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अनलॉक: कहीं बहुत महंगा न पड़ जाए कोरोना से यह युद्ध विराम?

लॉक डाउन के चार चरणों के बाद जो 25 मार्च को शुरू हुआ था, अब 8 जून से उसे अनलॉक कर दिया गया। बाजार, उद्योग, उपासना गृह सभी या तो, खुल गए हैं, या धीरे-धीरे खुल रहे हैं। स्कूल कॉलेज अगस्त में खुलेंगे। यह अलग बात है कि, हर जगह, सोशल डिस्टेंसिंग और कोरोना प्रोटोकॉल, सिगरेट की डिब्बियों पर लिखे वैधानिक चेतावनी की तरह मौजूद हैं। लोग कम निकल रहे हैं, और सतर्क भी हैं।

लेकिन इसी के साथ-साथ जिस गति से कोरोना से संक्रमित लोग बढ़ते जा रहे हैं उससे यह आशंका बढ़ने लगी है कि अभी सब कुछ दुरुस्त नहीं है। भारत आज चौथे नम्बर पर दुनिया में सबसे संक्रमित लोगों में से है। प्रतिदिन 9000 के लगभग संक्रमण के साथ-साथ हम लगभग 2,80,000 की संक्रमित संख्या पार कर चुके हैं। हमारे अस्पतालों पर, इलाज और मरीज़ों का बहुत दबाव है। दुनिया मे कोविड टेस्टिंग की तुलना में, भारत में, टेस्टिंग की गति कम है और यह भी कहा जा रहा है कि कम टेस्टिंग से संक्रमण के पूरे मामले नहीं आ पा रहे हैं। यह एक प्रकार का और संकट है जो पोशीदा है।

इस आपदा का, सबसे अधिक दबाव, सरकारी अस्पतालों पर पड़ रहा है। निजी अस्पताल इलाज के लिये महंगे हैं, और आम आदमी की तो बात छोड़ दीजिए, वे मध्यम वर्ग के लिये भी कोविड इलाज की दर को देखते हुए दुर्लभ हो रहे हैं। इसके बाद भी, वे तमाम प्रचार के बावजूद, संक्रमित मरीजों को भर्ती भी नहीं कर रहे हैं। असरदार और समर्थ लोगों की बात और है। रोज़ कोई न कोई ऐसी खबर आंख से गुज़र ही जाती है कि, इलाज के अभाव में कहीं न कहीं किसी, मरीज़ की मृत्यु हो गयी। सरकार ने अपनी प्राथमिकता में अस्पताल और पब्लिक हेल्थ के विषय को पिछले कई सालों से रखा ही नहीं।

बस आसान बीमा योजनाओं की बात की गयी है। जिनके पास मेडिक्लेम बीमा है, सरकारी नौकरी या किसी कम्पनी द्वारा मेडिकल रिइंबर्समेंट की सुविधा है, उनके लिये तो बड़ी समस्या नहीं है। पर असल समस्या है देश की दो तिहाई आबादी के लिये स्वास्थ्य सुविधाओं का जुटाना जो उपरोक्त कोटि में नहीं आते हैं। उनके लिये सरकारी अस्पताल हैं और, सरकारी अस्पताल, यह मान लिये गए कि, बदइंतजामी से भरे पड़े हैं। और उनकी, इस बदइंतजामी का उचित निदान ढूंढने के बजाय, सरकार ने, लाभ पर आधारित निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों का एक ऐसा मायाजाल फैला कर रख दिया कि एक सामान्य व्यक्ति अपना वहां इलाज करा ही नहीं सकता। या तो झोलाछाप डॉक्टर नामधारी चिकित्सकों की शरण में जाता है या घुटता रहता है।

स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण से, अस्पताल, बीमा कम्पनी, फार्मा उद्योग, पैथोलॉजी लैब का एक ऐसा दुःगठबंधन बन गया कि उसी के दुष्चक्र में इलाज के लिये लोग उलझ कर रह गए हैं । यह बात सही है कि सरकारी अस्पताल, बदइंतजामी से  भरे होते हैं, पर उसके प्रबंधन को दुरुस्त करने और उसे बेहतर बनाने की भी जिम्मेदारी तो सरकार पर ही है। हमने सरकार से यह पूछना ही छोड़ दिया कि, सरकार हमारी चिकित्सा और स्वास्थ्य के मामले में क्या कर रही है।सरकार को सरकार का ही दायित्व याद दिलाने का जन कर्तव्य हम खुद भुला चुके हैं और हमने भी यही मान लिया है कि, हर सरकारी कुप्रबंधन का इलाज निजीकरण है जो बिल्कुल सही नहीं है।

2020 का साल बेहद दुःखद और विनाशकारी सिद्ध हो रहा है। 30 जनवरी 2020 तक देश के केरल राज्य में कोविड 19 का पहला केस मिलता है, और उसके डेढ़ महीने बाद तक हम उस आसन्न खतरे से या तो गाफिल रहे, या जानबूझकर हमने अपनी आंखें मूंद रखी थी। 12 मार्च को स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि हेल्थ इमरजेंसी की ज़रूरत नहीं है। उसके पहले 24 और 25 फरवरी को नमस्ते ट्रम्प का तमाशा हो चुका था। सरकार की प्राथमिकता, कोविड प्रकोप से बचने के उपाय ढूंढने के बजाय,  मध्यप्रदेश की कमलनाथ  सरकार को अस्थिर करना था और जब मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार गिर गयी तब जाकर कोरोना आपदा की सुधि ली गयी। अचानक, लॉक डाउन का निर्णय लिया गया और 24 मार्च को 8 बजे रात चार घंटे की नोटिस पर पूरे देश की तालाबन्दी कर दी गयी।

पहले केस के मिलने के बाद, भी न तो एयरपोर्ट सील हुए और न ही हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करने का होमवर्क किया गया। न तो यह तक सोचा गया कि देशव्यापी तलाबन्दी को कैसे लागू किया जाएगा और क्या-क्या समस्याएं आ सकती हैं, और उनका समाधान क्या होगा तथा कैसे उन समस्याओं को हल किया जाएगा। यहां तक कि हमारे मेडिकल स्टाफ के पास पर्याप्त मात्रा में पीपीई किट, संक्रमण को चेक करने के लिये टेस्टिंग किट और गम्भीर मरीजों के लिये वेंटिलेटर्स तक नहीं थे। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स तक जैसे अग्रणी संस्थान के डॉक्टर और मेडिकल स्टाफ को पर्याप्त संख्या में पीपीई किट और एन 95 मास्क नहीं मिल पा रहे थे। जब देश में महामारी पूरी तरह से फैल गयी तब हम सचेत हुए और बिना समझे बूझे सरकार ने अचानक तालाबन्दी कर दी जिसका परिणाम, जितना लॉक डाउन का असर पड़ना चाहिए था, उतना नहीं पड़ा ।

बकौल सरकार, कोरोना से युद्ध की घोषणा कर दी गयी। कोरोना से युद्ध की तुलना महाभारत के महा समर से की जा रही थी। बस अंतर यही था कि महान महाभारत 18 दिनों में और यह युद्ध 21 दिनों मे जीता जाने वाला था। लेकिन हम यह युद्ध, किन सुविधाओं, रणनीति और संसाधन के बल पर जीतने वाले थे, यह न तो अब, सरकार बता पा रही है और न सरकारी दल।

अब जरा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, हमारे देश में, स्वास्थ्य ढांचे की क्या स्थिति है इस पर नज़र डालिए। शोध पत्रिका, ‘लैंसेट’ ने अपने ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ नामक अध्ययन में भारत को स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145 वें स्थान पर रखा है। हम स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का सबसे कम खर्च करने वाले देशों में आते हैं। भारत स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का महज 1.3 प्रतिशत खर्च करता है, जबकि ब्राजील स्वास्थ्य सेवा पर लगभग 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका लगभग 8.8 प्रतिशत खर्च करता है। दक्षेस देशों में अफगानिस्तान 8.2 प्रतिशत, मालदीव 13.7 प्रतिशत और नेपाल 5.8 प्रतिशत खर्च करता है। भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने पड़ोसी देशों चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी कम खर्च करता है।

2015-16 और 2016-17 में स्वास्थ्य बजट में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, लेकिन मंत्रालय से जारी बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के हिस्से में गिरावट आई और यह मात्र 48 प्रतिशत रहा। परिवार नियोजन में 2013-14 और 2016-17 में स्वास्थ्य मंत्रालय के कुल बजट का 2 प्रतिशत रहा। देश में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति 1,000 आबादी पर 1 डॉक्टर होना चाहिए, वहां भारत में 7,000 की आबादी पर मात्र 1 डॉक्टर है। दीगर ग्रामीण इलाकों में चिकित्सकों के काम नहीं करने की अलग समस्या है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में निजी अस्पतालों की संख्या 8 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 93 प्रतिशत हो गई है, वहीं स्वास्थ्य सेवाओं में निजी निवेश 75 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इन निजी अस्पतालों का लक्ष्य मात्र मुनाफा बटोरना रह गया है। एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के महंगे खर्च के कारण भारत में प्रतिवर्ष 4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। रिसर्च एजेंसी ‘अर्न्स्ट एंड यंग’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 80 फीसदी शहरी और करीब 90 फीसदी ग्रामीण नागरिक अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर देते हैं।

अब जरा वर्तमान स्वास्थ्य ढांचे से जुड़े कुछ तथ्य और आंकड़ों पर नज़र डालते हैं। इंडिया टुडे डेटा इंटेलिजेंस यूनिट ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से उपलब्ध कराए गए स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया। ये डेटा मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल रिपोर्ट्स में

उपलब्ध कराया है। इसके विश्लेषण से, निकली तस्वीर अधिक आश्वस्त करने वाली नहीं है।

● राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल 2019 के मुताबिक भारत में करीब 26,000 सरकारी अस्पताल हैं, जो केंद्र, राज्य सरकार या स्थानीय प्रशासन की ओर से चलाए जाते हैं।

● इस प्रकार करीब एक लाख लोगों पर दो अस्पताल आते हैं (47,000 लोगों के लिए एक अस्पताल) यह  तथ्य 2011 की जनगणना

के आधार आधारित है।

● राज्यवार विश्लेषण से यह तथ्य निकलता है कि सरकारी अस्पतालों की संख्या और आबादी के अनुपात में, कम आबादी वाले छोटे राज्य बेहतर हैं क्योंकि डिनॉमिनेटर छोटा है।

● अरुणाचल प्रदेश में हर एक लाख आबादी पर 16 अस्पताल हैं।

● जहां तक बड़ी आबादी वाले बड़े राज्यों का सवाल है तो उनका एक लाख लोगों पर अस्पतालों की संख्या राष्ट्रीय औसत से कम है।

● आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली, गुजरात और छत्तीसगढ़ में देश की 21% आबादी रहती है। लेकिन इन राज्यों में अस्पतालों की संख्या प्रति लाख लोगों पर एक भी नहीं बैठती है।

● आंध्र प्रदेश में हर दो लाख की जनसंख्या पर एक अस्पताल है।

● महाराष्ट्र में हर 1.6 लाख लोगों पर एक अस्पताल का औसत है।

● मध्य प्रदेश में 1.56 लाख पर एक अस्पताल है।

● गुजरात में 1.37 लाख और छत्तीसगढ़ में 1.19 लाख लोगों पर 1-1 अस्पताल उपलब्ध है। वहीं राष्ट्रीय औसत 47,000 लोगों पर एक अस्पताल का है।

● अरुणाचल प्रदेश 6,300 की आबादी पर एक।

● हिमाचल प्रदेश में, 8,570 लोगों पर एक-एक अस्पताल उपलब्ध हैं।

● दिल्ली में 1.54 लाख पर 1 अस्पताल।

● डॉक्टर्स की संख्या देखी जाए तो भी ऐसी ही तस्वीर सामने आती है। आंकड़े बताते हैं कि देश में कुल 1,16,757 एलोपैथिक डॉक्टर्स हैं।

● 10,700 लोगों पर 1 डॉक्टर का औसत बैठता है।

● अस्पतालों और डॉक्टर्स की संख्या से अलग अगर बुनियादी अस्पताल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कि नर्स, मिडवाइव्स और अस्पताल बिस्तरों की बात की जाए तो ये संख्या भी कम है। डीआईयू सरकारी अस्पतालों में स्किल्ड प्रोफेशनल्स पर इस मामले में भी काफी दबाव है।

● सरकारी अस्पतालों में रजिस्टर्ड नर्स और मिडवाइव्स की संख्या करीब 20.5 लाख है। इसके मायने हर 610 लोगों पर एक नर्स का औसत बैठता है।

● अस्पताल में बिस्तरों की संख्या देखी जाए तो भारत की विशाल आबादी की तुलना में यह बहुत कम है।

●  देश के 25,778 सरकारी अस्पतालों में 7.13 लाख बिस्तर उपलब्ध हैं।

● इसका अर्थ यह है कि, हर 10,000 लोगों पर मुश्किल से 6 बिस्तर ही उपलब्ध हैं।

● इस मामले में बिहार की हालत सबसे दयनीय है। बिहार में हर 9,000 लोगों पर सिर्फ एक बिस्तर उपलब्ध है।

● झारखंड, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, हरियाणा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और मणिपुर में करीब 2,000 लोगों पर एक सरकारी अस्पताल बिस्तर उपलब्ध है।

● पिछले 10 साल में स्वाइन फ्लू या H1N1 इंफ्लुएंजा भारत में सबसे घातक संक्रामक बीमारी साबित हुई हैं। 2015 में इसका संक्रमण फैलने से 42,592 मामले सामने आए जिनमें 2,990 मौतें हुईं।

● इसमें मृत्यु दर 7.02 फीसदी रही। 2015-18 में कुल 6,600 लोगों की जान H1N1 इंफ्लुएंजा की वजह से गई।

इस आपदा का दुष्प्रभाव, न केवल जन स्वास्थ्य पर पड़ रहा है बल्कि इसका असर, दुनिया भर में गरीबी पर भी पड़ रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) द्वारा प्रकाशित ‘स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट इन फिगर्स 2020’ रिपोर्ट में महामारी के बड़े पैमाने पर होने वाले आर्थिक प्रभाव के बारे में विस्तार से बताया गया है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक गरीबी दर में 22 वर्षों में पहली बार वृद्धि होगी। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘वैश्विक आबादी का 50 फीसदी हिस्सा लॉकडाउन में बंद हैं, जिनकी आय या तो बहुत कम है अथवा उनके पास आय का कोई साधन नहीं है। आय का स्रोत समाप्त हो जाने से चार से छह करोड़ लोग आने वाले महीनों में गरीबी में जीवन व्यतीत करेंगे।

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘भारत की गरीब आबादी में एक करोड़ बीस लाख लोग और जुड़ जाएंगे जो विश्व में सर्वाधिक है।’

सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण के अनुसार, पिछले चार सालों में हुई मौसम की घटनाएं दुनिया भर के आर्थिक जोखिमों में सबसे आगे हैं। उन्होंने कहा, ‘हमारी एकतरफा और खराब विकास रणनीतियों के साथ इसका असर भारत के गरीबों पर बहुत अधिक हुआ है और कोरोना वायरस महामारी का प्रभाव भी अब इस दुर्भाग्य के साथ जुड़ गया है। ’नारायण ने कहा कि सीएसई के नए प्रकाशन में इन्हीं बातों को स्पष्ट रूप से कहा गया है। इसे गुरुवार को ऑनलाइन सेमिनार में जारी किया गया। इसमें 300 लोगों ने हिस्सा लिया।

ज्ञातव्य है कि, बीते अप्रैल महीने में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी कहा था कि कोरोना वायरस के चलते दुनिया भर में भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है। विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डेविड बीस्ले ने कहा था कि पूरी दुनिया में हर रात 82 करोड़ 10 लाख लोग भूखे पेट सोते हैं। इसके अलावा 13 करोड़ 50 लाख लोग भुखमरी या उससे भी बुरी स्थिति का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा था, ‘विश्व खाद्य कार्यक्रम के विश्लेषण में पता चला है कि

” 2020 के अंत तक 13 करोड़ और लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच सकते हैं। इस तरह भुखमरी का सामना कर लोगों की कुल संख्या बढ़कर 26 करोड़ 50 लाख तक पहुंच सकती है।”

इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के श्रम निकाय ने चेतावनी दी थी कि

” कोरोना वायरस संकट के कारण भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी में फंस सकते हैं और अनुमान है कि इस साल दुनिया भर में 19.5 करोड़ लोगों की पूर्णकालिक नौकरी छूट सकती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने अपनी रिपोर्ट ‘आईएलओ निगरानी- दूसरा संस्करण: कोविड-19 और वैश्विक कामकाज’ में कोरोना वायरस संकट को दूसरे विश्व युद्ध के बाद सबसे भयानक संकट बताया था।

आंकड़े डराते भी हैं और साथ साथ वे ज़मीनी हक़ीक़त दिखा कर समस्याओं के समाधान की ओर प्रेरित भी करते हैं। इस महामारी से सबसे बड़ी सीख यह मिली है कि हमें अपने स्वास्थ्य ढांचे को बढ़ती आबादी और रोगों के अनुसार और अधिक समृद्ध करना होगा। कोविड 19 की आपदा से तो इटली, अमेरिका जैसे देश जहां स्वास्थ्य ढांचा बेहद समृद्ध है, वे भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, हमारा हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर तो सामान्य स्थानीय बड़ी मौसमी बीमारी जैसे काला ज़ार, इंसेफेलाइटिस, आदि भी नहीं झेल पाता है, फिर यह तो अकल्पनीय स्थिति है ही।

भारत में आज़ादी के बाद, जब पंचवर्षीय योजनाएं शुरू हुईं तो आपने स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास क्रमबद्ध तरह से शुरू किया। मलेरिया, चेचक, पोलियो, आदि संक्रामक रोगों के सघन टीकाकरण अभियान भी खूब चले। यह सब सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र में ही चले। ये अभियान अपने लक्ष्यों में काफी हद तक, सफल भी हुए। लेकिन 1991 में जब निजीकरण की बयार बहनी शुरू हुयी तो लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा भी धीरे धीरे नेपथ्य में जानी शुरू हो गयी। चिकित्सा और शिक्षा जो सबसे पवित्र और मिशनरी कार्य समझा जाता था, वह लाभ का एक उद्योग समझ लिया गया।

स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी अस्पताल और मेडिकल कॉलेज उद्योग की तरह हो गए और जनता उपभोक्ता तथा, सरकार या तो बिचौलिया बन गयी या बेबस हो गयी। अब सरकार और नीति नियंताओं को, यह बात सोचनी होगी कि, स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर में सरकार का योगदान निजी क्षेत्र से अधिक होना चाहिए और इस संदर्भ में जो भी योजना बने वह जनोन्मुख हो, जनहित में हो और लोककल्याणकारी हो। जब बात लोककल्याणकारी राज्य की होती है तो, भोजन, वस्त्र और आश्रय के बाद  उसका प्रारंभ ही शिक्षा और स्वास्थ्य से होता है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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This post was last modified on June 11, 2020 9:30 am

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