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यूपी के वक्फ बोर्ड घोटाले में वसीम रिजवी हुए नामजद, भाजपा का गुणगान भी नहीं आया काम

यूपी में सपा सरकार के जाने के बाद योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनने के बाद रातों रात चोला बदलकर हिंदुत्व, राम मंदिर, आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक और मदरसा शिक्षा और इस्लामी रीति-रिवाजों के आलोचक बन गए वसीम रिज़वी का दांव काम नहीं आया और उत्तर प्रदेश सरकार की सिफारिश के आधार पर सीबीआई ने सूबे के शिया वक्फ संपत्तियों को गैर कानूनी तरीके से बेचने, खरीदने और हस्तांतरित करने के आरोप में मामला दर्ज किया है। वसीम रिजवी के अलावा वक्फ जमीन का लाभ पाने वाले नरेश कृष्ण सोमानी, विजय कृष्ण सोमानी, वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी गुलाम सैयदेन रिजवी और निरीक्षक बाकर रजा को आरोपी बनाया गया है।

वसीम रिजवी ने शिया वक्फ बोर्ड अध्यक्ष पद को साल 2008 से लेकर मई 2020 तक संभाला। इन 12 साल के दौरान यूपी में मायावती से लेकर अखिलेश यादव की सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन वसीम रिजवी अपनी कुर्सी पर बने रहे। 2017 में सूबे में योगी आदित्यनाथ की सरकार आने के बाद भी वसीम रिजवी शिया वक्फ बोर्ड पर बने रहे और हिंदुत्व की विरदावली गाते रहे। वे अक्सर टीवी डिबेट में भाग लेते थे और खुले तौर पर उन सभी चीजों की प्रशंसा करते थे, जिसे भाजपा और आरएसएस ने प्रचारित किया। उनका कार्यकाल 18 मई 2020 को पूरा होने के बाद वक्फ बोर्ड में उनकी नियुक्ति नहीं हो सकी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री मोहसिन रजा के अनुरोध पर वसीम रिजवी के खिलाफ मामलों को फिर से खोल दिया। वसीम रिजवी ने पहले मोहसिन रजा पर वक्फ संपत्ति बेचने का आरोप लगाया था और उन्हें उन्नाव में आलिया बेगम मस्जिद के कार्यवाहक के पद से निलंबित कर दिया था।

वसीम रिजवी के यूपी शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष रहते हुए वक्‍फ की संपत्ति को लेकर धोखाधड़ी में 8 अगस्‍त 2016 को प्रयागराज में रिपोर्ट दर्ज की गई थी। इसके बाद दूसरी 2017 में लखनऊ के हजरतगंज थाने में कानपुर की वक्‍फ संपत्ति को ट्रांसफर करने पर केस दर्ज हुआ था। इन दोनों दर्ज केस के आधार पर वसीम रिजवी के खिलाफ एफआईआर फाइल हुई है।

शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन रहते हुए वसीम रिजवी पर मामला साल 2016 में इमामबाड़ा गुलाम हैदर त्रिपोलिया, ओल्ड जीटी रोड प्रयागराज पर अवैध रूप से दुकानों का निर्माण कराने का है। इस मामले में शिकायत हुई तो तत्कालीन इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के क्षेत्रीय अवर अभियंता सुधाकर मिश्रा ने 7 मई 2016 को निरीक्षण के बाद पुराने भवन को तोड़कर किए जा रहे अवैध निर्माण को बंद करा दिया था। इसके बाद फिर से निर्माण कार्य शुरू करा दिया गया था, इसे रोकने के लिए शिया धर्मगुरु मौला कल्बे जव्वाद समेत कई लोगों ने सरकार को कई पत्र लिखे, फिर भी निर्माण कार्य बदस्तूर जारी रहा।

इमामबाड़ा गुलाम हैदर में चार मंजिला मार्केट खड़ी कर दी गई थी, जिसको लेकर वसीम रिजवी के खिलाफ वक्फ कानूनों के उल्लंघन को लेकर 26 अगस्त 2016 को एफआईआर दर्ज कराई गई। रिजवी के खिलाफ आईपीसी की धारा 447 और 441 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था, लेकिन प्रशासन की ओर से वसीम रिजवी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में एसर फाउंडेशन के अध्यक्ष शौकत भारती ने प्रयागराज के डीएम से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग तक पत्र लिखा। वसीम रिजवी के खिलाफ मौलाना कल्बे जव्वाद ने भी शिकायत दर्ज कराई थी।

वसीम रिजवी के खिलाफ दूसरी एफआईआर लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली में 27 मार्च 2017 को दर्ज की गई थी। ये वही समय था जब यूपी में अखिलेश सरकार सत्ता से बहार हो गई थी और योगी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बन गई थी। ये मामला कानपुर देहात के सिकंदरा में शिया वक्फ बोर्ड में दर्ज 2704 की जमीनों के रिकॉर्डों में घपलेबाजी और मुतवल्ली तौसिफुल को धमकाने का था। इस मामले में रिजवी और वक्फ बोर्ड के अधिकारियों पर 27 लाख रुपये लेकर कानपुर में वक्फ की बेशकीमती संपत्ति का पंजीकरण निरस्त करने और पत्रावली से कागजात गायब करने का आरोप है।

लखनऊ मामले में वासिम रिजवी के खिलाफ सीबीआई की लखनऊ की एंटी करप्शन ब्रांच ने आईपीसी की धारा 409, 420 और 506 के तहत एफआइआर दर्ज की है। इसमें पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी के अलावा शिया वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी गुलाम सैयदन रिजवी और वक्फ इंस्पेक्टर बाकर रजा के अलावा नरेश कृष्ण सोमानी और विजय कृष्ण सोमानी को नामजद किया गया है। इसके अलावा प्रयागराज में हुए वक्फ घोटाले के संबंध में दर्ज एफआईआर में अकेले वसीम रिजवी ही नामजद हैं।

गौरतलब है कि वक्फ बोर्ड एक कानूनी निकाय है, जिसका गठन साल 1964 में भारत सरकार ने वक्फ कानून 1954 के तहत किया था। वक्फ बोर्ड का मकसद भारत में इस्लामिक इमारतों, संस्थानों और जमीनों के सही रखरखाव और इस्तेमाल को देखना था। वक्फ में चल और अचल दोनों ही संपत्तियां शामिल होती हैं। इसमें कंपनियों के शेयर, अचल संपत्तियों के सामान, किताबें और पैसा भी शामिल होता है। इस्लाम शिया और सुन्नी दो संप्रदायों में बंटा हुआ है।  ऐसे में यूपी और बिहार में वक्फ संपत्तियां भी शिया और सुन्नी के बीच बंटी हुई है, जिसके चलते इनके अध्यक्ष भी अलग-अलग होते हैं। इसके अलावा बाकी जगह सिर्फ वक्फ बोर्ड है, जिसमें सारी वक्फ संपत्तियां आती हैं।

सभी बेच रहे हैं धार्मिक संपत्तियां
यह बीमारी केवल वक्फ बोर्ड में ही नहीं है बल्कि हिंदू और ईसाई धर्मिक संपत्तियों में भी है। प्रयागराज में ही बड़े पैमाने पर ईसाई संपत्तियां समय-समय पर बेची जाती रही हैं और पूरे यूपी में नहीं पूरे भारत में अलग-अलग चर्चों से संबन्धित सम्पत्तियां ओहदेदारों द्वारा बेचे जाने के खिलाफ विभिन्न अदालतों, हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में मामले लंबित हैं। इसी तरह विभिन्न मन्दिरों, मठों और अन्य धार्मिक स्थानों की जमीन अवैध रूप से बेचने के आरोप हैं।

प्रयागराज के अल्लापुर मोहल्ले के बाघंबरी रोड पर बाघंबरी आश्रम की आधी जमीन पर बिल्डर द्वारा बनई गई बहुमंजिला ग्रुप हाऊसिंग नंगी आखों से भी देखा जा सकता है। इसी तरह मांडा कस्बे में लगभग 18 बीघा जमीन बेच दी गई है। प्रयागराज के ग्रामीण अंचलों में बड़े पैमाने पर बाबाओं ने जमीनें बेची हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 22, 2020 1:02 pm

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