यूपी के पंचायत चुनाव में 2015 के बेस पर लागू होगी आरक्षण प्रक्रिया

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उच्चतम न्यायालय ने कई फैसलों में कहा है कि जो प्रत्यक्ष नहीं हो सकता उसे अप्रत्यक्ष भी नहीं किया जा सकता। लेकिन चतुर सुजान ऐसी व्यूह रचना करते हैं कि वे अपनी चाहत अप्रत्यक्ष रूप से कोर्ट का ही कन्धा पकड़ कर पूरी करने में सफल हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही मामला यूपी पंचायत चुनावों का है जिसे भाजपा पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद कराना चाहती थी क्योंकि यूपी में संभावित पराजय का असर बंगाल असम तक जा सकता था। नतीजतन नौकरशाही ने आरक्षण में खेल कर दिया और हाईकोर्ट में जब मामला पहुंचा तब कोर्ट ने योगी सकार के फैसले को खारिज करते हुए आदेश दिया है कि अब आरक्षण प्रक्रिया 2015 के बेस पर ही लागू होगी और त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव संपन्न कराने के लिए 25 मई तक की तारीख मिल गई, जो पांच राज्यों के चुनाव सम्पन्न होने के बाद की तारीख है। कोर्ट ने 27 मार्च तक रिजर्वेशन प्रक्रिया फाइनलाइज करने के आदेश दिए।

उत्तर प्रदेश सरकार को पंचायत चुनाव में आरक्षण के मामले में देखने में हाईकोर्ट से झटका है पर इसका राजनीतिक निहितार्थ यह है कि भाजपा की मनचाही मुराद पूरी हो गयी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 2015 को आधार वर्ष मानकर आरक्षण तय करने का आदेश दिया है। इस फैसले के बाद राज्य सरकार की ओर से हाल में जारी हुई आरक्षण सूची बदल जाएगी। अब नये सिरे से हर सीट का आरक्षण तय किया जाएगा। हाईकोर्ट के नई आरक्षण प्रक्रिया को खारिज करने के साथ ही जस्टिस ऋतुराज अवस्थी और जस्टिस मनीष माथुर की पीठ ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव 25 मई तक संपन्न कराने के भी आदेश दिए हैं।

अजय कुमार ने प्रदेश सरकार के 11 फरवरी, 2011 के शासनादेश पर हाई कोर्ट में पीआईएल दाखिल की थी। तर्क दिया कि इस बार की आरक्षण सूची 1995 के आधार पर जारी की जा रही है, जबकि 2015 को आधार वर्ष बनाकर आरक्षण सूची जारी की जानी चाहिए, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने अंतिम आरक्षण सूची जारी किए जाने पर रोक लगा दी थी। खंडपीठ ने 25 मई तक नई व्यवस्था के तहत पंचायत करवाने का भी निर्देश दिया है। अब इस फैसले के बाद कई ग्राम पंचायतों के समीकरण भी बदल जाएंगे।

सरकार के महाधिवक्ता ने कोर्ट में माना की सरकार से आरक्षण रोटेशन में गलती हुई। सरकार ने माना की 1995 को आरक्षण रोटेशन को आधार वर्ष मानकर गलती हुई। जिसके बाद नये आरक्षण रोटेशन के लिए सरकार ने समय माँगा। जिस पर हाईकोर्ट ने 15 मई के बजाय 25 मई तक पंचायत चुनाव पूरा कराने का आदेश दिया। प्रक्रिया पूरी करने के लिए कोर्ट ने 10 दिन और बढ़ा दिए।

गौरतलब है कि खंडपीठ ने अजय कुमार की तरफ से दाखिल याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि 2015 को आरक्षण का बेस वर्ष मानकर काम पूरा किया जाए।कोर्ट ने राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को यह आदेश दिया। इससे पहले राज्य सरकार ने अदालत में स्वयं कहा कि वह 2015 को आधार वर्ष मानकर त्रिस्तरीय चुनाव में आरक्षण की व्यवस्था लागू करने के लिए स्वयं तत्पर है। यह तथ्य सामने आने के बाद अदालत ने पंचायत चुनाव को 25 मई तक पूरा करने के आदेश दिए हैं। इससे पहले हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को 15 मई तक पूरा करने के निर्देश दिए थे।

याची अजय कुमार ने प्रदेश सरकार के 11 फरवरी 2011 के शासनादेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका में कहा गया था कि इस बार की आरक्षण सूची 1995 के आधार पर जारी की जा रही है, जबकि 2015 को आधार वर्ष बनाकर आरक्षण सूची जारी की जानी चाहिए। इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने अंतिम आरक्षण सूची जारी किए जाने पर रोक लगा दी थी।

याचिकाकर्ता का कहना है कि साल 1995 के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था से जहां सामान्य सीट होनी चाहिए थी, वहां पर ओबीसी कर दिया गया और जहां ओबीसी होना चाहिए, वहां एससी के लिए आरक्षित कर दी गई है। इससे चुनाव लड़ने वालों में निराशा है। लिहाजा शासनादेश को रद्द कर वर्ष 2015 के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

दरअसल, प्रदेश में 1995 में रोटेशन के तहत पंचायत चुनाव में आरक्षण लागू हुआ। जिसके तहत एससी/एसटी, ओबीसी एवं महिला कटेगरी में पंचायत सीटों को आरक्षित किया गया। 2010 के चुनाव के दौरान 20 साल में एक चक्र पूरा हुआ। 2015 में प्रक्रिया को नए सिरे से आरम्भ किया गया। लेकिन वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार ने 2021 में होने वाले चुनाव में आरक्षण की नीति बदल दी, जिसे कोर्ट ने अमान्य कर दिया है।

पंचायत का जो नया समीकरण है वह संविधान के 73वें संशोधन के बाद 1992-1993 में आए प्रोविजन का हिस्सा है। जिसमें बदलाव पंचायतराज एक्ट 1947 के तहत हुए हैं। रोटेशन के अनुसार जातियों के पॉपुलेशन के डिसेंडिंग ऑर्डर में सीट आरक्षित होती गईं। यह स्थिति 1995 से 2010 तक जारी रही। लेकिन 2015 में यह बात सामने आई कि चार बार बदलाव हो चुका है इसलिए अधिकांश क्षेत्र कवर हो चुका है। साथ ही 2011 की जनगणना से यह बात भी सामने आई कि कई सीटों में परिसीमन हो गया, नतीजा यह हुआ कि साढ़े सात हजार नई पंचायत बनीं, बड़ी संख्या में पंचायत नगर निगम में मर्ज हुईं। इस कारण से डेमोग्राफी बदल चुकी थी। इस बार आम शिकायत थी कि जहां अनुसूचित जाति की आबादी न होने या बेहद कम होने के बावजूद सीट को आरक्षित कर दिया गया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।) 

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