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‘कैफे कॉफी डे’ मालिक वीजी सिद्धार्थ की खुदकुशी के गहरे हैं निहितार्थ

क्या यह आने वाले तूफ़ान की चेतावनी नहीं है एक कॉर्पोरेट की आत्महत्या? कैफ़े कॉफ़ी डे के मालिक ने आखिर आत्महत्या कर ही ली। वैसे हमारा अनुभव तो इन कॉर्पोरेट का बिल्कुल नहीं है। लेकिन कोशिश कर हम इसकी पड़ताल कर सकते हैं। यह कम्पनी शायद 2004 के आस पास देश में लांच हुई होगी। वह दौर मध्यवर्ग के उभार का था। 2006 में शायद पहली बार मुझे भी किसी कैफ़े कॉफ़ी डे में कॉफ़ी हाउस की सफ़ेद पुरानी कप की जगह नए नफासत से पहली बार कपोचिनों काफी पीने को मिली। सफदरजंग एन्क्लेव के शापिंग काम्प्लेक्स में शायद। यह नए मध्यवर्ग के मोबाइल और उत्साह से लबरेज लोगों के लिए नए लुक में AC रूम में घंटे दो घंटे बैठकर गप शप करने का नया अड्डा था। चाय के ठीहे पर अड्डा जमाने वाले जो लोग पांच सितारा होटलों को अफ्फोर्ड नहीं कर सकते थे, उनके लिए जगह-जगह कैफ़े काफी डे ने मध्य वर्ग को जगह देने और एक क्लास निर्मित करने में भूमिका निभाई।

The Great Indian Middle Class का बोलबाला बढ़ रहा था, और लग रहा था कि सरकारी बाबुओं के अलावा भी प्राइवेट सेक्टर में जो ग्रोथ है और जीने का सलीका है, वह इस मध्य वर्ग को जो क्वालिटी जीवन जीने की आजादी देता है, वह सरकारी बाबू से काफी बेहतर ले जाएगी। संख्या भी 15 से 25 करोड़ बताई जाने लगी, और उसकी visibility भी दिखने लगी। लेकिन यह सब बिना शोर-शराबे के चल रहा था। कैफ़े काफी डे के मालिक के ससुर बाद में UPA में विदेश मंत्री भी बने। लेकिन कृष्णा खुद एक नोबल लार्ड की तरह दिखाई दिए राजनीति में। और एनडीए के 2014 में आने पर वह सब बदल गया। उनके ऊपर भी कैफ़े काफी डे को लेकर दबाव और जांच एजेंसी के छापे की खबरें कुछ साल पहले आनी शुरू हो गयी थीं, कि उन्होंने बीजेपी में शामिल होकर सभी अटकलों पर विराम लगा दिया।

इसके बाद छुटपुट सूचनाओं के बाद अभी यह दुखद खबर आई। इससे सिर्फ एक बात स्पष्ट हुई कि कैफ़े काफी डे का दौर जिस तेजी से आया वह 2011-12 के बाद गिरावट का दौर था। अब मध्य वर्ग काफी में भी पैसे बचा रहा था, बाहर भले ही सरकार लम्बी-लम्बी फेंके और विकास के आंकड़े होम मेड बनवाये,जिसे नीति आयोग से इस्तीफ़ा देते ही उसी बात को प्रतिपादित करने वाले अधिकारी ख़ारिज ही क्यों न करने लगें। मंदी तो भारत में 2008 में नहीं बल्कि 2012 से विधिवत प्रवेश कर चुकी थी और मोदी शासन में वह रोकी ही नहीं गई, बल्कि आंकड़ों की बाजीगरी से छुपाई ही गई। अगर न छुपाई जाती तो उस पर मरहम पट्टी की गुंजाइश होती, लोग उस पर चिंता व्यक्त कर रहे होते, जाहिर है सरकार भी उस पर गंभीरता से विचार कर रही होती। दूसरी बात जो समझ में आती है वह यह कि कैफ़े काफी डे टाइप के कॉर्पोरेट ओल्ड स्कूल के साबित हुए।

उन्होंने माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी वाला रास्ता नहीं अपनाया। वे बॉम्बे डाइंग की तरह पिटते रहे लेकिन क्रोनी कैपिटल वाला रास्ता उनकी नफासत aristocracy में शायद बाधक बना। शुद्ध गुजराती बनिये की तरह अगर वह अपना ही फायदा देखता तो आज अरबों रुपये समेटकर किसी यूरोप या दक्षिण अमेरिकी टापू में बीच रिसोर्ट खरीदकर बाकी जिन्दगी ऐश में गुजार रहा होता। तीसरी बात, अब जो हीट मध्यवर्ग तक पहुंची थी, उसकी आंच कॉर्पोरेट की ऊंची ऊंची मेहराबों पर भी आनी शुरू हो गई है। इसका उदाहरण भारत के सबसे प्रतिष्ठित मध्य वर्ग के ब्रांड हमारा बजाज के मालिक का बयान है जो हताशा और गुस्से से मिश्रित था, वह ऑटोमोबाइल सेक्टर में भारी मंदी से उपजा और उसमें आग में घी का काम सरकार की पेट्रोल और डीजल इंजन भारत स्टेज पर चल रहे काम को एकाएक छोड़ इलेक्ट्रिक इंजन के प्रमोशन और टैक्स में छूट ने कर डाला।

बिक्री के लिए जगह जगह वेयरहाउस और डीलर के यहां पटी गाड़ियों के बाद अरबों खरबों से नए प्रदूषण मानक पर इंजन तैयार करने की चुनौती के बीच यह कहना कि इलेक्ट्रिक से चलने वाली गाड़ियां ही भारत का भविष्य हैं, ठीक उसी तरह है जैसे शादी की सारी तैयारी के बीच मंडप में दूल्हा कहे कि मुझे तो लड़की से नहीं बल्कि लड़की के साथ खड़ी उसकी दोस्त से शादी करनी है। बजाज ने कहा कि ऑटो इंडस्ट्री चलाना कोई चाय बनाने की तरह का काम नहीं है। वाकई नहीं है। मुख्य प्लांट के साथ सैकड़ों OEM और ऑटो अन्सिलिअरी कॉम्पोनेन्ट बनाने वाली कम्पनियों में किसी एक उत्पाद के लिए बरसों की तैयारी, पूंजी निवेश, डाई और लाखों कुशल मजदूरों का भविष्य एक झटके में बर्बाद हो सकता है। इसके अलावा शेयर बाजार को किसी तरह छाते की नोंक पर बादल के बरसने से रोकने की कवायद भी अब लगभग फेल होने के कगार पर है।

उसके ढहने और बचा ले जाने के लिए तमाम तिकड़म और विदेशी बांड सहित इतने लफड़े चल रहे हैं कि वह हम जैसे साधारण बुद्धि वाले समझ ही नहीं सकते। लेकिन अगर मार्केट गिरा, तो उसकी विभीषिका बिहार और असम के बाढ़ की तरह होगी। बिहार और असम की बाढ़ को तो वहां के किसान और गरीब झेल रहे हैं, और वहां की राज्य सरकारें धीरे-धीरे टहलते कराहते हुए समय के साथ खुद मरहम लगाती जनता हर बार निपट जाती है। लेकिन व्यापार जिनके खून में है, उनके धन के उड़नछु हो जाने पर उनके साथ साथ राष्ट्र राज्य को भी डुबो देने के खतरे सन्निहित होते हैं। क्योंकि आखिर सब कुछ उन्हीं के लिए तो किया जा रहा है। ये पब्लिक सेक्टर भी ले लो, ये जंगल भी ले लो, भले छीन लो मुझसे हिमालय की वादी, मगर ले के आओ एक अदद विकास की असली जवानी, जिससे देश कम से कम 2004 की स्थिति पर वापस आता हुआ तो दिखे।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on July 31, 2019 4:56 pm

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