Monday, October 25, 2021

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GROUND REPORT: कोरोना से तबाही के मंजर को बयां कर रहीं गांवों की सूनी गालियां

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देवरिया। कोरोना की दूसरे लहर व इसकी तबाही से अब कोई गांव अछूता नहीं रह गया है। जिन  गांवों की गलियों में बच्चों की खिलखिलाहट, नौजवानों की मटर गस्ती, बुजुर्गों की पंचायत दिखती थी अब यह सब खामोशी की चादर ओढ़े हुए हैं। अप्रैल व मई माह में शादी विवाह के लगन के मौसम में हर वर्ष जहां मंगल गीत सुनाई  पड़ते थे वहां रह-रह कर सन्नाटे को चीरती हुई क्रंदन की आवाज सुनाई पड़ रही है। ये हालात कहने को तो कोरोना महामारी के चलते उत्पन्न हुए हैं, पर यह महामारी से अधिक हुक्मरानों की मनमानी का नतीजा है। ये सब बातें यूं ही नहीं कही जा रहीं। राज्य व केंद्र की सरकारों की नाकामी का नतीजा जहां आम आदमी मानने लगा है, वहीं देश की अदालतें भी यही कह रही हैं। मेन स्ट्रीम मीडिया भी अब दबी जुबान में ही सही इसे स्वीकारने भी लगी है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में तो भारत सरकार व प्रधानमंत्री की कोरोना से निपटने की तैयारी में विफलता की कहानी रोज प्रकाशित हो रही है।

हम यहां कोरोना को लेकर उत्पन्न हुए पूर्वांचल के हालात की चर्चा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृहमंडल गोरखपुर की तस्वीर को देख हर किसी को  राम भरोसे राज्य के हालात संबंधित हाई कोर्ट की टिप्पणी सटीक नजर आ रही है।

 देवरिया जिले के एक गांव में 1 सप्ताह में 12 लोगों की मौत हो चुकी है। मरने वालों में 40 साल से लेकर 65 साल तक के लोग हैं। मृतकों में से किसी की भी कोरोना जांच नहीं हुई थी। जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर राप्ती और गोरा नदी के दोआब क्षेत्र बैदा में 1 मई से लेकर 6 मई के बीच 12 मौतें हुईं। जिनमें सर्वाधिक 2 मई को 4 और 6 मई को 5 लोगों की मौत हो गई। ग्रामीणों की मानें तो सभी मृतकों को पहले खांसी हुई फिर तेज बुखार आया और सांस लेने में दिक्कत आने लगी। फिर 2 दिन के अंदर में ही सभी की मौत हो गई। 

कुशीनगर में कोरोना से बीमारी व मौत से ग्रामीण भयभीत हैं। कोरोना पॉजिटिव मिलने के बाद गांवों में स्वास्थ्य विभाग की टीमें समय से नहीं पहुंच पा रही हैं। फाजिलनगर ब्लॉक के भठही बुजुर्ग में कोरोना से दो मौत के बाद स्वास्थ्य टीम अभी तक नहीं पहुंची है यह तो बानगी है। इसी प्रकार से अन्य प्रभावित गांवों का भी यही हाल है। जिले के सभी 14 ब्लॉक क्षेत्र के तीन- तीन गांवों में सर्वाधिक दूसरी लहर में प्रभावित केस के अलावा अन्य गांवों में भी कोरोना के केस मिले हैं। कोरोना केस मिले गांव के लोग भयभीत है। बावजूद इसके रैपिड रिस्पांस टीम संबंधित गांवों में समय से नहीं पहुंच पा रही है। इसके अलावा सैकड़ों की संख्या में लोग बिना जांच कराये ही होम आइसोलेशन में रह कर दवा ले रहे हैं। इसकी सूची स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है। जिले में सबसे अधिक केस फाजिलनगर ब्लॉक के सोहंग में 34 केस मिले हैं।

दुदही ब्लॉक के ग्राम पंचायत बांसगांव में 12 पॉजिटिव केस मिले हैं। इसी ब्लॉक के घूरपट्टी में 12, दुदही में 11, फाजिलनगर ब्लॉक के सोहंग में 34, अशोगवा में 34, फाजिलनगर में 14, हाटा के पगरा में 18, सीएचसी हाटा में 9, थरूआडीह में 9, कप्तानगंज ब्लॉक के सीएचसी कप्तानगंज में 5, कारीतिन में 3 व बलुआ में दो, कसया के सीएचसी कसया में 4, कुड़वा दिलीपनगर व झुगवां में 3-3, खड्डा के सोनबरसा में 13, पड़रहवा व सिसवा गोपाल में 9-9, मोती चक के मथौली में 12, सज्जन छपरा में 9, फरदहा में 4, पडरौना के सुगही में 11, पिपरा जटामपुर व सिकटा में 8-8, रामकोला के सपहा में 8, परोरहा में 9, सेवरही के मिश्रौली में 20, अहिरौलदान में 16, पकडियार पूरब पट्टी में 13, सुकरौली के लेहनी में 7, बेलवा में 6, डुमरी मलाव में 5, तमकुही के देवपोखर में 15, शिवसरया में 13, बरवा राजा पाकड़ में 11, विशुनपुरा के नरचोचवा में 32, चितहा व दोपाही में 13-13, जिले के सात निकाय क्षेत्रों में 764 तथा अन्य 162 कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। 

इस बार हाल यह कि जिले में अभी क्वारंटाइन सेंटर नहीं बनाए गए हैं। ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में निगरानी समितियों के गठन का निर्देश दिया गया है। समिति बाहर से आने वालों के बारे में सूचना देगी। उसके अनुसार स्वास्थ्य विभाग की टीम गांव में जाएगी और प्रभावी कार्रवाई करेगी। 

कोरोना ने गोरखपुर जिले के कई परिवारों को बर्बाद कर दिया है। दो पीढ़ियां खत्म हो गई हैं। कहीं बाप-बेटे तो कहीं मां, बेटी व पत्नी की मौत हुई है। ज्यादातर मौतें 20 अप्रैल से 15 मई के से बीच हुई हैं। ब्रह्मपुर गांव की शशि दुबे के दो जवान बेटे काल के गाल में समा गए। सदमे में पति ने भी दम तोड़ दिया। इससे पहले बहू की मौत हुई थी। अब परिवार में सिर्फ शशि बची हैं। शशि कहती हैं कि कोरोना ने सब कुछ बर्बाद कर दिया है।     

 शाहपुर के शताब्दीपुरम कॉलोनी निवासी अजय जायसवाल (37) और पत्नी अंशिका (35) की एक दिन में ही मौत हुई थी। दोनों कोरोना संक्रमित थे। पति-पत्नी की अर्थी एक साथ उठी और अंतिम संस्कार हुआ। डेढ़ साल के मासूम बेटे आनंद ने उन्हें मुखाग्नि दी तो सबकी आंखें नम हो गईं। अब छह साल की बेटी गुनगुन व डेढ़ साल के बेटे आनंद के सिर पर माता-पिता का साया नहीं है। कसिहार क्षेत्र के मझिगावा में पहले दीप नारायण शुक्ला की मौत हुई थी। पांचवें दिन ही पिता गजेंद्र नाथ शुक्ला ने भी दम तोड़ दिया। बड़हलगंज क्षेत्र में बुजुर्ग विजय नारायण (72) व उनकी पत्नी मुराती (70) की अर्थी एक साथ उठी थी। भरोहिया विकास खंड के फरदहनी गांव के राजकुमार वर्मा व उनके बड़े भाई दुर्गेश वर्मा की मौत भी हुई है। भटहट के मुड़िला गांव में अनिरुद्ध श्रीवास्तव व उनके बेटे अनिकेत श्रीवास्तव ने दम तोड़ा है।

कोरोना संक्रमित पादरी बाजार के जंगल सालिकराम की इंद्रावती देवी की मौत एक मई को हुई थी। यह सदमा पति व रिटायर ग्राम विकास अधिकारी सुभाष पांडेय बर्दाश्त नहीं कर सके। पत्नी की अस्थि विसर्जित करने वाराणसी गए। वहां से लौटे तो तबीयत बिगड़ गई। परिजन अस्पताल ले जाने के प्रयास में थे कि सुभाष ने भी दम तोड़ दिया। इसी तरह पादरी बाजार के मोहनापुर के रामू निषाद (32) की 29 अप्रैल को कोरोना से मौत हो गई थी। उनके साथ ही पूरा परिवार भी कोरोना की चपेट में आ गया था। रामू की मौत के बाद मां परमी देवी (62) अवसाद में चली गईं। गत तीन मई को उन्होंने भी दम तोड़ दिया।

एक परिवार में चार मौतें हुई हैं व अब एक ही महिला बची है। ब्रह्मपुर के सर्वेश द्विवेदी (28) की कोरोना से मौत हुई थी। इस सदमे को पिता रामानुज दुबे (65) बर्दाश्त नहीं कर सके और दम तोड़ दिया। सर्वेश के बड़े भाई प्रदीप कुमार द्विवेदी (40) भी कोरोना संक्रमित थे। टीबी अस्पताल में इलाज के दौरान ही प्रदीप की मौत हो गई। इससे पहले प्रदीप की पत्नी वंदना दुबे की मौत हुई थी। वंदना के लीवर में कुछ दिक्कत थी।

दुर्गाबाड़ी निवासी व दवा कारोबारी नीरज तिवारी की मां कमला देवी (62) व पिता शिवजी तिवारी (65) व विवाहित बहन आशा पांडेय (45) की कोरोना संक्रमण से मौत हो गई। इससे पूरा परिवार बिखर गया। आशा माता-पिता की सेवा करने आई थीं लेकिन कोरोना की चपेट में आ गईं। आशा पांडेय का लच्छीपुर के शास्त्रीनगर में नया घर बना है। 14 मई को गृहप्रवेश था। अब खुशियां मातम में तब्दील हो गई हैं।

खोराबार इलाके के चंवरी गांव में हीरालाल (73), उनके बेटे सुरेश चंद और बहू चंपा देवी पत्नी मनोज की मौत हो चुकी है। पहले पिता की मौत हुई तो संक्रमण की वजह से बेटा उन्हें आखिरी विदाई नहीं दे पाया, दूसरे ही दिन उसकी भी मौत हो गई। इसी बीच बहू ने भी अस्पताल में कोरोना से दम तोड़ दिया। अब भी परिवार के कई लोग संक्रमित हैं। बेटी अनीता, हीरालाल की पत्नी, सुरेश की पत्नी सभी आइसोलेट हैं।

चौरीचौरा तहसील क्षेत्र के ग्राम पंचायत भैसही रामदत्त में बारह दिन के भीतर एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत हुई है। पहले वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कुमार उपाध्याय (50) ने इलाज के दौरान 20 अप्रैल को अस्पताल में दम तोड़ा था। आठवें दिन ही मां संयोगिता देवी (78) का देहांत हो गया। सेवानिवृत शिक्षक व संजय के पिता रघुवंश उपाध्याय (80) ने गत दो मई को दम तोड़ दिया। इससे पूरा परिवार बिखर गया है।

कैंपियरगंज के नवापार गांव में शुक्रवार की रात कपिलदेव मिश्रा (80) की मौत हुई, फिर रात एक बजे बेटे बृजेश मिश्रा (48) ने दम तोड़ दिया। तीन घंटे के अंतराल पर परिवार में दो मौतों से पूरा परिवार टूट गया। दरअसल, बृजेश कोरोना पॉजिटिव थे। इलाज के बाद ठीक हो गए थे लेकिन ऑक्सीजन लेबल अचानक कम हुआ और मौत हो गई। बृजेश इस बार वार्ड नंबर 108 से क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी) का चुनाव भी जीते थे।

तेजी से बढ़ रहे पॉजिटिव मरीज

हाल यह है कि गोरखपुर मंडल के चारों जिलों में पॉजिटिव रेट में मई महीने में जबर्दस्त उछाल आया है। गोरखपुर में अप्रैल महीने में पॉजिटिविटी दर 8.4 थी, जो मई के दस दिनों में बढ़कर 12.7 तक जा पहुंची है। देवरिया में अप्रैल महीने में पॉजिटिविटी रेट चार था, जो मई के दस दिन में 16.9 तक जा पहुंचा है। कुशीनगर में यह दर 3.2 से बढ़कर 14.5 और महराजगंज में 3.4 से बढ़कर 8.8 हो गई है।

संक्रमितों के इलाज के लिए बदहाल इंतजाम

गोरखपुर मंडल के चार जिलों की 1.37 करोड़ आबादी के लिए सिर्फ 2,823 कोविड बेड हैं। गोरखपुर मंडल के चार जिलों में लेवल टू और थ्री के अभी भी सिर्फ 2,823 अस्पताल बेड हैं। गोरखपुर में 2,077 अस्पताल बेड हैं जिसमें जिसमें 765 सरकारी अस्पताल में हैं, बाकी 1,312 निजी अस्पताल के बेड हैं। अब जाकर गोरखपुर के एम्स, बड़हलगंज स्थित राजकीय होम्योपैथिक कॉलेज, स्पोर्ट्स कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में कोविड अस्पताल बनाने की कवायद शुरू हुई है। ये अस्पताल भी निजी क्षेत्र के सहयोग से शुरू किए जा रहे हैं। स्पोर्ट्स कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में 100 बेड का एल-टू अस्पताल बिल एवं मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सहयोग से शुरू करने की तैयारी है, तो एम्स में 200 बेड का अस्पताल विमानन कंपनी बोइंग के सहयोग से बनाने की घोषणा की गई है।

राजकीय होम्योपैथिक कॉलेज में 100 बेड का अस्पताल बनाने की घोषणा की गई है। ये सभी घोषणाएं अमल में आ जाएं, तो क्षेत्र में कोविड-19 मरीजों के लिए 450 और बेड उपलब्ध हो जाएंगे और कुल बेड की संख्या 3,273 हो जाएगी। सवाल यह है कि 1.37 करोड़ की आबादी वाले इन चार जिलों में कोविड मरीजों के लिए इलाज में सिर्फ 3,500 बेड कितनी सहायता कर पाएंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि 500 नए बेड के लिए जरूरी मानव संसाधन कहां से लाएंगें ? वह भी उन हालात में जहां पहले से डॉक्टर और स्टाफ कम हैं। सीएम की समीक्षा बैठक में रखी गई रिपोर्ट के अनुसार, गोरखपुर मंडल के चार जिलों में मेडिकल अफसरों के स्वीकृत 1,064 पदों के सापेक्ष 724 ही तैनात हैं और 340 पद खाली हैं। स्वीकृत पद के मुकाबले गोरखपुर में 122, देवरिया में 76, कुशीनगर में 61 और महराजगंज में 81 मेडिकल अफसर कम हैं। इसी तरह इन चारों जिलों में स्टाफ नर्स के 424 पद स्वीकृत हैं लेकिन तैनाती सिर्फ 290 की है यानी 134 स्टाफ नर्स की कमी है।

 उधर हाल यह है कि प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ ने महानिदेशक चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं को पत्र लिखकर इमरजेंसी ड्यूटी कर रहे चिकित्सकों व चिकित्सा कर्मियों के बड़ी संख्या में संक्रमित होने पर चिंता जताई है। पत्र में कहा गया है कि जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर रेस्पिरेटिव डिस्ट्रेस सिंड्रोम वाले मरीज बड़ी संख्या में आ रहे हैं, जिनका इलाज करते समय चिकित्सक व स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हो रहे हैं।

ऑक्सीजन का संकट अभी भी बरकरार

एक अनुमान के मुताबिक गोरखपुर, देवरिया, महराजगंज और कुशीनगर में बी टाइप के 1,048 और डी टाइप के 1,798 यानी कुल 2,844 सिलेंडर की उपलब्धता है , जबकि जरूरत डी टाइप (जंबो) 3,747 सिलेंडर की है। ऐसे में आवश्यकता और उपलब्धता में अभी भी 903 सिलेंडर का अंतर है।

गोरखपुर जिले में ऑक्सीजन के तीन प्लांट हैं। एक प्लांट हाल ही में शुरू हुआ है। पांच वर्ष से बंद एक प्लांट को कोविड की पहली लहर से शुरू करने की कोशिश हो रही है, जिसके अब शुरू होने की संभावना है। मोदी केमिकल के दो प्लांट पहले से कार्यशील हैं। दोनों प्लांट की उत्पादन क्षमता 1600 से 2000 सिलेंडर की है। तीसरे ऑक्सीजन प्लांट आरके ऑक्सीजन की क्षमता एक हजार सिलेंडर रोज की है। मोदी केमिकल्स ने अभी फैजाबाद में बंद पड़े प्लांट की मशीनरी को गोरखपुर के गीडा स्थित प्लांट में स्थापित कर ऑक्सीजन उत्पादन शुरू किया है। इसकी क्षमता भी एक हजार सिलेंडर की है।

यदि चौथा प्लांट अन्नपूर्णा शुरू हो जाता है तो वह भी 1500 सिलेंडर ऑक्सीजन दे सकेगा। इस तरह कुछ दिन पहले तक तीन प्लांट से कुल 2,600 से 3,000 सिलेंडर ऑक्सीजन का उत्पादन हो रहा था जबकि जरूरत डी-टाइप के 3,747 सिलेंडर की है।

दूसरी तरफ देवरिया और कुशीनगर जिले में ऑक्सीजन का कोई प्लांट नहीं है। महराजगंज में अभी एक प्लांट शुरू हुआ है। गोरखपुर के पड़ोसी जिले बस्ती और सिद्धार्थनगर में भी कोई ऑक्सीजन प्लांट नहीं है। संतकबीर नगर जिले में जरूर एक प्लांट है लेकिन उसकी उत्पादन क्षमता सिर्फ 400 सिलेंडर रोज की है। पड़ोसी जिले ऑक्सीजन के लिए गोरखपुर पर ही निर्भर हैं। बड़ी संख्या में होम आइसोलेशन वाले मरीज भी ऑक्सीजन सिलेंडर की जरूरत महसूस कर रहे हैं। आगे के दिनों में यदि 450 अस्पताल बेड बढ़ते हैं तो ऑक्सीजन की जरूरत और बढ़ेगी।

कोविड जांच की रफ्तार भी धीमी

कोरोना के बढ़ते का रफ्तार के अनुसार जांच की गति धीमी होने से परेशानी बढ़ती जा रही है। गोरखपुर मंडल के चार जिलों में कोविड नमूनों के आरटी-पीसीआर जांच की दो व्यवस्था बनाई गई है।

बीआरडी मेडिकल कॉलेज का माइक्रोबायोलॉजी विभाग गोरखपुर और देवरिया के नमूनों की आरटी-पीसीआर जांच करता है जबकि आईसीएमआर का रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर (आरएमआरसी) महराजगंज और कुशीनगर के नमूनों की जांच करता है। दोनों जांच केंद्रों की क्षमता रोज 5-5 हजार नमूनों की है। बीआरडी मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अमरेन्द्र सिंह ने बताया, ‘हमारे यहां 70 फीसदी कर्मचारी संक्रमित हो गए थे जिससे जांच क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई थी। जांच केंद्र में कर्मचारी तीन शिफ्टों में काम कर रहे हैं। देवरिया और गोरखपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले नमूने देर से पहुंचते हैं जिससे कई बार नमूने खराब हो जाते हैं। नमूने लिए जाने के बाद जिला मुख्यालय आते हैं और फिर उसकी पोर्टल पर दर्ज किया जाता है। इसके बाद संबंधित कर्मचारी लेकर गोरखपुर आते हैं। नमूने मिलने के 24 घंटे में हम परिणाम दे देते हैं लेकिन नमूने लेने से लेकर जांच और परिणाम को पोर्टल पर अपडेट करने की प्रक्रिया में अमूमन तीन दिन तक लग ही जाता है।’

(देवरिया से जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट।)

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