हल्द्वानी के ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे की मौत पर मीडिया ने चुकाई जीएसटी!

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रवीश कुमार

राष्ट्रीय चैनलों के डिबेट शो में पिछले तीन दिनों से उत्तराखंड के ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे की मौत को लेकर चर्चा हो रही है। एंकरों को कोई दूसरा मुद्दा ही नहीं मिल रहा है। व्यापारी सड़क पर हैं। ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे जीएसटी और नोटबंदी के कारण कर्ज़े में आ गए और सल्फास खाकर मर गए। एंकरों का गुस्सा देखने लायक है। वक्ता और प्रवक्ता की शराफत माननी होगी। वे झगड़ नहीं रहे हैं बल्कि शर्मिंदा हैं। मुआवज़ा और मदद की बात कर रहे हैं। हमारी राजनीति की यही अच्छी बात है। पहले नहीं होती मगर मरने के बाद संवेदनशीलता में कोई कमी नहीं होती है।

प्रकाश पांडे की मौत पर ऐसे ही डिबेट होता अगर मीडिया गोदी मीडिया न होता। मैं टीवी नहीं देखता, इसलिए कल्पना ही कर सकता हूं कि चर्चा हो रही है। जानता हूं कि ऐसा नहीं होगा तभी तो टीवी नहीं देखता हूं। मीडिया चुप रह कर जीएसटी चुका रहा है।

देहरादून में बीजेपी के मुख्यालय पर राज्य के कृषि मंत्री जनसुनवाई कर रहे थे। उसी वक्त ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे आते हैं और अपनी बात कहने के बाद बेहोश हो जाते हैं कि सिस्टम ने मुझे परेशान कर दिया। मैं कर्ज़दार हो गया हूं। जीएसटी और नोटबंदी लागू होने से( हिन्दुस्तान टाइम्स)। वैसे यह ख़बर कई अख़बारों में छपी है।

हल्द्वानी के ट्रांसपोर्टर प्रकाश पांडे की मौत। फोटो : साभार

अख़बारों ने लिखा है कि पांडे ने कृषि मंत्री को एक पत्र भी दिया जिसमें लिखा था कि ट्रक की किस्त नहीं दे पा रहे हैं, बच्चों की फीस नहीं भर पा रहे हैं। उनके बेहोश होने के बाद बीजेपी के कार्यकर्ता अस्तपाल तक ले गए। जहां तीन दिनों तक भर्ती रहने के बाद भी प्रकाश नहीं बच सके। प्रकाश पांडे ने सल्फास खा लिया था।

प्रकाश की फेसबुक प्रोफाइल बताती है कि वह भाजपा समर्थक ही थे। आई टी सेल के तमाम रचनाओं को आगे बढ़ाते रहे। अपनी स्थिति को लेकर भाजपा सरकार के ओहदेदारों से संपर्क में भी थे। मगर कुछ नहीं हुआ। बिहार का इंजीनियर रोहित सिंह भी मोदी का फैन था। चलती ट्रेन से फेंक कर मार दिया गया। महीनों तक सिस्टम चुप रहा।

सिस्टम की क्रूरता उसके प्रति भक्ति से कम नहीं हो जाती है। हम एक ऐसे दौर में हैं जहां न विरोधी होकर कल्याण है न भक्त होकर। हर आदमी अपनी भीड़ में अकेला है। सिस्टम की क्रूरता किसी सरकार के आने से नहीं बदल जाती मगर उस सरकार की संवेदनशीलता अगर ख़त्म हो जाए तो सिस्टम जानलेवा हो जाता है। हर राज्य में यही हाल है।

जीएसटी और नोटबंदी की तारीफ़ों के फुटनोट्स में प्रकाश पांडे की लाश पड़ी मिलेगी। किसी को दिखेगी भी नहीं। काश उन्हें कोई सुन लेता। कोई दिलासा दे देता। बैंकों से कह दिया जाता कि जैसे बड़े कारपोरेट से लाखों करोड़ का लोन लेने के वक्त आप आंखें मूंद लेते हैं, वैसे ही जीएसटी और नोटबंदी से परेशान व्यापारियों के लिए भी निगाह फेर लीजिए। उन्हें मोहलत दे दीजिए। ये व्यापारी ही तो राष्ट्रवाद के प्रायोजक हैं। इनकी निष्ठा पर शक क्यों करें, चुका ही देंगे। मगर सब कुछ ब्याज़ है। सूद है। मूल कुछ नहीं।

हल्द्वानी के प्रकाश पांडे के सल्फास खाने के बाद मुख्यमंत्री 12 लाख रुपये मुआवज़ा देने का एलान कर रहे हैं। परिवार वाले स्थाई नौकरी और अधिक मुआवज़े की मांग कर रहे हैं। हल्द्वानी में व्यापारियों और ट्रांसपोर्टर ने बुधवार को बंद भी रखा। हिन्दुस्तान टाइम्स से ट्रांसपोर्टर संघ के अध्यक्ष प्रीतम सब्बरवाल ने कहा है कि बिजनेस ख़त्म हो गया है। राज्य सरकार कुछ नहीं कर रही है। प्रकाश की मौत बताती है कि राज्य में ट्रांसपोर्टर की हालत कितनी ख़राब है। अच्छा होता ट्रांसपोर्टर और व्यापारी भी प्रकाश जैसे व्यापारियों का साथ देते और खुलकर लड़ाई लड़ते।

कई व्यापारी मुझे लिखते हैं कि जीएसटी के कारण उनके 50-50 लाख रुपये रिफंड के अटके पड़े हैं। कारोबार अटक गया है। लिखता नहीं वरना आप कहेंगे कि मोदी विरोध का ठेका लेकर बैठा हूं। हालांकि जीएसटी पर सरकार को फीडबैक देने का साहस नहीं दिखाया होता तो व्यापारियों की क्या हालत होती। सरकार के कितने फैसले हमारी स्टोरी को सही साबित करते हैं। हमारा काम फीडबैक पहुंचाना है सो समय पर पहुंचा दिया।

व्यापारी जितने भी ताकतवर हों, जीएसटी की तारीफ़ ही उन्हें सुनने को मिलेगी। उनकी तक़लीफ़ की अब कोई जगह नहीं है। न किसी अख़बार में न किसी संसार में। पैसा कितना निर्बल बना देता है। बल्कि सत्ता के दरबार में पैसा ही निर्बल बना देता है।

(रवीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार और टीवी एंकर हैं। उनकी यह टिप्पणी उनके फेसबुक पेज से साभार ली गई है।)

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