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यूपी पुलिस आईटी एक्ट की ‘असंवैधानिक’ धारा-66 ए के तहत लगातार दर्ज कर रही एफआईआर

श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के केस में उच्चतम न्यायालय धारा-66 (ए) आईटी एक्ट को असंविधानिक (अल्ट्रा वायरस) घोषित कर चुका है। उच्चतम न्यायालय ने इस आदेश की प्रति सभी राज्यों के उच्च न्यायालयों और मुख्य सचिवों को भी भेजने का निर्देश दिया था ताकि इस धारा के तहत मुकदमे दर्ज न किए जाएं। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में धारा-66 (ए) के तहत बड़ी संख्या में मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।यूपी में थाने से लेकर ट्रायल कोर्ट तक और हाईकोर्टों तक, धारा-66(ए) का इस्तेमाल अभी भी जारी है।

पीएम केयर्स फंड को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने वाले शिक्षक नेता को राहत देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। साथ ही उच्च न्यायालय ने आईटी एक्ट की धारा-66 (ए) के तहत शिक्षक नेता पर मुकदमा दर्ज करने पर संबंधित आईओ को तलब कर लिया है। उच्च न्यायालयने कहा कि आईटी एक्ट की धारा-66 (ए) में मुकदमा दर्ज करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्पष्ट उलघंन है। इस मामले में उच्च न्यायालय प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को तलब करना चाह रही थी, मगर मौजूदा कोविड 19 महामारी से उत्पन्न परिस्थितियों के कारण ऐसा न करते हुए सिर्फ आईओ को तलब किया है।

एटा के शिक्षक नेता नंदलाल सिंह यादव की याचिका पर न्यायमूर्ति पंकज नकवी और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की पीठ सुनवाई कर रही है। याची के अधिवक्ता सुनील यादव का कहना कहना था कि याची ने पीएम केयर्स फंड को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणी की थी। जिस पर उसके खिलाफ मिराहची थाने में आईटी एक्ट की धारा-66 (ए) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया। अधिवक्ता का कहना था कि धारा-66 (ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है।

उच्च न्यायालय ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय की रोक के बावजूद मुकदमे दर्ज करना उच्चतम न्यायालय अदालत के आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है। उच्च न्यायालय ने याची पर दर्ज मुकदमे की जांच और उसकी गिरफ्तारी पर अगली सुनवाई तक रोक लगाते हुए विवेचनाधिकारी को अदालत में रिकार्ड के साथ हाजिर हाजिर होने का निर्देश दिया है। इस आदेश की प्रति संबंधित जिले के एसएसपी और डीजीपी को भी भेजने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को होगी।

सुप्रीम कोर्ट

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने 2015 में श्रेया सिंघल बनाम बनाम यूनियन ऑफ इंडिया दिए गए एक फैसले में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66 (ए) को रद्द कर दिया है। पिछले वर्ष उच्चतम न्यायालय ने ‘असंवैधानिक’ धारा-66 (ए) के निरंतर प्रयोग पर अपनी चिंता जाहिर की थी और नाराजगी व्यक्त की थी। हाल ही में, रोहित सिंघल नाम के एक व्यक्ति ने धारा 3/7, आवश्यक वस्तु अधिनियम, और धारा-66(ए) सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील ने श्रेया सिंघल मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया।

हालांकि, अदालत ने धारा-66 (ए) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को उपरोक्त मामले में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, जब तक कि सक्षम कोर्ट के समक्ष, धारा 173 (2) सीआरपीसी के तहत पुलिस रिपोर्ट, यदि कोई हो तो, प्रस्तुत नहीं की जाती है। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को मामले की जांच में सहयोग करने का भी निर्देश दिया।

हाल ही में, एक अमर उजाला के एक पत्रकार शिव कुमार ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 188 और 505 के तहत, साथ में पढ़ें, महामारी अधिनियम की धारा 3 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66 (ए) के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसे रद्द करने की मांग उन्होंने की थी। उनकी याचिका का निस्तारण करते हुए, कोर्ट ने पाया कि ‘यह स्पष्ट है कि संज्ञेय अपराध किया गया है, जिसके लिए जांच की प्रक्रिया जारी है। अदालत ने पुलिस रिपोर्ट दाखिल करने तक याचिकाकर्ता को संरक्षण प्रदान किया।अदालत धारा-66 (ए) के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द कर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया।

योगी आदित्यनाथ,मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश

अनुच्छेद 19 (1) (ए) के उल्लंघन और अनुच्छेद 19 (2) के तहत बचाए जाने योग्य न होने के कारण उच्चतम न्यायालय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66 (ए) को रद्द कर चुका है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66 (ए) को 2009 के संशोधन अधिनियम के आधार पर पेश किया गया था। उक्त प्रावधान के तहत किसी भी व्यक्ति को दंडित किया जाता था, जो कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण के माध्यम से- (क) कोई भी जानकारी, जो घोर आपत्तिजनक है या घातक चरित्र की है, भेजता है; या (बी) ऐसी कोई भी जानकारी, जिसके झूठ होने के बारे में उसे पता है, लेकिन चिढ़, असुविधा, खतरा, बाधा, अपमान, चोट, आपराधिक धमकी, दुश्मनी, घृणा या गलत इरादा पैदा करने के लिए कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण का प्रयोग कर लगातार भेजी जाती है (ग) किसी भी इलेक्ट्रॉनिक मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल मैसेज को चिढ़ या असुविधा पैदा करने के लिए भेजा जाता है या ऐसे संदेशों की उत्पत्ति के बारे में प्राप्तकर्ता को धोखा देने या भ्रमित करने के इरादे से भेजा जाता है। ऐसे अपराधों में कारावास का दंड निर्धारित किया गया था, जिसे जुर्माने के साथ, तीन साल तक बढ़ाया जा सकता था।

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने दो साल पहले एक अध्ययन पेपर जारी किया था, जिसमें दावा किया गया था कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बावजूद, धारा-66 (ए) का इस्तेमाल पूरे भारत में किया जाता रहा है। अभिनव सेखरी और अपार गुप्ता ने अपने एक पेपर में धारा-66 (ए) को “कानूनी जॉम्बी” कहा है, जिसमें कहा गया है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद भी, यह धारा भारतीय आपराधिक प्रक्रिया को परेशान कर रही है। अध्ययन में कहा गया है कि थाने से लेकर ट्रायल कोर्ट तक और उच्च न्यायालयों तक, धारा 66-ए का इस्तेमाल अभी भी जारी है।

जनवरी 2019 में, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया ‌था और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-66 (ए) के निरंतर उपयोग की ओर ध्यान दिलाया ‌था। अटॉर्नी जनरल के सुझाव से सहमत होते हुए, उस समय उच्चतम न्यायालय ने सभी सभी उच्च न्यायालयों को सभी जिला न्यायालयों को ‘श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतियां आठ सप्ताह में उपलब्ध कराने का निर्देश देते हुए, आवेदन का निस्तारण कर दिया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह कानूनी मामलों के विशेषज्ञ हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on July 10, 2020 8:10 pm

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