Tuesday, December 7, 2021

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ख़ास रिपोर्ट: एक साल में तीन-तीन आपदाओं से लकवाग्रस्त हो गया है उत्तराखंड

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16 अक्टूबर को उत्तराखंड में अच्छी धूप खिली हुई थी और मौसम बेहद सुहावना था। इस साल मानसून लंबा चला था और राज्य में सूरज ने काफी लंबे अर्से से आँख-मिचौली खेलने के बाद अब खुलकर अपने दर्शन दिए थे। पर्यटकों के लिए भी दशहरे के आसपास और इसके बाद का मौसम उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में सबसे अधिक आकर्षक होता है। एक तो बरसात जा चुकी होती है, आसमान पूरी तरह से साफ़ हो चुका होता है, दशहरे और दुर्गा पूजा की छुट्टियाँ और खासकर बंगाली पर्यटकों के देशाटन का शौक अपने पूरे शबाब पर होता है। जो हिमालय बड़ी मुश्किल से कुछ ही जगहों पर साल के बाकी दिनों में दिख पाता है, उसे इन दिनों कुनकुनी धूप और सरसराती ठंड के बीच में बिल्कुल साफ़-साफ़ देख पाना सोने पर सुहागा साबित होता है।

लेकिन फिर भारतीय मौसम विभाग की ओर से सलाह भरी चेतावनी जारी हो जाने के बाद लोगों के लिए बेहद असमंजस की स्थिति बन चुकी थी। उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल में अपने महाराष्ट्र के मित्रों के साथ लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता विद्या भूषण रावत पहुंचे हुए थे, और उनके अनुसार वे बुग्याल से सिर्फ चार किलोमीटर दूर ही रह गए थे, जब मूसलाधार बारिश ने उन्हें मजबूर कर दिया कि वे अपनी इस यात्रा को बीच में ही रद्द कर दें। कहना न होगा कि इतनी मेहनत से आधे रास्ते पर पहुंचकर यदि आप बुग्याल की नर्म-नर्म घास पर एक दो घंटे भी न लोट-पोट सकें तो उसकी थकान, दसियों गुना बढ़ जाती है। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अगले दिन गंगोत्री से गोमुख की यात्रा का जोखिम उठाया, और उसे भी उन्हें बीच रास्ते में ही छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। सभी इस बात को समझ सकते हैं कि इन दो वर्षों में बड़ी मुश्किल से इस प्रकार की आउटिंग का कार्यक्रम बनता है। उस पर मौसम विभाग की अप्रत्याशित चेतावनी कई बार सही तो कई बार लगता है गलत साबित हो गई है, ने भी कईयों को ऐसे फैसले लेने के लिए बाध्य किया है।

इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा, कि इस बार की मौसम विभाग की चेतावनी न सिर्फ सही साबित हुई, बल्कि इसने सभी पूर्वानुमानों के अब तक के रिकॉर्ड के परखच्चे उड़ा दिए। उससे भी अधिक अभी तक अतिवृष्टि और बादल फटने की अधिकांश घटना या तो गढ़वाल के कई जिलों में देखने को मिलती थी या फिर कुमाऊँ के पिथौरागढ़ के सीमावर्ती इलाकों में ही इसका दंश झेलना पड़ता था। लेकिन इस बार सभी को चौंकाते हुए सबसे अधिक मार नैनीताल शहर और जिले के विभिन्न पहाड़ी एवं हिमालय के तराई और फुटहिल्स पर देखने को मिला है, जिससे सभी लोग हैरान परेशान हैं।
बीते रविवार को आम तौर पर उत्तराखंड और मुख्य तौर पर कुमाऊँ क्षेत्र में हुई असमय बरसात पर नैनीताल स्थित जल विज्ञान शोधार्थी एवं पूर्व पत्रकार कविता उपाध्याय लिखती हैं “उत्तराखंड के दर्ज इतिहास में अभी तक इतनी बारिश नहीं हुई है, जितनी पिछले 24 घंटे के दौरान देखने को मिली है।”

वे आगे लिखती हैं “इस सन्दर्भ में मैंने देहरादून स्थित मौसम केंद्र के निदेशक विक्रम सिंह से बातचीत की। उनका कहना था कि पिछले 124 वर्षों के बारिश का आंकड़ा उपलब्ध है, लेकिन 1897 से अभी तक के जो आंकड़े हैं उनमें उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में हुई बारिश में यह सर्वाधिक है”।

विक्रम सिंह के मुताबिक: 1) 1897 में नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर में मौसम भवन की स्थापना की गई थी। सबसे अधिक बारिश 18 सितंबर 1914 को 254.5 मिमी दर्ज की गई थी। लेकिन पिछले 24 घंटे में मुक्तेश्वर स्टेशन में 340.8मिमी बारिश दर्ज की गई है।
2) 1962 में, वर्तमान के उधम सिंह नगर के पंतनगर में मौसम भवन की स्थापना की गई थी। अभी तक वहां पर सबसे अधिक बारिश 10, जुलाई 1990 में 228मिमी दर्ज की गई थी। पिछले 24 घंटों में पंतनगर में 403.9मिमी बारिश दर्ज की गई है।
आंकड़ों की बात करें तो मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में अक्टूबर माह के पहले 18 दिनों में 178.4मिमी बारिश की खबर है, जो कि औसत से 485% अधिक है। मंगलवार की सुबह से जो मूसलाधार बारिश शुरू हुई उसने चमोली गढ़वाल और उधम सिंह नगर जैसे जिलों में औसत से तकरीबन 10,000% अधिक बरसात लाने का काम किया।

भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक, 2015 से अभी तक 7,750 से अधिक भीषण बारिश और बादल फटने की घटनाएं घट चुकी हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश पिछले 3 वर्षों के दौरान देखने को मिली हैं। बता दें कि अतिवृष्टि की घटना को उसी दशा में दर्ज किया जाता है जब 24 घंटों के दौरान 204मिमी से अधिक पानी बरसा हो।
इस साल जुलाई तक राज्य में ऐसी अतिवृष्टि की कुल 979 घटनाएं दर्ज की जा चुकी थीं। वहीं 2020 में पूरे वर्ष भर में ऐसी कुल 1,632 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जबकि 2018 में सबसे अधिक 3,706 घटनाएं दर्ज की गई थीं।

ये आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। लेकिन ठहरिये जनाब!
मौसम के विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में बादल फटने या अतिवृष्टि की घटनाएं कुल दर्ज घटनाओं से काफी अधिक होने की संभावना है, क्योंकि अधिकांश स्थानों पर उन्हें मापने के लिए मौसम कक्ष मौजूद नहीं हैं। इसी प्रकार से बादल फटने की परिघटना को भी मापा जाता है, जिसे पारंपरिक तौर पर किसी सीमित भौगोलिक क्षेत्र के कुछ वर्ग किमी में यदि 100मिमी/प्रति घंटे से अधिक की बारिश दर्ज हुई तो उसे बादल फटने के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। फिलहाल राज्य में सिर्फ 25 मौसम वेधशाला सुचारू रूप से कार्यरत हैं, जो कि जाहिर है कि बेहद अपर्याप्त हैं।

इस भयानक बारिश के लिए कुछ विशेषज्ञ तापमान के संकट अर्थात जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, लेकिन स्थानीय पारिस्थितिकी, असुंतलित एवं अनियोजित विकास, अवैज्ञानिक ढंग से सड़कों के लिए पहाड़ों का कटान और अब तो ऋषिकेश से पहाड़ों पर रेल पहुंचाने की जिद में जगह जगह हिमालय में सुरंगें खोदी जा रही हैं, जिनके चलते 2014 से पिछले सात वर्षों में 4,000 से अधिक जिंदगियों को हम खो चुके हैं और 1,961 बड़े भू-स्खलनों से हमें दो-चार होना पड़ा है।
राज्य से मानसून की विदाई के बाद जन-जीवन अब पटरी पर लौटने लगा था, लेकिन पश्चिमी विक्षोभ ने एक बार फिर से जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। राज्य में 17 अक्टूबर को सुबह बारिश का सिलसिला शुरू हुआ था, जो लगातार 18 अक्टूबर की शाम तक चलता रहा।

अक्टूबर में इतनी भारी बारिश क्यों हुई? इस बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि उत्तराखंड में एक बार फिर ठीक वैसी ही परिस्थितियां बनीं जैसी 16-17 जून 2013 बनी थी, जब केदारनाथ सहित राज्य के अन्य हिस्सों में तबाही हुई थी। उत्तराखंड के रानीचौरी में वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के तहत, वानिकी कालेज में पर्यावरण विभाग के अध्यक्ष एवं भूवैज्ञानिक डॉ. एसपी सती इस अतिवृष्टि के लिए पश्चिमी विक्षोभ को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि यदि मानसून को हटा दिया जाए तो इस बार वातावरण में जून 2013 जैसी स्थिति बनी हुई थी।
वे कहते हैं कि एक मजबूत पश्चिमी विक्षोभ उत्तराखंड में सक्रिय था और इसी के साथ इस क्षेत्र में एक कम दबाव वाला क्षेत्र बन गया। इसके चलते बंगाल की खाड़ी तक की हवाएं इस क्षेत्र में जमा हो गईं, जिसके नतीजे के तौर पर यह अप्रत्याशित बारिश देखने को मिली है।

उत्तराखंड में जहाँ एक तरफ ग्रामीण क्षेत्रों से भयानक पलायन जारी है, वहीं पहाड़ के शहरी और पर्यटक स्थलों पर अंधाधुंध भवन, होटल, स्पा और अस्थाई रिहायशी इलाके कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ते जा रहे हैं। अनुमान है कि मंगलवार को नैनीताल में 18-20,000 से अधिक पर्यटक मौजूद थे। एक आंकड़े के मुताबिक सन 1901-02 में नैनीताल झील के आस-पास जहाँ कुल 502 इमारतें हुआ करती थीं, आज इसकी ढलान पर ऐसी 7,000 से अधिक इमारतें मौजूद हैं।

भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले 3 वर्षों से भारत में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश हो रही है। कई जगहों पर देखने को मिल रहा है कि जिन स्थानों पर बारिश कम हुआ करती थी, वहां पर अपेक्षाकृत अधिक बारिश हो रही है, वहीं सामान्य से अधिक बरसात वाले पारंपरिक स्थानों पर कम बारिश हो रही है।

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कश्मीर जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में कभी कभार बादल फटने की घटनाएं अब आम हो चली हैं, जिसमें एक ही स्थान पर अचानक से बादल बूंदाबांदी की जगह सीधे आसमान से पानी छोड़ दे रहे हैं। आम तौर बादल फटने की घटनाएं हिमालय के अपेक्षाकृत ऊँचे और दूर-दराज के इलाकों में ज्यादा देखने को मिलती थीं, लेकिन पिछले दो तीन वर्षों से इसे तराई से सटे पहाड़ी क्षेत्रों में भी देखा जा रहा है।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि अब हिमालय का कोई भी क्षेत्र निरापद नहीं रहा। इस बीच नैनीताल शहर और जिले में सबसे अधिक तबाही इस बार देखने को मिली है। नैनीताल में 24 घंटे में 500मिमी से अधिक बारिश हुई थी, जिसके चलते जिस नैनी झील में कई वर्षों से गर्मियों के सीजन में पानी काफी कम होता जा रहा था, वह झील अप्रत्याशित रूप से पहली बार न सिर्फ लबालब भर गई, बल्कि इसने अपनी सीमा को तोड़ते हुए शहर की मुख्य सड़क माल रोड तक को अपने में समाहित कर लिया था।

नैनीताल के दो गांवों में मकानों के गिरने से भारी जान-माल का नुकसान हुआ है। रामगढ़ ब्लॉक के झुतिया गांव में मलबा आने से घर में सो रहे एक ही परिवार के 9 लोगों की मौत हो गई थी। परिवार का एक सदस्य जान बचाकर भागने में सफल रहा, लेकिन इस प्रक्रिया में वह भी गंभीर रूप से घायल हो गया है।
नैनीताल जिले के ही धारी तहसील के एक अन्य गांव चौखुटा में मलबे की चपेट में आने से छह मजदूरों के मारे जाने की खबर है। ये मजदूर यहां पर भवन निर्माण के कार्य में लगे थे और एक ही मकान में रह रहे थे। नैनीताल जिले के भीमताल में भी एक मकान ढहने से एक बच्चे की मौत की खबर थी।

अल्मोड़ा जिले में भिकियासैंण तहसील के रापड़ गांव में मलबा आने से एक पत्रकार आनन्द सिंह नेगी और उनके साथ रह रहे उनकी बहन के दो बच्चों की मौत हो गई। अल्मोड़ा जिले के हीरा डूंगरी में मकान की दीवार गिरने से एक किशोरी की मौत हो गई। बागेश्वर जिले की कपकोट तहसील के भगार गांव में पहाड़ी से गिरे पत्थर की चपेट में आने से एक युवक की मौत हुई है।

यह सिर्फ कुछ बानगी है, हल्द्वानी, काठगोदाम, रानीबाग के इलाके में रेलवे ट्रैक सहित कोठगोदाम रेलवे स्टेशन का एक बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है। ऊधमसिंह नगर के टनकपुर में भी शारदा नदी के बहाव के कारण 100 मीटर रेल लाइन बह गई थी। ऊधमसिंह नगर के जिला मुख्यालय रुद्रपुर में 24 घंटे में 483 मिमी और इसी जिले के गूलरभोज में 473 मिमी बारिश दर्ज की गई थी।

इस दौरान गढ़वाल मंडल के चमोली जिले के जोशीमठ में 185 मिमी और रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय में 109 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। टिहरी जिले के देवप्रयाग में 121 मिमी और श्रीनगर में 128 मिमी बारिश हुई। ये सभी जगह केदारनाथ-बदरीनाथ मार्ग पर स्थिति हैं। ऋषिकेश-बदरीनाथ और रुद्रप्रयाग-केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग जगह-जगह बंद पड़े थे, जिसके चलते इन मार्गों में हजारों तीर्थयात्री लंबे समय तक फंसे रहे।

राज्य के कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में देर रात तक बारिश का सिलसिला जारी रहा। पश्चिमी विक्षोभ के असर के कारण राज्य में कई जगहों पर अत्यधिक भारी बारिश दर्ज की गई। बागेश्वर, चम्पावत, पिथौरागढ़, नैनीताल, पौड़ी और चम्पावत जिलों में 100 से 230 मिमी तक बारिश रिकॉर्ड की गई, जबकि अल्मोड़ा, चमोली और रुद्रप्रयाग जिलों में 70 से 100 मिमी तक बारिश हुई। देहरादून, हरिद्वार, टिहरी और उत्तरकाशी जिलों में सामान्य बारिश हुई।

सबसे ज्यादा 230 मिमी बारिश चम्पावत जिले के पंचेश्वर में हुई। यहां 230 मिमी बारिश दर्ज की गई। चम्पावत जिला मुख्यालय में 219, लोहाघाट में 175 मिमी बारिश हुई। पौड़ी जिले के लैंसडौन में 229 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई। सतपुली में 204, कालागढ़ में 113 और कोटद्वार में 117 मिमी बारिश हुई। ऊधमसिंह नगर जिले के गूलर भोज में 165 और काशीपुर में 162 मिमी बारिश हुई। बागेश्वर के सामा में 121 और डंगोली में 106 मिमी बारिश दर्ज की गई। नैनीताल जिले के ज्योलीकोट में 148 और भीमताल में 133 मिमी बारिश हुई। चमोली जिले के औली में 87 मिमी, रुद्रप्रयाग के केदारनाथ में 85 मिमी और अल्मोड़ा के ताकुला में 98 व सल्ट में 92 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई।

राज्य के पौड़ी और चम्पावत जिलों में इस दौरान भूस्खलन और मलबा आने से 5 लोगों की मौत हो गई और 2 गंभीर रूप से घायल हो गये। सबसे ज्यादा बारिश वाले चम्पावत जिले के सेलाखोला गांव में पहाड़ी से भारी मात्रा में मलबा एक मकान पर गिर गया। इस घटना में 48 वर्षीय महिला और उसके 17 वर्षीय बेटे की मौत हो गई। उधर पौड़ी जिले के लैंसडौन में बारिश का कहर टूटा। यहां एक निर्माणाधीन मकान में मजदूरी करने वाले परिवारों के डेरे मलबे की चपेट में आ गये और 5 लोग मलबे में दब गये। सूचना मिलते ही एसडीआरएफ और पुलिस की टीम ने मौके पर पहुंचकर बचाव अभियान शुरू किया। सभी को मलबे से निकाला गया, लेकिन तब तक दो महिलाओं और 4 वर्षीय बच्ची की मौत हो गई थी। दो लोगों को कोटद्वार हॉस्पिटल भेजा गया। इसके अलावा रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय के पास पहाड़ी से गिरे पत्थर की चपेट में आकर तीर्थयात्रा में आये कानपुर के एक युवक की मौत हो गई।

नैनीताल के ही एक अन्य पर्यटक स्थल रामगढ़ का दृश्य तो बेहद डरावना था। अपनी खूबसूरती और सेव खुबानी की बेल्ट के लिए प्रसिद्ध रामगढ़ में जगह जगह पर छोटे छोटे नाले, भीषण नदी की तरह फुफकार मारते देखे गये। घरों के बीच की गलियों ने उफनते नाले का रूप धारण कर लिया था, जिसे पार करने पर जान जाने का जोखिम बना हुआ था। कई नए घर बने थे, जिनके नीचे की मिट्टी इस बरसात में खिसक चुकी है और कभी भी इनके भरभराकर गिरने का खतरा बना हुआ है। रामगढ़ के एक इलाके में दो लोग इस बाढ़ में फंसे दिखाई दिए। चूँकि सामने सड़क एक नाला बन चुकी थी, और पीछे कुछ मकानों के बाद दूसरी तरफ भी तेज गति से पानी बह रहा था, ऐसे में वे एक रस्सी में पत्थर को बांधकर दूसरी तरफ मौजूद लोगों के पास बार-बार फेंक रहे थे, लेकिन वह वहां तक नहीं पहुँच रहा था। सोचिये, एक ही मोहल्ले में जहाँ पर कल तक सड़क पर पैदल घूमा फिरा जाता था, टापू बन गया था।

इसी प्रकार एक ब्लॉगर जो कि मूलतः पंजाब के रहने वाले हैं, ने दो दिनों की बारिश में उंचाई पर स्थित अपने मकान, बाजार, नाले से नदी बन चुके पास के नौले का वीडियो और विश्लेषण करते हुए बताया कि किस प्रकार वे अपने 10 साल के रामगढ़ प्रवास में सबसे भयानक घटना के गवाह बन रहे हैं, जिसमें घर तक पहुँचने के लिए बनाई गई पत्थरों की सीढ़ीदार राह भी मटियामेट हो चुकी है, पीने के पानी का टैंक नष्ट हो गया, कई घरों में जो वर्षों पहले बनाये गए थे, जमींदोज हो चुके हैं और घरों के भीतर गाद भर चुकी है।

नैनीताल के ही एक उपनगर रामनगर जिसे जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के लिए दुनियाभर में जाना जाता है, का हाल भी कहीं से भी अलग नहीं था। गढ़वाल और रानीखेत के लिए जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बसे जिम कार्बेट के मुख्य द्वार के दोनों तरफ पिछले कुछ दशकों में मोहान से लेकर ढिकुली लदुआ तक विभिन्न पंच सितारा होटलों की भरमार है। इनमें सबसे अधिक चर्चा मोहान के समीप नदी के पास बने होटल लेमन ट्री की तस्वीरों ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी और खींचा है। पानी में डूबी कारों के बीच ग्राउंड फ्लोर तक कोसी के पानी की मार ने वहां पर मौजूद 200 से अधिक पर्यटकों की साँस ही थामकर रख दी थी। कई घंटों तक छतों और अन्य जगहों पर खुद को सुरक्षित रखने के बाद आपदा राहत की मदद से उन्हें सुरक्षित ठिकानों के लिए निकाला गया। इसी तरह पानी में डूबी कारों को क्रेन की मदद से बाहर निकाला गया। ढिकुली निवासी हरीश अधिकारी ने बताया कि जिस दिन यह घटना घटी उसके एक दिन पहले तक यहाँ पर जमकर बारिश हुई थी, लेकिन अचानक से कोसी के अगले दिन बढ़ जाने ने सबको बुरी तरह से चौंका दिया था।

अभी भी प्रदेश के कई दूर-दराज के इलाकों में प्रदेश वासी फंसे हुए हैं। उदाहरण के लिए पिथौरागढ़ के कई सुदूरवर्ती क्षेत्रों में अभी एनडीआरएफ की टीम नहीं पहुँच सकी है। दिल्ली से जनचौक के ही पत्रकार और फोटो जर्नलिस्ट आजाद शेखर के बेटे ने पिछले हफ्ते मित्रों के साथ उत्तराखंड के चीन से सटे तिब्बत मार्ग पर ट्रैकिंग पर जाने की ठानी। लेकिन धारचूला से लगभग 80 किमी की दूरी पर गुंजी के पास जब भारी बारिश और भूस्खलन से उनका साबका हुआ तो उन्हें मजबूरन पिछले 3-4 दिनों से एक ही स्थान पर रुकने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

आपको बता दें कि गुंजी अपने आप में एक सामान्य इलाका नहीं है, बल्कि मानसरोवर पैदल यात्रा के लिए प्राचीन काल से ही इस मार्ग का उपयोग किया जाता था, और तिब्बत एवं भारत की सीमा पर स्थानीय निवासियों के लिए व्यापार का केंद्र रहा है। यहाँ पर इन युवाओं सहित करीब 50-60 स्थानीय लोग भी फंसे हुए हैं, जो शिव की किसी स्थानीय पूजा में वहां पर पहुंचे हुए थे। अभी तक रेस्क्यू टीम या हेलीकाप्टर का कोई अता पता नहीं है। संपर्क का साधन भी न्यून है और शेखर जी को दो दिन में एक बार काफी मुश्किल से वहां से व्हाट्सएप संदेश के माध्यम से बेटे की कुशल क्षेम मिल पा रही है। फिलहाल इतने दिन अटके होने के बाद इन युवाओं ने पैदल ही वापस आने की ठानी है, जो कहीं से भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि जगह जगह भूस्खलन और नदी नालों में उफान के कारण ऐसा करना निरापद नहीं है। लेकिन ऐसे सैकड़ों लोग भोजन, पानी और पैसे के अभाव में मजबूरन अपने-अपने सुरक्षित ठिकानों पर जाने के लिए मजबूर हैं।

लेकिन इस भीषण तबाही और जानमाल के नुकसान के बाद आश्वस्त करती हुई राजनीतिक जुबान से जो सुनने को मिलता है, वह किसी धमाके से कम नहीं है, लेकिन हमारी मृत होती संवेदनाओं को वह झकझोर पाए इस दशा में हम नहीं हैं। देश के केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देहरादून में संवावदाताओं के साथ अपनी बातचीत में बताया था कि नव राज्यपाल, मुख्यमंत्री सहित आपदा प्रबंधन मंत्री के साथ आपदा प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद जो कुछ कहा उसे बेहद ध्यान से सुनना और समझना चाहिए।

उनका कहना था कि भारत सरकार के द्वारा समय पर सूचना दिए जाने के कारण बेहद कम मात्रा में नुकसान हुआ है, जान-हानि बहुत कम हुई है। इसी प्रकार समय पर चेतावनी के कारण चारधाम यात्रा के यात्रियों को भी समय पर रोक दिया गया, अब फिर से इसे खोल दिया है। बिजली की आपूर्ति भी तेजी से बहाल की जा रही है। सड़कें खुल रही हैं, रेलवे ट्रैक को दुरुस्त किया जा रहा है, 80% टेलीफोन नेटवर्क दुरुस्त हो चुका है, केंद्र सरकार राज्य सरकार को पूरी-पूरी सहायता देगी। नए मुख्यमंत्री की पीठ थपथपाते हुए पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में अच्छे काम की जमकर तारीफ़ भी की गई।

इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि एक साल से भी कम समय में तीन-तीन भयानक आपदाओं और महामारी से लकवाग्रस्त उत्तराखंड की जनता अभी अपने होश संभालने लायक हो भी नहीं पाई कि अगले वर्ष की शुरुआत में आगामी चुनावों में वोट और नई सरकार के रूप में उसके पास वही विकल्प एक बार फिर से बचा है जो उसे विकास की उस वैतरणी पर देहरादून, दिल्ली से देश के अंतिम गाँव माणा तक लग्जरी यात्रा के सपने दिखाने वाले हैं, जिसके नीचे आज भी उत्तराखंड के लोगों की 20 साल पुरानी नए राज्य की लड़ाई की जीत या चोट के निशान रह-रह के हरे हो जाते हैं, और वह और भी तेजी से पहाड़ को छोड़ मैदान की तरफ भागने लगता है।

(रविंद्र सिंह पटवाल लेखक और टिप्पणीकार हैं और जनचौक से जुड़े हैं।)

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