Sunday, June 26, 2022

स्मृति दिवस पर विशेष: ‘बेड़ु पाको’ के बहाने पहाड़ी लोक के चितेरे मोहन उप्रेती की याद

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”बेड़ु पाको बारामासा.. ओ नरैण काफल पाको चैता.. मेरी छैला..

रूण-भूणा दीन आया.. ओ नरैण मैं पुजै दे मैत.. मेरी छैला..”

दिसम्बर 1955 की दिल्ली की किसी सर्द दोपहर, तीन मूर्ति भवन के सभागार में बर्फ़ के फ़ॉहों जैसी मखमली आवाज़ों में ये गीत एक कोरस में गूंज रहा था।

”बेड़ु पाको बारामासा.. ओ नरैण काफल पाको चैता मेरी छैला..”

इस सभागार में एक ऐसा स्वागत समारोह चल रहा था जिस पर पूरी दुनिया की नज़र थी। शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ के तत्कालीन प्रमुख, निकोलाई बुल्गैनिन/Nikolai Bulganin और बाद के सालों में सोवियत संघ की कमान संभालने वाले निकिता ख्रुश्चेव/Nikita Khrushchev पहली बार, हाल ही में आज़ाद हुए भारत के मेहमान थे.. जिनका गुटनिरपेक्षता की राह पकड़ चुके भारत में गर्मजोशी के साथ स्वागत हुआ।

इस अहम राजनीतिक दौरे के बीच, तीन मूर्ति के इस सभागार में भारतीय लोक संगीत के चुनिंदा गीतों को इन मेहमानों के स्वागत के लिए चुना गया था.. इन्हीं में शुमार था, जादुई संगीत में पिरोया, सुदूर उत्तर के पहाड़ी अंचल कुमाऊँ का ये खूबसूरत गीत..

‘ओ नरैण काफल पाको चैता मेरी छैला।।’

कुमाऊँ के लोक कलाकारों की इस टुकड़ी का नेतृत्व कर रही थी इस गीत के संगीतकार कॉमरेड मोहन उप्रेती और नईमा खान की जोड़ी।

इस सभागार से उठी इस गीत की गूंज पूरे देश में कुमाऊँ और बाद में उत्तराखंड का पर्याय बन गई..

उत्तराखंड का संगीतमय परिचय बन गए इस ऐतिहासिक गीत ‘बेड़ु पाको बारामासा’ को अपने संगीत से संवारने वाले और करिश्माई शोहरत दिलाने वाले मोहन उप्रेती की आज (6 जून, 1997) पुण्य​ तिथि है। इसी मौके पर हम याद कर रहे हैं इसी गीत की सृजन यात्रा के बहाने पह़ाड़ की पहाड़ी लोक कलाओं को संजोने का जुनून पाले मोहन उप्रेती की स्मृतियों को।

1952 की कोई एक पहाड़ी शाम थी। अल्मोड़ा में जाखनदेवी मंदिर के पास उद्दा यानि उदे सिंह की चाय की टपरी में चूल्हे पर रखी चाय खौल रही थी। उदे सिंह ने केतली उठाकर कॉंच के दो गिलासों में चाय उड़ेली और सामने लकड़ी के लंबे बेंच में बैठे दो नौजवानों की ओर लहराते हुए बढ़ा दी। चाय की टपरी पर पहुंचे ये दोनों नौजवान एक दूसरे से अनजान थे। लेकिन सर्द शाम में चाय की तलब और इसकी गर्मी को दोनों ही करीब से जानते थे। यहीं से दोनों के बीच बातों का सिलसिला शुरू हुआ।

इनमें से मोहन उप्रेती की शाम तो अक्सर उदे सिंह की चाय की टपरी पर गुजरती थी। लेकिन दूसरे महाशय नए थे। वह गवर्न्मेंट नार्मल स्कूल में टीचिंग की ट्रेनिंग के सिलसिले में अल्मोड़ा आए हुए थे। दोनों के बीच थोड़ी बातचीत बढ़ी तो परिचय हुआ। मोहन ने संगीत और ख़ासकर कुमाऊँनी के लोक संगीत में अपनी दिलचस्पी के बारे में जब इन्हें बताया तो उन्होंने पूछा, ”क्या आपने ‘बेड़ु पाको बारा माशा’ गीत सुना है?” मोहन पहली बार ये बोल सुन रहे थे। उन्होंने इनकार किया। फिर उन्होंने उनसे गुजारिश की कि वे इसे गाकर सुनाएँ। इस शख़्स ने अपनी लोक शैली में इस गीत की पहली पंक्ति गा कर सुना दी। और फिर कुछ झेंपते हुए ठहरे और मुस्कुराकर बोले, ”आगे के बोल मुझे याद नहीं।”

मोहन उप्रेती अपनी किताब ‘कुछ मीठी यादें, कुछ तीती’ में उस शाम का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं, ”मुझे बोलों के बजाय धुन अधिक आकर्षक लगी। एक कागज़ के पुर्जे पर मैंने वह पहली पंक्ति लिख कर अपने पास रख ली। गीत के प्रारम्भ के ये बोल और वह धुन मेरे अन्दर बड़ी तीव्रता से चक्कर लगाने लगी।”

लोक की स्मृतियों में तैरते इस गीत की आमद लोक कलाओं के एक भावी पुरोधा के दिमाग में हो चुकी थी। इस गीत की शुरूआती पॅंक्ति और धुन ने मोहन उप्रेती को भीतर कहीं बेचैन कर दिया था।

अभी कुछ ही दिन हुए थे, अल्मोड़ा की एक और विलक्षण प्रतिभा से मोहन उप्रेती की नई नई दोस्ती हुई थी। ये शख़्स थे रंगकर्मी, लेखक और कवि, ब्रजेंद्र लाल शाह।

उद्दा की उसी टपरी में अगले कुछ ही दिनों में ब्रजेंद्र लाल शाह से मोहन उप्रेती की मुलाक़ात हुई। मोहन उप्रेती की ज़ुबान पर वही धुन चढ़ी हुई थी। पहाड़ पत्रिका के संयुक्तांक 5-6 में अपने एक संस्मरण, ‘मेरी लोकयात्रा: माटी से मंच तक’ में ब्रजेंद्र लाल शाह लिखते हैं, ”अल्मोड़ा में मोहन उप्रेती ने उदेसिंह (जाखनदेवी वाले) की चाय की दुकान में उक्त गीत की स्थाई धुन को द्रुत लय में मुझे सुनाया। धुन सुन कर मैं फड़क उठा और उस गीत के लिए अंतरा जुटाने में लग गया। इस कार्य में मैंने, कुमाऊँनी लोकगीतों, पहेलियों और मुहावरों के संकलनकर्ता स्वर्गीय चौधरीलाल वर्मा, द्वारा मुझे लिखवाई गई कुछ न्योलियों को अंतरे के रूप में जोड़ा और विश्व शॉंति आंदोलन के लिए अंतिम अंतरा खुद लिखा।”

अब अक्सर वो अंतरा इस गीत के साथ नहीं गाया जाता है लेकिन मोहन उप्रेती ने अपनी किताब ‘कुछ मीठी यादें, कुछ तीती’ में उसे शामिल किया है। वो अंतरा है..

”लड़ मरी के होलो

नरैणा लड़ाई छौ धोखा मेरी छैला

हरी भरी रईं चैछ

नरैणा धरती की कोख मेरी छैला”

……..

मोहन उप्रेती आगे लिखते हैं, ”जब गीत में नए चरण जोड़े जा रहे थे तो मुझे लगा कि पुरानी धुन भी बदल देनी चाहिए और मैंने उसे बदल दिया। एक नई धुन का निर्माण कर उसमें वे सारे बोल बैठा दिए। गीत का कलेवर ही बदल गया था। गीत पूरा हुआ और कालान्तर में न मालूम कहॉं-कहॉं और कितनी बार इसे गाया गया।”

…..

ब्रजेंद्र लाल शाह के रचनाकर्म पर शोध करने वाले लेखक कपिलेश भोज, अपनी किताब ‘लोक का चितेरा: ब्रजेंद्र लाल शाह’ में ज़िक्र करते हैं, ”पहली बार इस गीत का प्रदर्शन् मोहन उप्रेती और ब्रजेंद्र लाल शाह ने राजकीय इंटर कॉलेज, अल्मोड़ा की छात्राओं के साथ अक्टूबर 1952 में नैनीताल में शरदोत्सव के अवसर पर ‘रिंक हॉल’ में किया। सभी दर्शकों के साथ ही उत्तर प्रदेश के तत्कालीन शिक्षामंत्री डॉ. सम्पूर्णानन्द इस नृत्य-गीत को सुनकर झूम उठे थे।”

धीरे-धीरे इस गीत की शोहरत इन दोनों कलाकारों की शोहरत भी बनती गई।। हालॉंकि वे कुमाऊँ के लोक में पसरे कई और गीतों और कहानियों पर नाटक और नृत्य नाटिकाएँ बनाने का काम लगातार करते रहे.. लेकिन इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह बना कि अब यह गीत इस मंडली के हर एक कार्यक्रम में गाया जाने लगा। और बाद में इसकी प्रसिद्धि तीन मूर्ति भवन के उस ऐतिहासिक समारोह तक भी जा पहुंची।

कहा जाता है कि उस सभागार में मौजूद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जेहन में ये गीत कुछ ऐसे दर्ज हुआ कि यह उनका सबसे पसंदीदा लोक गीत बन गया। इसके गायक और संगीतकार मोहन उप्रेती को उन्होंने ‘बेड़ू पाको बॉय’ के एक नए नाम से नवाज़ा..

तीन मूर्ति भवन में मोहन उप्रेती, उनकी पार्टनर नईमा खान और उनकी मंडली ने जब इस गीत की तान छेड़ी तो इसकी धुन को रूबी दत्त की ख़ूबसूरत नृत्य प्रस्तुति ने संगत दी थी। रूबी दत्त, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के जनरल सेक्रेट्री कॉमरेड पीसी जोशी की पत्नी और चिटगॉंव विद्रोह की अभियुक्त रहीं क्रॉंतिकारी कल्पना दत्त की बहन थीं।

हालॉंकि कुछ लोग इस गीत का मूल स्रोत पश्चिमी नेपाल में मानते हैं। और बताया जाता है कि अपने मूल में यह गीत ‘बेड़ु पाको बारामासा’ की जगह बेड़ु पाको बार्योमासा’ है। यहां ‘बारामासा’ का अ​र्थ बारहों मास के बजाय ‘बार्योमासा’ यानि ‘वर्जित’ महीने से है।

बहरहाल, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से ‘डिप्लोमेसी एंड इंटरनेश्नल अफ़ेयर्स’ में अपने एमए के दौर में मोहन उप्रेती Indian People’s Theatre Association यानि इप्टा के सम्पर्क आए थे। इस दौर में इप्टा, भारतीय लोक कलाओं के पुनर्जागरण की एतिहासिक मुहिम में जुटा हुआ था और लोक कलाओं में जनआंदोलनों के बीज डाल रहा था। मोहन उप्रेती इस आंदोलन से काफ़ी प्रेरित थे। वापस पहाड़ लौटकर उन्होंने वरिष्ठ रंगकर्मी बॉंके लाल शाह के साथ मिलकर 1955 में लोक कलाकार संघ की स्थापना की। मशहूर रंगकर्मी और बाद में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के डायरेक्टर बने बीएम शाह, ब्रजेंद्र लाल शाह और नईमा खान के साथ ही उस दौर के कई रंगकर्मी और कलाकार इस संघ में सक्रिय तौर पर शामिल थे।

मोहन उप्रेती, कुमाऊँ की लोक कलाओं की ओर अपने रूझान को और गहरे ले जाने का श्रेय इप्टा से बनी करीबी और कॉमरेड पीसी जोशी को देते रहे। दूरदर्शन को दिए एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, ”इलाहबाद में एमए में एडमिशन लेने के बाद में इप्टा और कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आया। इप्टा के प्रभाव ने मुझे लोक कलाओं की तरफ आकर्षित किया। जब मैंने एमए पास किया तो मैं अल्मोड़ा लौटा। फिर वहां मैंने पहाड़ों की लोक कलाओं का अध्ययन शुरू किया और इसी सिलसिले में गांवों के चक्कर लगाना शुरू किया। अल्मोड़ा में लोक कलाकार संघ नाम से एक संस्था भी स्थापित की। उसी समय कम्युनिस्ट पार्टी के पहले जनरल सैक्रेट्री रहे कॉ. पीसी जोशी अल्मोड़ा आए।

मैं चाहता था कि मैं कानपुर या बम्बई जैसी जगह में मजदूरों के बीच ट्रेड यूनियन मूवमेंट्स में काम करूं। लेकिन मुझे अभी तक याद है कि कॉ. पीसी जोशी ने मुझे कहा कि देखो ये अंचल लोककलाओं में बहुत समृद्ध है। तुम क्यों नहीं इनका अध्ययन करते? और इन्हीं के ज़रिए तुम जनता की सेवा करो। इसका मुझ पर प्रभाव हुआ और मेरे मन में पहाड़ों की लोक कलाओं के अध्ययन के लिए एक आंदोलन सा फूट पड़ा।”

कपिलेश भोज अपनी किताब में लिखते हैं कि कॉमरेड पीसी जोशी की पहल पर ही बाद में, बेड़ु पाको का ”यह नृत्य गीत रूस भी ले जाया गया और मॉस्को रेडिया और दूसरे समाजवादी देशों के रेडियो स्टेशनों से कई सालों तक इसे प्रसारित किया जाता रहा।”

इस बीच 1962 में भारत और कम्युनिस्ट चीन के बीच युद्ध की शुरूआत हुई। इस बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में काम कर रहे कम्युनिस्ट आंदोलन के इर्द गिर्द सक्रिय राजनीतिक और सॉंस्कृतिक कार्यकर्ताओं को नज़रबंद कर लिया गया। और बाद में जब उन्हें छोड़ा गया तो कई लोगों के ख़िलाफ़ Externment orders जारी किए गए। मोहन उप्रेती अपने इंटरव्यू में बताते हैं, ”1962 में भारत चीन युद्ध छिड़ गया। सीमावर्ती क्षेत्रों में काम करने वाले कई कम्युनिस्टों को नज़रबंद कर दिया गया। और हुआ यूं कि ​क्योंकि मैं भी सीमावर्ती क्षेत्र में काम कर रहा था तो मुझे भी जेल में डाल दिया गया। 1963 में अगस्त के महीने में मुझे जेल से छोड़ा गया और उसके बाद मुझे दिल्ली आने पर मज़बूर होना पड़ा क्योंकि मेरे ख़िलाफ़ Externment order जारी कर दिया गया था।”

दिल्ली आने के इस संयोग ने मोहन उप्रेती की प्रतिभा को और व्यापक मंच दिया और यही बात ‘बेड़ु पाको’ गीत के लिए भी लागू हुई। 1968 में मोहन उप्रेती और प्रवासी उत्तराखंडी कलाकारों ने दिल्ली में पर्वतीय कला केंद्र की स्थापना की।  पहाड़ी लोक संस्कृति को राष्ट्रीय मंच दिलाने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण संस्था साबित हुई।।

बाद के समय में ‘बेड़ु पाको’ को लोकप्रियता की वही ऊँचाइयाँ दोबारा तब हासिल हुई जब कुमाऊँनी गायकी के सबसे मशहूर गायकों में शुमार गोपाल बाबू गोस्वामी ने अपनी आवाज़ में इसे रिकॉर्ड कराया.. इसके बाद यह रेडियो और रिकॉर्ड्स की शक्ल में पहाड़ों में हर संभव जगहों में बजता सुनाई दिया..

‘बेडु पाको’ इतना मशहूर हुआ कि इसे कुमाऊँ रेजिमेंट का ऑफ़िशियल सॉंग भी बनाया गया और गढ़वाल राइफ़ल्स का बैंड भी अक्सर इस गाने की धुन बजाता सुनाई देता है.. 

अक्सर उत्तराखंड और पहाड़ का ज़िक्र आते ही कई मशहूर हस्तियॉं भी ‘बेड़ु पाको’ गुनगुनाने लगती हैं। चाहे वह पहाड़ी जवानों के बीच अनुष्का शर्मा हों, मंच पर गाती उवर्शी रौतेला या किसी कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन जैसे मशहूर कलाकार। कई विदेशी मंचों पर भी बेड़ुपाको विदेशी उच्चारणों में गाया जाता सुनाई देता है।

लोक गीत कैसे एक भूगोल और उसके लोक की पहचान बन जाते हैं, ‘बेड़ु पाको’ इसकी एक बानगी है।

(रोहित जोशी पत्रकार हैं और आजकल उत्तराखंड में रहते हैं आप बीबीसी के लिए भी काम करते हैं।)

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