Saturday, October 16, 2021

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कमला भसीन का मतलब महिला मानवाधिकारों की अप्रतिम हिन्दुस्तानी योद्धा

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महिला अधिकारवादी वैश्विक एक्टिविस्ट, समाज विज्ञानी, लेखिका और कवि कमला भसीन ( 1946-2021 ) के आज तड़के तीन बजे गुजर जाने पर उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों की स्वाभाविक रूप से बाढ़ सी आ गई है। क्योंकि उनका जीवन ही इतना प्रेरक है कि उनके विरोधी भी शायद अब मान लें कि वह महिलाओं के मानवीय मूल्यों की हिफाजत की अप्रतिम योद्धा थीं।

क्योंकि मैं लड़की हूँ

मुझे पढ़ना है

तू खुद को बदल

तू खुद को बदल

तब ही तो ज़माना बदलेगा !

औरत का नारा , आजादी

बच्चों का नारा , आजादी

हम ले के रहेंगे , आजादी

है प्यारा नारा , आजादी

ये कमला भसीन की कुछ कविताओं के अंश हैं। प्रख्यात कथाकार सुधा अरोड़ा ने फेसबुक पोस्ट में लिखा: नारीवाद का पाठ हमें पढ़ाने वाली, हमें अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाने वाली, एक बुलंद आवाज़ –कमला भसीन नहीं रहीं ! उनकी आवाज़ हमारे दिलों में बसी है। आखिरी सलाम हमारी सबसे जांबाज दोस्त !

1970 के दशक से महिला आंदोलन में लगातार सक्रिय रहीं 75–वर्षीय कमला भसीन के हाल ही में कैन्सरग्रस्त होने की डायग्नोसिस हुई थी। उनका जन्म अविभाजित भारत के पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के शहीदावाली गाँव में देश के बंटवारा के बरस भर पहले हुआ था। इसलिए खुद को ‘अर्धरात्रि पीढ़ी‘ की संतान मानती थीं। ब्रिटिश हुक्मरानी से 15 अगस्त 1947 की आधी रात मिली सियासी आजादी के साथ ही उसके हिन्दू और मुस्लिम बहुल दो मुल्कों में हुए त्रासद बंटवारे के दौरान कमला भसीन का परिवार भूमि मार्ग से सीमा पार कर नजदीकी भारतीय राज्य, राजस्थान चला आया।

कमला भसीन ने राजस्थान की ही राजधानी जयपुर से स्नातक और मास्टर्स की भी शिक्षा पूरी की। फिर वह पश्चिम जर्मनी ( विश्व युद्ध में विभक्त जर्मनी का एकीकरण तब नहीं हुआ था) के मुंसटर विश्वविद्यालय से मिली फेलोशिप पर वहाँ ‘ विकास का समाजशास्त्र ‘ विषय पर शोध शिक्षा के लिए चली गईं।

उन्होंने स्वदेश लौट कर राजस्थान में सेवा मंदिर में कार्य करना शुरू किया।वहीं उनकी जान-पहचान पत्रकार और एक्टिविस्ट बलजीत मलिक ( अब दिवंगत) से हुई जो बाद में विवाह में परिणित हो गई। इस विवाह का तीस बरस बाद महिला अधिकारिता के मुद्दे पर ही विधिक तलाक से अंत हो गया। सन 2006 में उनकी पुत्री का निधन हो गया। उनके पुत्र, नीत कमल दिल्ली में अपनी मां के ही घर रहते हैं।

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद कमला भसीन संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी, फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन में नियुक्ति पर बैंकाक चली गईं। वह सन 2002 तक संयुक्त राष्ट्र में कार्यरत रहीं ।

वह स्वदेश लौट कर वह महिला आंदोलन में अग्रणी भूमिका में आ गईं। ये वो समय था जब उत्तर प्रदेश के मथुरा में दो पुलिसकर्मियों ने थाना के भीतर ही एक दलित महिला का वीभत्स बलात्कार किया था। इसके विरुद्ध कमला भसीन और अन्य के चलाए जबरदस्त आंदोलन की बदौलत बलात्कार से संबंधित भारतीय कानून में कुछ सुधार लाए गए। वैसे, बहुत बाद में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की डॉ. मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में दिल्ली के निर्भया बलात्कार कांड में बलात्कार कानून में और सुधार लाए जाने के बाद भी इस कानून में और सुधार लाने की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता है।

कमला भसीन ने कई किताबें भी लिखी हैं जिनमें ‘अंडरस्टैंडिंग जेंडर’, ‘व्हाट इज पैट्रिआर्की’ शामिल है।  

कमला भसीन का मत था कि फेमिनिज़्म, पुरुष और महिला के बीच का कोई युद्ध नहीं है बल्कि पैट्रिआर्की (पुरुष सत्तात्मक समाज) की विचारधारा के विरुद्ध लड़ाई है।

आजादी का तराना

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) नई दिल्ली के छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार को 2016 के बाद आजादी गान की बदौलत देश भर में खूब प्रचार मिला। पर ये गान कमला भसीन ने इसके पाकिस्तानी स्वरूप से प्रेरित होकर भारत में महिला आंदोलनों के लिए 1980 के दशक में ही अपनाया था। उन्होंने खुद हमारे साथ भेंटवार्ता में इसकी पुष्टि की थी कि उन्हें इस गान की जानकारी पाकिस्तान में सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक की हुकूमत के खिलाफ वहां के फेमनिस्ट समूहों के प्रतिरोध को 1984 में देखने जाने पर इसके प्रत्यक्ष प्रयोग से मिली थी। वह इस गान को पाकिस्तान से हिंदुस्तान ले आईं।

बहरहाल, कन्हैया कुमार को राजनीति की दीक्षा देने वाले जेएनयू के पूर्व छात्र और अब वहाँ प्रोफेसर सुबोध मालाकार के अनुसार इस गान का मूल स्रोत देवघर में शिव जलाभिषेक के लिए बिहार में सुलतानगंज घाट पर गंगा नदी से अपने जल भरकर समूह में सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय करने श्रद्धालु काँवरियों के अहर्निश सस्वर कीर्तन-भजन करने की युगों से चल रही परिपाटी में है। फिल्मकार और सुलतानगंज के निवासी संजय झा मस्तान भी इस बात की हामी भरते हैं।

कमला भसीन महिला आंदोलनों में आजन्म सक्रिय ही नहीं अगुआ भी रहीं। उन्होंने पेइचिंग (चीन) में विश्व महिला सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था और उसके बाद 1994 में उदयपुर (राजस्थान) में जेंडर जस्टिस और महिला मुद्दे पर क्षेत्रीय सम्मेलन आयोजित करने की पहल की थी।

कमला भसीन को आधी आबादी ही नहीं भारत की पूरी आबादी का सबरंगी सलाम।

(सीपी झा लेखक और वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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