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ये आग तो बुझ जायेगी, मगर सवाल तो सुलगते रहेंगे!

इस साल जनवरी के महीने ही से उत्तराखण्ड के अधिकांश जंगल जलने लग गये थे। ये हालत जंगल की बदहाली को बयान कर रहे थे, पर जंगलात इस आड़ में छुपता रहा कि ये जंगल की आग दरअसल “कंट्रोल बर्निंग” है। सच ये था कि जंगलात जहां कहीं भी कंट्रोल बर्निंग नहीं भी कर रहा था वहां आग बे काबू होती जा रही थी। साफ जाहिर था कि कुछ तो गड़बड़ हो रही है। वर्ना और साल जाड़ों में जंगल बेकाबू होकर नहीं जलते थे। हमने इस बात पर जब सेवानिवृत्त प्रमुख वन संरक्षक ईश्वरी दत्त पांडे से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि कंट्रोल बर्निंग विशेष परिस्थितियों में ही, वह भी बहुत ही नियंत्रित तरीके से लगायी जाती है। यह कभी भी इतनी व्यापक नहीं होती है। फरवरी, मार्च में जंगलों के जलने का सिलसिला जारी रहा और अप्रैल आते आते तो जंगलों की आग इतनी व्यापक हो गयी है कि अधिकाश वायुमंडल धुएं से भर गया है।
इससे पहले 2016 में जंगलों में भयानक आग लगी थी। सभी न्यूज चैनल दिन भर उत्तराखण्ड के जंगलों की आग को दिखाते रहते थे। साथ ही यह नेरेटिव चारों ओर जोर पकड़ता रहा कि माफियाओं ने जंगलों से जो चोरी की है उसे छिपाने के लिए वे वन विभाग से मिलकर जंगल जला रहे हैं। इस साल सरकार प्रदेश में कांग्रेस की नहीं है अब भाजपा की सरकार है इसलिए मीडिया ने पहले तो करीब-करीब आग की खबर को उतना महत्व नहीं दिया है, दूसरा अबकी बार माफिया के स्थान पर गांववालों को आग लगाने के लिए दोषी ठहराया जा रहा है। मीडिया ने यह भी जोर शोर से प्रचार किया है कि नये मुख्यमंत्री ने आग को बुझाने के लिए जबरदस्त पहल कर रखी है। साथ ही यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि केन्द्र सरकार ने आग बुझाने के लिए दो हेलीकॉप्टर भी भेज दिये हैं और इन हेलीकॉप्टरों से फटाफट आग बुझ जायेगी। इस पर वनाधिकारी ईश्वरी दत्त पांडे, जो अस्सी के दशक में “मॉडर्न फायर फाइटिंग प्रोजेक्ट” के प्रमुख रह चुके हैं, ने बताया कि दो हेलीकॉप्टरों के बल पर जंगल की आग बुझाने की बात कहना बेमानी है।

यदि हेलीकॉप्टर से ही आग बुझानी है तो इसके लिए हेलीकॉप्टरों का एक काफिला चाहिये ताकि वे एक के बाद एक लगातार आग पर पानी बरसा सकें और साथ ही जमीन पर क्रू चाहिये जो उस बुझती आग को पूरी तरह खत्म कर दे। बहरहाल हेलीकॉप्टर का शिगूफा तो फैलाया ही जा रहा है। जब 2016 में भी हेलीकॉप्टर आग बुझाने के लिए लगाये गये थे तब मीडिया ने उस आग को बुझाने के लिए छिड़के जा रहे पानी की कीमत तक निकाल दी थी जो करीब 240 रू0 लीटर बतायी गयी थी। मीडिया प्रबंधन में भाजपा माहिर है इसलिए एक दिन आग पर चिंता जताने प्रदेश के मुख्यमंत्री भी टीवी पर दिख गये और हर एक न्यूज चैनल पर आग बुझाने के लिए किये गये प्रयासों के प्रचार के लिए एक विज्ञापन भी चलने लगा है। इसी बीच कहीं रोड के किनारे वन मंत्री हरक सिंह रावत भी आग बुझाते दिख गये। हालांकि वह ठीक वैसे ही दिख रहे थे जैसे सफाई अभियान के दौरान मंत्री लोग झाड़ू लगाते दिखते थे यानी बनावटी। मीडिया ने उपलब्ध “पर्यावरणविदों” के हवाले से उनकी फोटोयुक्त इंटरव्यू आग के “कारण और निवारण” जिसमें रोचकता अधिक लेकिन व्यवहारिकता कम होती है, को छाप कर मामले का अपनी शैली में निबटारा कर, अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है।

लेकिन उत्तराखण्ड के जंगलों की आग इतने हल्के में लेने का मामला नहीं है। उत्तराखण्ड के जंगल 549 मीटर समुद्र की ऊँचाई से लेकर 3750 मीटर ऊँचाई तक फैले हैं। इसके एक सिरे में साल के अधिकांश समय गर्म मौसम रहता है तो दूसरे हिमालय की ऊँचाई को छूता है और साल भर ठंडा रहता है। इस ऊँचाई के भू क्षेत्र के अंर्तगत प्रदेश का 56.14 प्रतिशत भाग आ जाता है। अनेकों नदियों से युक्त इस क्षेत्र में आश्चर्यजनक जैवविविधता है। जैव विविधता से भरे इन जंगलों में दावाग्नि से बचने का कवच केवल चीड़ के पास है जिसकी छाल आग प्रतिरोधक होती है और प्रतिवर्ष निचली शाखाओं की प्राकृतिक प्रूनिंग हो जाने से, दावाग्नि चीड़ के पेड़ को विशेष क्षति नहीं पहुंचा पाती है। लेकिन उसी जंगल के चौड़ी पत्ती वाले पेड़, झाड़ियां, लताएं, शाक व जीव जन्तु इस आग से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं और नष्ट हो जाते हैं। इसी तरह बांज के जंगलों की आग बहुत खतरनाक इसलिए हो जाती है क्योंकि बांज की पत्तियां बहुत घनी और अत्यंत ज्वलनशील होती हैं। आग की तीव्रता बहुत तेज हो जाती है, जिस कारण आग से पूरा पेड़ ही झुलस जाता है। जिससे बांज के जंगलों का धरातल जो कि कई वर्षों से पत्तियों की खाद से अत्यंत उर्वर बना होता है, भी जल कर नष्ट हो जाता है। बांज के जंगल में जैवविविधता भी बहुत अधिक होती है। इसलिए बांज के जंगलों को जैवविविधता की दृष्टि से अपूरणीय क्षति होती है।

बांज के जंगल के धरातल के कारण ही उस जंगल की पानी को संग्रहित करने की क्षमता बहुत अधिक होती है। इसलिए बांज के जंगलों की आग से उस जंगल की जैवविविधता के साथ ही पानी के स्रोत आने वाले समय में बुरी तरह प्रभावित होते हैं। लेकिन वन विभाग की कार्ययोजनाओं में जैवविविधता संरक्षण के लिए कोई स्थान नहीं होता है क्योंकि ये विभाग आज तक अंग्रेजों के बनाये सिल्वीकल्चर के कुचक्र से बाहर नहीं निकल पा रहा है। वह सिल्वीकल्चर केवल व्यापारिक पेड़ों के उत्पादन और दोहन को ध्यान में रख कर बनाया गया था, पर्यावरण की सोच व जरूरत में भारी बदलाव हो जाने पर भी वन विभाग इसका विकल्प नहीं ढूंढ पाया है क्योंकि पर्यावरण के सरोकार इतने व्यापक हैं कि उसमें वन विभाग की जिम्मेदारी का मापना आसान नहीं है। इसलिए वह पूरी तरह ढीठ बना है। वह यही जानता है कि उसका काम जंगल क्षेत्रफल है चाहे उसमें बंजर इलाके ही शामिल क्यों न हों।

इसीलिए हर साल जब भी जंगलों में आग लगती है वन विभाग इसका विवरण क्षेत्रफल में देता है। बाद में कभी कभी नुकसान के अनुमानित धनराशि की घोषणा भी कर देता है। जैसे पिछले दिनों एक सूचना जारी की गई थी कि अब तक 1290 हेक्टेयर जंगल जला है, अभी धनराशि नहीं बतायी है। संपत्ति के नुकसान का अनुमान तब लग सकता है जब उसका लेखा जोखा रखा हो। इसलिए जैवविविधता का क्या नुकसान हुआ इसका जिक्र उसकी अंदरूनी रिपोर्टों में भी नहीं होता है, देने के लिए इनके पास आधार है ही नहीं। हालांकि यह रिर्पोट भी फर्जी होती है क्योंकि एक सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति भी जानता है कि 1290 हेक्टेयर के जंगल का अर्थ हुआ करीब 13 वर्ग किलोमीटर यानी समझने के लिए 13 किमी लंबा और 1 किमी चौड़ा इलाका। इस क्षेत्रफल से ज्यादा आग तो वन विभाग के एक वन प्रभाग में लग चुकी है। हर प्रभाग में आग लगी है प्रदेश में 29 टेरीटोरियल प्रभाग हैं। सभी में आग लगी है, तो इस झूठे आंकड़े पर जो यह जानते हुए कि अपूर्ण और निरर्थक है कौन विश्वास कर लेगा?

वन विभाग पुराने जमाने के इस सिद्धांत कि ‘जंगल की आग वन पारिस्थिकी का एक अभिन्न हिस्सा है और जंगल में ज्वलनशील पदार्थ कम करने चाहिये ताकि जंगल जल नहीं सके‘, पर अटका हुआ है। ये सि़द्धांत एक प्राकृतिक व संतुलित जंगल के लिए ठीक थे। पर हमारे अधिकांश जंगल आज बुरी तरह अवनत हैं, इनमें प्रजातीय संतुलन बिगड़ चुका है और अधिकांश जंगल मोनोकल्चर में बदल चुके हैं जंगलों की अधिकांश आगें बची खुची जैवविविधता और उर्वरा को भी नष्ट कर देती हैं। हर साल की आग जंगल की जैवविविधता को संभलने का समय भी नहीं देती और हर साल और खराब कर देती है। वानिकी विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार लगने वाली दावाग्नि जंगल की एक साल की बढ़वार को खत्म करने के साथ-साथ वन भूमि के जल शोषण क्षमता को कमजोर कर देती है। जिससे बरसात के दौरान बरसा पानी जज्ब न हो पाने के कारण बाढ़ और भूस्खलन के साथ-साथ जल स्रोतों को पानी की उपलब्धता कम हो जाती है।

ये सब अब आम आदमी भी महसूस करने लगा है। इसलिए जरूरी है कि वर्तमान परिस्थितियों व नयी जानकारी के आधार पर नया वन प्रबंध विकसित किया जाय जिसमें विशेषकर वनों के अग्नि प्रबंध में बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार कार्ययोजनाएं बनायी जाएं। लेकिन ऐसा करें कैसे? क्या वन विभाग जो मूल रूप से एक तकनीकी व वैज्ञानिक विभाग था आज पूरी तरह नौकरशाही के विकृत रूप में जकड़ चुका है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसमें आज बड़े-बड़े अधिकारी जिन्हें मुख्य वन संरक्षक, अतिरिक्त प्रमुख वन संरक्षक और प्रमुख वन संरक्षक नाम दिया गया है से भरा हुआ है। जिनका ध्यान मोटी तनख्वाह और सुविधाओं के अलावा किसी बात पर नहीं है। वे जंगल बहुत ही कम जाते हैं। अधिकांश वनस्पति और जीवों का पहचानते तक नहीं। इसके विपरीत छोटे पद खाली पड़े होने से कर्मचारियों में जरूरत से ज्यादा काम का बोझ आ गया है, जिससे अपने दायित्वों को ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं। इस बिगड़े संतुलन से वन विभाग में कार्य संस्कृति समाप्त हो गयी है और केवल नौकरशाही और भ्रष्टाचार हावी है। इस माहौल में वन विभाग से कुछ सुधार की उम्मीद केवल आशा के विरूद्ध आशा करने जैसा है।

कहने के लिए उत्तराखण्ड में “पर्यावरणविदों” की भीड़ है। इनकी किस क्षेत्र की विशेषज्ञता है यह भी कोई नहीं जानता पर इन्हें पर्यावरण जैसे विकट व जटिल विषय के प्रत्येक पहलू का विद्वान मान लिया जाता है। इस तरह ये सरकार व वन विभाग के लिए “सेफ्टी वाल्व” की तरह काम करते हैं। इसलिए इनमें से अधिकांश के वन विभाग और प्रशासन से घनिष्ठ और मधुर संबंध बने रहते हैं, इसलिए ये वन विभाग और प्रशासन की बहुत सधी हुई आलोचना करते हैं। पिछले लगभग तीन महीनों से उत्तराखण्ड के जंगल जल रहे हैं, इनमें से किसी ने भी आकर इस आपदा के समाधान में कोई सक्रिय भूमिका निभायी ऐसा नहीं कहा जा सकता है। अतः इनसे इस जटिल व दीर्घकालीन समस्या के हल के बारे में कोई पहल या नेतृत्व की उम्मीद नहीं करनी चाहिये।

इस आपदा का हल दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना नहीं किया जा सकता है। पर फिलहाल जिस तरह राजनीतिक परिदृश्य है उसमें वन कभी भी राजनीतिक मुद्दा बन ही नहीं पाता है। क्योंकि जंगल की आग पर आम लोग कितना ही हो हल्ला क्यों न करें वोट देते समय वे इस मुद्दे को महत्व नहीं देते हैं, चुनाव के लिए भावनाओं के आधार मुद्दे पर बनाना सबसे सरल और सफल तरीका सिद्ध हो चुका है।
इन उलझनों के बीच मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा है। मुख्य न्यायाधीश आर.एस. चौहान ने विषय की गंभीरता को देखते हुए मामले का स्वतः संज्ञान लिया और वन विभाग के मुखिया राजीव भरतरी को व्यक्तिगत रूप से बुला कर कई आदेश दिये हैं। जिनमें वन विभाग के खाली पड़े 60 प्रतिशत पदों को 6 माह में भरने, आग को दो हफ्तों में बुझाने और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के 2017 के दिशानिर्देशों को पालन करने, आग बुझाने के लिए और हेलीकॉप्टरों की उपलब्धता बढ़ाने और सरकार से दावाग्नि शमन के लिए वन विभाग का बजट बढ़ाने के आदेश दिये हैं। ये आदेश भले ही न्यायालय की चिंता को दर्शाते हों पर जमीन पर इनका अगर उसका पालन उस भावना से नहीं होता है जैसा न्यायालय ने सोचा है तो निश्चित है कि वन विभाग के लिए ये आपदा फिर एक बार अवसर में बदलेगी क्योंकि पिछली वर्षों की आग के बाद आये बजट के संबंध में यही अनुभव रहा है।

जंगल की आग जंगल में पड़े सूखी पत्तियों व और ज्वलनशील वनस्पतियों पदार्थों में आग लगने से पैदा होती है। जो गर्मी के मौसम में सूखापन बहुत बढ़ जाने के कारण अधिक लगती है। यदि इस दौरान थोड़ा बहुत बारिश होती रहे तो फायर सीजन नहीं हो पाता है। इस दौरान लंबा सूखा पड़ा है। पिछले चार महीनों के लगातार आग लगने से जंगलों का ज्वलनशील पदार्थ समाप्त हो चुका है इसलिए संभावना है कि आगे के महीनों में आग लगने के कुछ बचा ही न हो। इसलिए धीरे-धीरे यह आग तो समय के साथ बुझ ही जायेगी वे सवाल सुलगते रहेगें कि आखिर जंगलों में अब मौसम-बेमौसम आग क्यों बेकाबू हो जाती है। यह प्रश्न भी अनुत्तरित ही रहेगा कि आग कितना इलाका जला, कितना नुकसान हुआ और यह लापरवाही थी या अपराध और इसके लिए कौन उत्तरदायी था या दोषी। ये सवाल फिर पूछे जायेंगे जब 1-2 साल के अंतराल में फिर आग लगेगी और मीडिया प्रबंधन के जरिये इसे शायद फिर निबटा लिया जायेगा। जैवविविधता की इस अपूर्णीय क्षति से जिस तरह से हम प्राकृतिक रूप से अपने देश और प्रदेश को विपन्न करते जा रहे हैं, वह न जाने देशप्रेम-देशद्रोह की परिभाषा के अंर्तगत कब स्थान पायेगा।

(विनोद पाण्डे का लेख। नैनीताल समाचार से साभार लिया गया है।)

This post was last modified on April 15, 2021 8:29 pm

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