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‘जजों का तबादला उनके खिलाफ शिकायतों का समाधान नहीं’

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एस. अब्दुल नज़ीर की पीठ ने जस्टिस अकील कुरैशी की पदोन्नति के मामले में कॉलेजियम की सिफारिश लागू करने के केंद्र को निर्देश देने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ की याचिका पर सुनवाई के दौरान जहां एक ओर कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण न्यायिक प्रशासन के लिए अहम होते हैं और इसमें किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप इस संस्था के लिए अच्छा नहीं है। वहीं दूसरी और जस्टिस  डीवाई चंद्रचूड ने कहा कि न्यायाधीशों का स्थानांतरण, उनके खिलाफ शिकायतों का समाधान नहीं है। जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि  महाभियोग और स्थानांतरण के बीच कुछ भी नहीं है। हमें एक ऐसी प्रणाली की आवश्यकता है, जो वर्तमान प्रणाली की तुलना में न्यायाधीशों को जवाबदेह बनाने के लिए अधिक प्रभावी हो।

चीफ जस्टिस  रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली कॉलेजियम ने 10 मई को जस्टिस कुरैशी को पदोन्नति देकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की थी। हालांकि बाद में कॉलेजियम ने जस्टिस कुरैशी को त्रिपुरा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की। पीठ ने गुजरात उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ (जीएचसीएए) की याचिका लंबित रखते हुए कहा, ‘नियुक्तियां और तबादले न्याय प्रशासन की तह तक जाते हैं और जहां न्यायिक समीक्षा प्रतिबंधित है। न्याय प्रशासन की व्यवस्था में हस्तक्षेप संस्थान के लिए अच्छा नहीं होता।

शिकागो विश्वविद्यालय के दिल्ली केंद्र में प्रोफेसर टॉम गिन्सबर्ग और अजीज जेड हक की पुस्तक ‘हाउ टू सेव ए कॉन्स्टीट्यूशनल डेमोक्रेसी’ के विमोचन के अवसर पर जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि भारतीय संविधान में केवल दो संभावनाएं हैं ,एक महाभियोग और दूसरा स्थानांतरण। हर स्थिति में महाभियोग  एक उपयुक्त उपचार नहीं है। इसी तरह एक न्यायाधीश के लिए, जहां वह तैनात है और वहां के लिए एक समस्या है, को स्थानांतरित करना कोई समाधान नहीं है। जस्टिस चंद्रचूड की यह टिप्पणी मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश वी के ताहिलरामनी के इस्तीफे के मद्देनजर महत्वपूर्ण है। मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश वी के ताहिलरामनी का स्थानांतरण मेघालय उच्च न्यायालय कर दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि जब जस्टिस ताहिलरामनी के तबादले के खिलाफ उनके अनुरोध पर कोलेजियम ने पुनर्विचार नहीं किया तो विभिन्न क्षेत्रों में इसकी तीखी आलोचना हुई लेकिन कोलेजियम ने अपने फैसले को सकारण बताते हुए उन कारणों को उजागर नहीं किया था। उन्होंने कहा कि असहमति लोकतंत्र में एक सुरक्षा वाल्व की तरह होती है; यदि आप इसे दबाने की कोशिश करते हैं तो प्रेशर कुकर फट जाएगा और स्वतंत्रता को पुलिस या अधिकारियों की वेदी पर बलिदान नहीं किया जा सकता है।

जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि यह समझना महत्वपूर्ण है कि आप अपने न्यायाधीशों पर भरोसा करें, आपको अपनी अदालतों पर भरोसा करने की आवश्यकता है, क्योंकि यदि न्यायाधीशों और अदालतों के प्रति विश्वास का तत्व गायब हो जाता है, तो मुझे लगता है कि यह लोकतांत्रिक  व्यवस्था के लिए एक गंभीर समस्या बनने जा रहा है ।

न्यायपालिका में रिक्तियों से निपटने के लिए अपरंपरागत साधनों पर बल देते हुए जस्टिस  चंद्रचूड ने उच्च न्यायालयों में “तदर्थ न्यायाधीशों” की नियुक्ति के फायदों को बताया । उन्होंने कहा कि जब जजों के बहुत से पद खाली हैं तो  उच्च न्यायालयों में तदर्थ न्यायाधीशों को नियुक्त किया जा सकता है। उन्होंने याद दिलाया कि उच्चतम न्यायालय में जब केशवानंद भारती मामले की सुनवाई चल रही थी 13 न्यायाधीश उस मामले की सुनवाई महीनों से कर रहे थे लेकिन तब तीन तदर्थ न्यायाधीश दिन प्रतिदिन की सुनवाई कर रहे थे।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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This post was last modified on September 26, 2019 3:14 pm

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