Saturday, February 4, 2023

ममता बनर्जी और मुकुल रॉय का कार्टून बनाने की सजा, 10 साल बाद बरी हुए प्रोफेसर

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प्रदीप सिंह
प्रदीप सिंहhttps://janchowk.com
दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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जादवपुर विश्वविद्यालय के 62 वर्षीय प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा कार्टून विवाद में 10 वर्ष चले लंबी कानूनी लड़ाई में अदालत द्वारा दोषमुक्त करार दिए गए हैं। लेकिन इस लड़ाई ने पश्चिम बंगाल में एक बार फिर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहस के केंद्र में ला दिया है। इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम और बीजेपी एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं।

जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेता मुकुल रॉय का कार्टून बनाने और शेयर करने के आरोप में 2012 में गिरफ्तार कर लिया गया था। लगभग 10 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई के बाद 18 जनवरी को अलीपुर जिला अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। अदालत के आदेश में कहा गया है कि “आरोपी याचिकाकर्ता अंबिकेश महापात्रा द्वारा डिस्चार्ज याचिका की अनुमति दी जाती है” और “जमानत बांड तदनुसार खत्म की जाती है”।

गौरतलब है कि 12 अप्रैल, 2012 को महापात्रा ने सत्यजीत रे की फिल्म सोनार केला पर आधारित एक कार्टून सीक्वेंस साझा किया। उस दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी को केंद्रीय कैबिनेट से हटवा कर मुकुल रॉय को रेल मंत्री बनवा दिया था। महापात्रा ने इसी घटना या कहें ममता बनर्जी के राजनीतिक जिद पर एक कार्टून सीक्वेंस साझा किया था। जिसे ममता बनर्जी और मुकुल रॉय ने मान-हानिकारक बताते हुए महापात्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया था। मामले की जानकारी होने पर महापात्रा ने 14 सितंबर, 2012 को अलीपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट से छूट मांगने गया था। लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

अपने बरी होने के बाद महापात्रा ने कहा, “बेशक मैं इस सब से बाहर आकर खुश हूं। लेकिन मुझे इतने साल कौन लौटाएगा, जो जेल, अदालत और कानूनी लड़ाई लड़ते हुए मुझे गंवानी पड़ी ? इस मामले को बिना किसी ग्राउंड के जानबूझकर इतने लंबे समय तक खींचा गया।”

यह कहते हुए कि उन्होंने “कुछ चित्रों और संवादों के साथ एक कोलाज कार्टून आगे बढ़ाया था”, महापात्रा ने कहा: “2012 में, तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने रेल बजट पेश किया था और सीएम ममता बनर्जी कुछ बिंदुओं से सहमत नहीं थीं। मनमोहन सिंह तब प्रधानमंत्री थे। उन्होंने उन पर दबाव बनाया और मुकुल रॉय को रेल मंत्री बनाया गया।”

महापात्रा का दावा है कि, “भारत के राजनीति में यह एक अभूतपूर्व घटना थी। रेल बजट एक व्यक्ति पेश करता है और जब तक यह संसद में पारित होता, तब तक रेल मंत्री बदल दिया जाता था। मुकुल राय को नया मंत्री बनाया गया। स्वाभाविक रूप से, यह एक चर्चा का विषय था और कार्टून उसी के बारे में था। ”

महापात्रा ने कहा कि उन्हें “यह कार्टून किसी से मिला था”, और उन्होंने ग्रुप ईमेल पर अपने दोस्तों को भेजा था।

अपनी गिरफ्तारी की रात के बारे में बात करते हुए, महापात्रा ने आरोप लगाया, “यह एक सुनियोजित कदम था। हमारे हाउसिंग कोऑपरेटिव ऑफिस में लगभग 60 से 70 टीएमसी के कार्यकर्ता जमा हो गए थे, जिसमें मैं सहायक सचिव था। मैं अपनी सामान्य दिनचर्या के अनुसार जादवपुर विश्वविद्यालय से लौटता था और कार्यालय में बैठ जाता था। उस दिन वे कार्यालय में एकत्र हुए थे। कुछ अतिरिक्त कक्षाओं के कारण मुझे देर हो गई। वे शाम 7 बजे से मेरा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने मुझे चलते देखा और मेरा रास्ता रोक लिया।

उन्होंने कहा: “वे मुझे जबरदस्ती मेरे कार्यालय ले गए। उन्होंने मुझे कार्टून की एक मुद्रित प्रति दिखाई और पूछा कि क्या मैंने इसे कुछ लोगों के साथ ईमेल पर साझा किया है। मेरे हां कहने पर उन्होंने मुझे पीटना शुरू कर दिया। मेरे साथ मारपीट की गई। मुझे लात घूसों से पीटा गया। मैं डर से कांप रहा था और लोगों से घिरा हुआ था। मैं उस रात को कभी नहीं भूल सकता… मैं गिड़गिड़ाया, रोया और असहाय महसूस कर रहा था।”

महापात्रा ने दावा किया कि उन्हें “एक सादा कागज” दिया गया था और यह लिखने के लिए कहा गया था कि उन्होंने “कार्टून को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया या साझा किया।”।

“मुझे यह लिखने के लिए कहा गया कि मैं एक सीपीआई (एम) कार्यकर्ता था। यह सच नहीं था, इसलिए मैंने मना कर दिया, लेकिन आखिरकार मुझे हार माननी पड़ी। उन्होंने जो कुछ कहा, मैंने उसे एक सफेद कागज पर लिख दिया। उसके बाद वे मुझे और मेरे ऑफिस सेक्रेटरी सुब्रत सेनगुप्ता को पुलिस स्टेशन ले गए। कई बाइक्स ने पुलिस वैन का पीछा किया और जल्द ही हमें अरेस्ट मेमो दिया गया।” महापात्रा 2016 के विधानसभा चुनाव में बेहाला पूर्व निर्वाचन क्षेत्र से सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे द्वारा समर्थित एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े थे।

महापात्रा ने यह भी आरोप लगाया कि “गिरफ्तारी वारंट पर समय, स्थान और गवाह झूठे थे”। “हमें 12 अप्रैल की रात 10:30 बजे गिरफ्तार किया गया था, लेकिन, मेमो पर, उन्होंने 13 अप्रैल को 12:30 बजे दिखाया। मुझे हाउसिंग कोऑपरेटिव ऑफिस से गिरफ्तार किया गया। उन्होंने गिरफ्तारी की जगह के तौर पर मेरा घर दिखाया और गवाह के तौर पर मेरी पत्नी का नाम भी लिखा। मैंने मेमो पर हस्ताक्षर करने पर आपत्ति जताई लेकिन आखिरकार करना पड़ा।”

महापात्रा ने कहा, “गिरफ्तारी के समय सेनगुप्ता ( सेवानिवृत्त सरकारी इंजीनियर) 73 वर्ष के थे। सेनगुप्ता को भी एक रात के लिए हवालात में रहना पड़ा।” 13 अप्रैल को दोनों को अलीपुर क्रिमिनल कोर्ट में पेश किया गया और टीएमसी सरकार और पुलिस द्वारा जमानत याचिका का विरोध करने के बीच जमानत पर रिहा कर दिया गया।

महापात्रा पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66ए (बी) और (सी) के तहत मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में आईटी अधिनियम की धारा 66ए को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। इसके बाद महापात्रा के खिलाफ आईटी एक्ट की धारा 66ए को हटा दिया गया। लेकिन मामला 2021 तक लटका रहा।

“मुझे इस घटना से कितना पैसा और वित्तीय नुकसान हुआ है यह महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि यह लाखों में है। हालाँकि, कई एनजीओ और लोगों ने मेरी मदद की है, इस प्रक्रिया में मुझे वित्तीय सहायता प्रदान की है। लेकिन मैंने जो समय बर्बाद किया है और जिस उत्पीड़न का मैंने सामना किया है, उसे मापा नहीं जा सकता।”

मामला खारिज होने के बाद फेसबुक पर उन्होंने कहा, “इसे एक लोकतांत्रिक दिवस के रूप में वर्णित किया जा सकता है। भारतीय संविधान का सार लोकतंत्र है।” 2011 में माँ-माटी-मानुष (बनर्जी द्वारा लोकप्रिय एक टीएमसी नारा) सरकार ने संविधान के नाम पर शपथ ली और फैसला किया कि सरकार और सत्ताधारी पार्टी के प्रति आलोचनात्मक स्वतंत्र अभिव्यक्ति की अनुमति नहीं दी जाएगी। पुलिस प्रशासन, सत्ता पक्ष और सत्ता पक्ष समर्थित अपराधियों की संयुक्त सेना को उस निर्णय को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई। वह बल राज्य भर में इसे लागू करने के लिए हरकत में आ गया।

प्रोफेसर ने आगे कहा, “एक प्रमुख उदाहरण मेरा मामला था। शारीरिक उत्पीड़न, जान से मारने की धमकी, जमानत के लिए जाना, पुलिस को बुलाना और मुझे गिरफ्तार करना, थाने के हवालात में रात भर रहने की व्यवस्था करना, अलीपुर क्रिमिनल कोर्ट में आपराधिक मामले दर्ज करना, चार्जशीट, अतिरिक्त उत्पीड़न, तारीख दर तारीख और क्या नहीं। इस तरह मेरे 11 साल पूरे हो गए! अंतत: जिला अदालत के हस्तक्षेप से आपराधिक मामले में दोषमुक्त हुआ। यह सरकारी षड़यंत्र के खिलाफ सीधी लड़ाई में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई की जीत है।”

वर्षों से इस मुद्दे पर टीएमसी पर निशाना साधने वाले विपक्ष ने महापात्रा की रिहाई के बाद टीएमसी पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ा है।

माकपा नेता सुजान चक्रवर्ती ने कहा, “तृणमूल सरकार लोकतंत्र में विश्वास नहीं करती है। वे चाहते हैं कि लोग सिर झुकाकर चलें। टीएमसी मानवाधिकारों में विश्वास नहीं करती है।”


बीजेपी नेता राहुल सिन्हा ने सीएम से माफी मांगने की मांग करते हुए कहा, ‘मेरा मानना है कि यह लोकतंत्र की जीत है। ममता बनर्जी को जनता से माफी मांगनी चाहिए।’

हालांकि, टीएमसी ने दावा किया है कि मामला कानूनी रूप से लड़ा गया था और कहा कि पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

“हम अच्छी तरह जानते हैं कि उनके राजनीतिक जुड़ाव हैं और उन्होंने चुनाव भी लड़ा है। सरकार का इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी न्याय व्यवस्था कितनी धीमी है। अगर आपको बोलने की आजादी है तो क्या इसका मतलब आप किसी का भी कार्टून बना सकते हैं?”

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