श्रमायुक्त साहब! मालिक नहीं, मजदूरों की रक्षा करना है आप का काम

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श्रमायुक्त बोबडे।

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के श्रमायुक्त जो श्रम विभाग की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठते हैं। नाम के आगे डॉक्टर लगाते हैं। आईएएस हैं। लिहाजा पद और पेशे के लिहाज से भी बेहद प्रतिष्ठित हो जाते हैं। उनका पूरा नाम है डॉ. सुधीर महादेव बोबडे। श्रमायुक्त की कुर्सी पर बैठने से स्वाभाविक तौर पर उनकी जिम्मेदारी सूबे में मजदूरों के अधिकारों की रक्षा की हो जाती है। यही नहीं उनके पूरे महकमे का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह श्रमिकों का उनके मालिकों के किसी भी तरह के उत्पीड़न और शोषण से बचाव करे।

साथ ही किसी भी स्तर पर जाकर उनके हक हुकूक की गारंटी करे। लेकिन विडंबना देखिये वह ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं। एक ऐसे मौके पर जब उनकी मजदूरों को सबसे ज्यादा जरूरत है। तब उन्होंने उनसे अपना पूरा पल्ला झाड़ लिया है। मामला यहीं तक सीमित होता तो भी कोई बात नहीं थी। वह इससे भी दो कदम आगे बढ़कर मजदूरों के खिलाफ खड़े हो गए हैं। 

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श्रमायुक्त डॉ. सुधीर महादेव बोबडे का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह अपने मातहत अधिकारियों को बिल्कुल साफ-साफ यह निर्देश देते दिख रहे हैं कि सूबे में अगर कहीं भी किसी फैक्ट्री या कंपनी में मजदूरों या कर्मचारियों के वेतन भुगतान संबंधी कोई शिकायत आती है तो उसमें श्रम विभाग कोई कार्रवाई नहीं करेगा। न एफआईआर दर्ज होगी। न ही दूसरी कोई कानूनी पहल। इस सिलसिले में अगर अफसर कुछ करना चाहता है तो उसे सबसे पहले उनसे यानी श्रमायुक्त बोबडे से बात करनी होगी।

उससे भी बड़ी दिलचस्प बात जो वीडियो में देखने में आयी वह यह कि उसी झोंके में श्रमायुक्त साहब कह जाते हैं कि वह उसकी (एफआईआर दर्ज करने की) कभी इजाजत नहीं देंगे। यानी अगर कोई मजदूर अपना वेतन न मिलने या फिर मालिक द्वारा उसे हड़प लिए जाने की शिकायत करना चाहता है तो श्रम विभाग उसकी कोई सुनवाई नहीं करेगा। और यह आदेश मौखिक नहीं बल्कि लिखित तौर पर श्रम विभाग के सभी दफ्तरों के लिए जारी किया गया है। जिसमें कमिश्नर से लेकर एडिशनल कमिश्नर और तमाम पदाधिकारी भी शामिल हैं। यह बात खुद श्रमायुक्त बोबडे अपने उसी वीडियो में बताते हैं।

अब बोबडे साहब से कोई पूछ सकता है कि फिर आपको क्यों इस कुर्सी पर बैठे रहना चाहिए? जब आपका काम खत्म हो गया तो इस्तीफा देकर जाइये अपने घर बैठिए। या फिर जिस मालिक और उद्योगपति की टहल बजा रहे हैं उसके यहां कोई नौकरी कर लीजिए।

यह सब कुछ उस बीजेपी सरकार और मोदी काल में हो रहा है जिसने केंद्रीय रूप से श्रमिकों और कर्मचारियों का वेतन न काटने का उद्योगपतियों और कारपोरेट को निर्देश जारी किया था।

अब ऐसी स्थिति में सरकार क्या यह बताना चाहेगी कि अगर मजदूरों का वेतन नहीं मिलेगा तो उसका परिवार कैसे चलेगा? वह खाएगा कहां से और कमरे का किराया कहां से देगा? सरकार अपनी तरफ से तो कोई व्यवस्था नहीं कर रही है ऊपर से उसने जो अपनी व्यवस्था कर रखी है उसको भी खत्म कर दे रही है। ऐसे में मजदूर और उसका परिवार आखिर क्या करेगा? उसके पास आत्महत्या के अलावा और क्या रास्ता बचेगा? अगर कहा जाए कि इसके जरिये सरकार मजदूरों को आत्महत्या के रास्ते पर धकेल रही है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। सरकारों को नागरिकों का अभिभावक समझा जाता है।

और एक परिवार में अभिभावक की प्राथमिक भूमिका लोगों को भोजन मुहैया कराना होता है और परिवार में अगर किसी तरह का अन्याय हो रहा है उसको दूर करना होता है। इस मामले में एक बात और शामिल है कि किसी जरूरत के मौके पर वह परिवार के सबसे कमजोर सदस्य के साथ खड़ा होगा। लेकिन यहां यूपी में तो बिल्कुल उल्टा हो रहा है। योगी सरकार खाए और अघाए पूंजीपतियों के पक्ष में खड़ी है। और अभिभावक के तौर पर समाज के जिस हिस्से को सरकार के सहयोग और समर्थन की सबसे ज्यादा जरूरत है उसे ठेंगा दिखा दे रही है। यहां तो किसी तरह के दान और भीख का भी मसला नहीं था। खुद उनकी अपनी मेहनत के पैसे को दिलवाने की बात थी जिसे उद्योगपतियों ने हड़प लिया है।

लेकिन सरकार अपने उस गरीब और सबसे ज्यादा जरूरतमंद नागरिक के साथ भी नहीं खड़ी है। लिहाजा कहा जा सकता है कि नैतिक तौर पर सरकार ने अपना वजूद खो दिया है। और एक सरकार जिसे संवैधानिक मूल्यों और परंपराओं के हिसाब से काम करना चाहिए वह खुद उसके खिलाफ खड़ी हो गयी है। ऐसे में यह बात पूरे दावे के साथ कही जा सकती है कि सरकार ने सत्ता में बने रहने का अपना नैतिक अधिकार खो दिया है।

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