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केंद्रीय बजट में की गयी हाशिये के तबकों की अनदेखी: बलराम

आज 4 फरवरी दलित व आदिवसी समुदाय के लिए केंद्रीय बजट में क्या कुछ है, इन मुद्दों को लेकर दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन-राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान के द्वारा संयुक्त रूप से भोजन के अधिकार अभियान कार्यालय, रांची में प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया।

प्रेस वर्ता को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व राज्य सलाहकार बलराम ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए जो बजट केंद्रीय सरकार ने पेश किया है, वह संविधान की प्रस्तावना को पूरी तरह से नकारता है, क्योंकि प्रस्तावना में समानता और न्याय की बात की गई है, मगर केंद्रीय बजट में हाशिए के समुदायों के लिए बजट में कोई विशेष प्रावधान नहीं है।

उन्होंने कहा कि वर्ष 2020 हम सब के लिए उथल-पुथल भरा रहा खासकर सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समुदायों के लिए तो बहुत ही मुश्किल भरा रहा। वैश्विक महामारी ‘कोविड-19’ के प्रकोप का असर सभी पर पड़ा हालांकि विभिन्न समुदायों ने इसे अलग-अलग रूप में अनुभव किया। ऐसा लगा कि भारत की जाति एवं वर्ग वैश्विक हो गया है। जीवन में एक के बाद एक घटने वाली श्रृंखलाओं का पूरा देश गवाह था। इसने प्रवासी कामगारों के रोजगार की रीढ़ ही तोड़ दी। कोविड-19 के दौरान भी सफाईकर्मी सफाई का कार्य करते रहे और हिंसा बे-रोकटोक जारी रही।

झारखंड नरेगा वॉच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज ने कहा कि अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार अधिनियम 1989 एवं फसल बीमा योजना मद में अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई बजट प्रावधान नहीं किया गया है। यह केन्द्रीय सरकार का आदिवासियों के साथ सीधा भेदभाव है। सिर्फ यही नहीं दोनों योजनाओं के नीतिगत दस्तावेज के अनुसार अनुसूचित जनजाति उपयोजना एवं अनुसचित जाति उपयोजना मद में उनकी जनसंख्या के अनुपात में बजट आवंटित किया जाना है। वर्तमान में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या देश में लगभग 8 फीसदी एवं अनुसूचित जातियों की संख्या 18 फीसदी है। लेकिन निजी निर्धारण के बाद कभी भी दोनों योजनाओं में 6 फीसदी से ज्यादा आवंटन नहीं किया गया, यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है।

दलित आर्थिक अधिकार आंदोलन-एनसीडीएचआर के राज्य समन्वयक मिथिलेश कुमार ने कहा कि कोविड-19 की पृष्ठभूमि में ही वित्त मंत्री ने बजट पेश किया, जिससे लोग अभूतपूर्व अपेक्षाएं कर रहे थे कि इस बार बजट में क्या होगा। यदि दलित और आदिवासी दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस बजट की चमक कम रही। कुल अनुमानित बजट 34,83,237 करोड़ रुपयों का था, जिसमें से अनुसूचित जाति के लिए 1,26,259 करोड़ रुपये आवंटित किए गए और अनुसूचित जनजाति के लिए 79,942 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।

उन्होंने बताया कि पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप केन्द्र द्वारा प्रायोजित स्कीम है, जिसका कार्यान्वयन राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा किया जाता है। इस स्कीम से अनुसूचित जाति के छात्रों को आर्थिक सहायता मिलती है, जब वे अपनी दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। पोस्ट मैट्रिक स्कोलरशिप देश की एक बड़ी स्कीम है और दलित तथा आदिवासी समुदायों के बच्चों के लिए लाईफ लाइन की तरह है। यह वर्ष 1944 में डॉ अंबेडकर द्वारा कल्पना की गई थी कि वंचित समुदायों को वित्तीय सहायता करके शैक्षिक न्याय दिलाया जाना चाहिए। यह स्कीम पूरे देश में उन 60 लाख गरीब छात्रों को कवर करती है, जिनके माता-पिता की वार्षिक आय 2.50 लाख रुपयों से कम होती है।

दलितों और आदिवासियों के अधिकारों पर सरकार द्वारा बार-बार हमले होते रहते हैं। विभिन्न स्तरों पर इस स्कीम का कार्यान्वयन में कमी की जाती है, सरकार द्वारा इस चुनौती को स्वीकार करने के बजाए इस स्कॉलरशिप को ही खत्म करने में लग जाती है। केन्द्र सरकार की यह स्कीम देश भर के 14 राज्यों में बंद हो चुकी है जिसमें बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र, झारखंड भी शामिल हैं, 2017 के फार्मूले के आधार पर फंड जारी नहीं किया। दलित समुदाय के प्रबल विरोध और संघर्ष के बाद कार्यकर्ताओं और एनसीडीएचआर की लगातार कोशिशों के बाद सरकार 60-40 के फार्मूले पर वापस आई और फंड भी बढ़ाया। पहले उन्होंने 7000 करोड़ वार्षिक पोस्ट मैट्रिक स्कीम को प्रतिबिंबित किया था, बाद में इसे बढ़ाकर 59,048 करोड़ रुपये किया गया।

हालांकि वित्त वर्ष 2021-22 में पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप अनुसूचित जाति के लिए 3415.62 करोड़ रुपये और अनूसूचित जनजाति के लिए 1993 करोड़ है, जो कि छात्रों की मांग के अनुसार अपर्याप्त है। जब दलित-आदिवासी छात्रा उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने के लिए आते हैं तो बुरी तरह भेदभाव के शिकार होते हैं। क्योंकि इन शिक्षा संस्थानों को चलाने वाले दबंग जाति के होते हैं और दलित-आदिवासी समुदायों के छात्रों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि कमजोर होती है। उन्होंने कहा कि दलित और आदिवासी महिलाओं को सशक्त करने के लिए एनसीडीएचआर ने कई स्कीमों का सुझाव दिया है। आवंटन और वास्तविक आवंटन के अंतर को कम करने के लिए कुछ स्कीम हैं, खासकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति महिलाओं के लिए। दलित और आदिवासी महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा में पारामेडिकल और नर्सिंग कॉलेजों की मांग की गई है, इसके लिए 3500 करोड़ रुपयों के आवंटन का सुझाव दिया गया है।

आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सरोज हेम्ब्रम ने कहा कि दलित और आदिवासी महिलाएं सबसे अधिक भेदभाव और उत्पीड़न का शिकार होती हैं। उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति हर वर्ष व दिनों दिन बद से बदतर होती जा रही है। हाशिए की महिलाओं पर अपराध भयावह रूप से तेजी से बढ़ रहे हैं। पिछले साल हम इस बात के गवाह थे कि किस तरह हाथरस की दलित महिला की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। फिर भी इस वर्ष पीसीआर और अत्याचार निवारण अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए सिर्फ 600 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। दलित महिलाओं पर हिंसा को रोकने के लिए आवंटन धनराशि सिर्फ 180 करोड़ है। दलित और आदिवासी महिलाओं पर हर साल अत्याचार बढ़ रहे हैं, उस हिसाब से यह धनराशि बहुत कम है।  दलित आदिवासी महिलाओं के पिछड़े होने और उनके बेरोजगार होने की समस्या को दूर करने के लिए उनके रोजगार के लिए 3300 करोड़ रुपये आवंटित करने का सुझाव दिया गया। अजा और अजजा महिलाओं के घर की सुरक्षा के लिए सावित्रीबाई आवास कार्यक्रम का भी सुझाव दिया गया।

अंडेबकर ट्रस्ट के गणेश रवि ने कहा कि मोदी सरकार ने जिन तीन कृषि बिल-2020 को पास किया था, उन्हें वापस लेने के लिए किसानों का बड़े पैमाने पर प्रतिरोध देखा जा रहा है, क्योंकि इन बिलों का कार्यान्वयन होने पर कृषि क्षेत्र, कॉरपोरेट जगत के हाथों में चला जाएगा। वैसे तो इन बिलों का प्रभाव उन किसानों पर पड़ेगा जिनके पास अपनी खेती की भूमि होगी। पर भूमिहीन दलितों पर भी इसका अधिक दुष्प्रभाव पड़ेगा। वे अपनी आजीविका खो देंगे। यदि उनकी आय कम हो जाएगी तो जमीन के मालिक उनका शोषण करेंगे।

भोजन के अधिकार अभियान के राज्य संयोजक अशर्फी नंद प्रसाद ने कहा कि भूमिहीन दलितों को भी अपनी भूमि पाने के अधिकार को लेकर संघर्ष करना चाहिए। पर वे अन्य किसानों के साथ दृढ़ता से खड़े हैं। क्योंकि उनकी आजीविका का साधन छिन्न-भिन्न हो जाएगा। भूमि धारक और भूमिहीन वर्ग के बीच के अंतर को कम करने के लिए सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। कृषि कानून 2020 के लागू होने से दलित और आदिवासी किसानों की स्थिति और खराब हो जाएगी। उन्हें अब भी अपने श्रम का कम मूल्य मिलता है।

प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से निम्नलिखित मांग की गयी:

● सभी दलित और आदिवासियों को न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा मिले जिसमें स्वास्थ्य देख-भाल, मातृत्व-लाभ और आय-सुरक्षा की गारंटी हो। दलित महिलाओं के लिए 50% आवंटन किया जाए एवं उनके लिए विशेष अवयव योजना (स्पेशल कंपोनेंट्स प्लान) की स्थापना की जाए। साथ ही उसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए मजबूत निगरानी तंत्र सुनिश्चित किया जाए। सभी स्कूल और हॉस्टल विकलांगों के अनुकूल बनाए जाएं और विकलांगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उनका निर्माण किया जाए। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति स्कीमों को लागू करने के लिए वैधानिक प्रावधनों का अभाव है। इसलिए स्पेशल कंपोनेंट्स प्लान और ट्राईबल कंपोनेंट्स प्लान की तुरंत जरूरत है।

दलित और आदिवासी समुदाय के युवाओं के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण स्कीम है। इसके लिए पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप और राजीव गांधी नेशनल फेलोशिप और अन्य ऐसी ही फेलोशिप योजनाओं को लागू किया जाए। अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के कल्याणकारी एवं विकास की सभी स्कीमों के प्रभावी कार्यान्वयन, उत्तरदायित्व और पारदर्शिता के लिए तंत्र विकसित किया जाए। सामाजिक अंकेक्षण, शिकायत निवारण केन्द्र प्लानिंग, डिजाइनिंग और कार्यान्वयन के लिए भी मशीनरी का विकास हो। दलितों और आदिवासियों को सामान्य, नोशनल और अप्रासंगिक स्कीमों से बचाया जाए। दलितों और आदिवासी समुदायों के लिए आबादी के अनुपात में आपदा के खतरे को कम करने और जलवायु में बदलाव को अनुकूल करने के लिए फंड का आवंटन किया जाना चाहिए, जिससे कि उनकी जिजीविषा और जीने की क्षमता बनी रहे।

इन स्कीमों में आजीविका की भी व्यव्स्था हो, खासकर सूखा आदि से लड़ने के लिए भूमिहीन श्रमिकों और महिला किसानों तथा खेतों में काम करने वाले कामगारों के लिए उनकी आजीविका की व्यवस्था हो। ऐसी नई-नई योजनाओं का विकास किया जाए जो आदिवासियों और दलितों के लिए प्रासंगिक हों तथा मंत्रालयों/विभागों द्वारा स्वीकार की जा सके और जिससे दलितों आदिवासियों तथा सामान्य जाति के लोगों के बीच की दूरी कम हो। दलित महिलाओं, दलित पुरूषों, बच्चों, विकलांगों और किन्नरों को न्याय दिलाने के लिए उनको अपराध और अत्यचार से बचाने के लिए आवंटन को बढ़ाया जाए।

जाति आधारित भेदभाव और हिंसा से दलितों और आदिवासियों को बचाने के लिए स्पष्ट और मजबूत तंत्र की स्थापना की जानी चाहिए, जिससे कि पीड़ित की रक्षा हो सके। अभी जो व्यवस्था है वह नाकाफी है। फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की जाए, जिससे कि आपराधिक मामलों में पीड़ित को शीघ्र न्याय सुनिश्चित किया जा सके। जाति एवं नस्ल आधार पर पीड़ितों को जल्द से जल्द मुआवजा दिलवाया जा सके। सीधे-सीधे लाभ पहुंचाने वाली स्कीमों, जैसे पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप, होस्टल, कौशल विकास आदि स्कीमों को बढ़ाया जाना चाहिए और फंड को समय से हस्तांतरण (transfer) किया जाना चाहिए ताकि लाभार्थी को हर हाल में समय से उसका लाभ मिल सके।

जेंडर बजट स्टेटमेंट :  जेंडर बजट स्टेटमेंट लैंगिक भेदभाव को समाप्त करे। महिलाओं की सुरक्षा करें, जेंडर रेस्पोंसिव बजट होना चाहिए, जो उनकी आवश्यकताओं को समझते हुए उपाय करे और इन समुदायों जैसे  (LGBT) स्पेक्ट्रम समुदायों से किसी प्रकार का भेदभाव न हो इसके लिए उचित फंड का आवंटन किया जाए।

प्रेस कान्फ्रेंस में जॉनसन टोप्पो, भास्कर राज, अशर्फी नंद प्रसाद, दीपक बाड़ा सहित कई लोग शामिल थे।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on February 4, 2021 9:48 pm

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