगु होता जा रहा था, पर अपनी अदम्य जिजीविषा के साथ का.त्रेपन सिंह बीमारी के ख़िलाफ़ भी वैसे ही लड़ते रहे, जैसे जीवन पर्यंत वह जन-विरोधी शक्तियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले रहे। जब तक संभव था, वह शहर के सभी सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों और संगोष्ठियों में किसी साथी की मदद लेकर आते रहे। बिस्तर पर पड़े-पड़े उन्होंने अदम्य हठ के साथ अपना लेखन-कर्म जारी रखा। ‘यमुना’, ‘हे ब्वारी’ और ‘भाग की फाँस’ नामक पर्वतीय आम जनों के जीवन, संस्कृति और संघर्ष पर केन्द्रित अपने तीन उपन्यासों के बाद वह अपने चौथे उपन्यास पर अथाह शारीरिक पीड़ा के बावजूद, निरंतर काम जारी रखे हुए थे।

जब उँगलियों ने भी काम करना बंद कर दिया तो एक विशेष सॉफ्टवेयर की मदद से वह आँखों की पुतलियों के सहारे कंप्यूटर पर लेखन करते थे, हालांकि यह काम बहुत ही कष्टसाध्य और श्रमसाध्य था। अंतिम कुछ महीनों के दौरान वह सिनर्जी अस्पताल में भरती थे। मौत की आहटें करीब आती जा रही थीं, पर का. त्रेपन का स्वप्नदर्शी, सृजनाकुल मन पराजय स्वीकार करने को तैयार न था। लेकिन अंततः उत्तराखंड के इस जन-योद्धा को हम लोगों का साथ छोड़कर जाना ही पड़ा।

का. त्रेपन सिंह चौहान उत्तराखंड के एक अप्रतिम लेखक थे। यह अफसोस की बात है कि उनके लेखन का अभी उस तरह गंभीर मूल्यांकन नहीं हो सका है, जो होना चाहिए। का. त्रेपन नाम-गिराम या चर्चा के आकांक्षी लेखक थे ही नहीं। बस, वह एक कठोर साधक की तरह अपने काम में लगे रहते थे। उनका लेखन न सिर्फ़ उत्तराखंड, बल्कि समूचे हिन्दी जगत की एक धरोहर है।

चार वर्षों पहले 2017 की शुरुआत में जब हम लोगों ने उत्तराखंड में राजनीतिक-सांस्कृतिक कामों की शुरुआत की, उसी समय का. त्रेपन सिंह चौहान से हम लोगों का परिचय हुआ और दूसरी-तीसरी मुलाक़ात तक वह हम लोगों के कामरेड अभिभावक के समान हो गए। गौरतलब बात यह थी कि वह हर मसले पर बेहद जनवादी और तार्किक ढंग से बात करते थे। अप्रैल, 2017 में ‘राहुल फाउंडेशन’ के तत्वावधान में देहरादून में राहुल सांकृत्यायन पर जो संगोष्ठी हम लोगों ने आयोजित की उसमें एक अतिथि वक्ता वह भी थे।

दून विश्वविद्यालय में 2018 में लातिन अमेरिकी प्रतिरोध साहित्य पर ‘अन्वेषा’ सांस्कृतिक मंच की ओर से जो संगोष्ठी हुई थी, उसकी अध्यक्षता भी का. त्रेपन ने ही की थी। 2018 में ही ‘नौजवान भारत सभा’ और ‘अनुराग ट्रस्ट’ के तत्वावधान में बच्चों की लेखन-प्रतियोगिता हुई। उसके पुरस्कार-वितरण और सांस्कृतिक कार्यक्रम की अध्यक्षता भी का. त्रेपन सिंह चौहान ने ही की थी, हालांकि बढ़ती शारीरिक लाचारी के कारण अब उन्हें कहीं आने-जाने में दिक्क़त होने लगी थी।

इसके बाद का. त्रेपन अब ज्यादातर बिस्तर पर ही रहने लगे थे। हम लोग हर अहम मसले पर राय-परामर्श के लिए उनके घर जाया करते थे। आख़िरी बार उनसे लम्बी बातचीत तीन विषयों पर हुई थी, हालांकि अब उन्हें बोलने में भी दिक्क़त होने लगी थी। हमारी बातचीत का पहला विषय था कि असंगठित मज़दूरों को संगठित करने के काम को पूरे उत्तराखंड के स्तर पर कैसे फैलाया जाए और देश के अन्य हिस्सों के समान दिशा वाले आन्दोलनों से कैसे जोड़ा जाए।

दूसरा चर्चा का विषय था कि फासिज्म-विरोधी एक जुझारू जन-मोर्चा किस प्रकार गठित होगा और उसकी आम दिशा क्या होगी। तीसरे मुद्दे के तौर पर का. ने जनवादी अधिकार के मोर्चे को व्यापक आधार देने पर, तथा सांस्कृतिक मोर्चे पर कार्रवाइयों की निरंतरता पर विशेष बल दिया था। का. त्रेपन सिंह चौहान उत्तराखंड के उन गिने-चुने सामाजिक-सांस्कृतिक कर्मी, लेखक और मज़दूर संगठनकर्ता थे, जिनकी दृष्टि बुनियादी मुद्दों पर साफ़ थी और जो बेहद तार्किक व्यक्ति थे। अहं और तुच्छताओं से, किसी भी तरह की सिद्धांतहीन गुटबाज़ी और गिरोहबंदी से, वह पूरी तरह मुक्त थे। वह तमाम जन-पक्षधर शक्तियों के एक महत्वपूर्ण योजक सूत्र थे।

आज जैसे कठिन और चुनौतीपूर्ण समय में उनका न होना एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई बहुत मुश्किल से, और एक लम्बे समय बाद ही हो सकेगी। फिर भी, हम शोक को शक्ति में बदलकर का. त्रेपन सिंह चौहान के सपनों को और अधूरे कामों को पूरा करने की जी-तोड़ कोशिश करेंगे।

का. त्रेपन सिंह चौहान को शोक विह्वल ह्रदय और जुझारू संकल्पों के साथ लाल सलाम ! लाल सलाम !!

(कविता कृष्णपल्लवी का यह श्रद्धांजलि लेख उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)

This post was last modified on August 13, 2020 8:25 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

Leave a Comment
Disqus Comments Loading...
Share
Published by

Recent Posts

बिहार की सियासत में ओवैसी बना रहे हैं नया ‘माय’ समीकरण

बिहार में एक नया समीकरण जन्म ले रहा है। लालू यादव के ‘माय’ यानी मुस्लिम-यादव…

2 hours ago

जनता से ज्यादा सरकारों के करीब रहे हैं हरिवंश

मौजूदा वक्त में जब देश के तमाम संवैधानिक संस्थान और उनमें शीर्ष पदों पर बैठे…

4 hours ago

भुखमरी से लड़ने के लिए बने कानून को मटियामेट करने की तैयारी

मोदी सरकार द्वारा कल रविवार को राज्यसभा में पास करवाए गए किसान विधेयकों के एक…

4 hours ago

दक्खिन की तरफ बढ़ते हरिवंश!

हिंदी पत्रकारिता में हरिवंश उत्तर से चले थे। अब दक्खिन पहुंच गए हैं। पर इस…

5 hours ago

अब की दशहरे पर किसान किसका पुतला जलायेंगे?

देश को शर्मसार करती कई तस्वीरें सामने हैं।  एक तस्वीर उस अन्नदाता प्रीतम सिंह की…

6 hours ago

प्रियंका गांधी से मिले डॉ. कफ़ील

जेल से छूटने के बाद डॉक्टर कफ़ील खान ने आज सोमवार को कांग्रेस महासचिव प्रियंका…

8 hours ago