Friday, July 1, 2022

सीपी कमेंट्री: प्रेस क्लब ऑफ इंडिया चुनाव के मायने

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लोकतंत्र की गारंटी के रूप में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव जरुरी है चाहे वे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के चुनाव हों या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के गृह-राज्य गुजरात के और कुछ अन्य राज्यों के इसी बरस हो रहे चुनाव हों अथवा फिर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (नई दिल्ली) के 21 मई को निर्धारित वार्षिक चुनाव क्यों न हों। दुर्भाग्य से भारत भर में सत्ताधारी वर्ग द्वारा एक धारणा बना दी गई है कि प्रेस क्लब,दारुबाज पत्रकारों के अड्डे हैं। ये धारणा बिल्कुल ही गलत है। सत्य यह है कि प्रेस क्लब लोकतंत्र की हिफाजत करने के लिए बनाई संस्था है। प्रेस क्लब ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर मौजूद 14 वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की सरकारों के लोकतांत्रिक कार्यों का समर्थन और अलोकतांत्रिक कदमों का विरोध किया है।

प्रेस क्लब के नेतृत्व में मार्च

भारत के संविधान में संलग्न राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के मुताबिक यह जन-कल्याणकारी देश है। इसके तहत सरकारें प्रेस को कमजोर तबका मान कर प्रेस क्लबों को मुफ़्त या कम कीमत पर जमीन या भवन आवंटित करती हैं और उनकी सेवाओं पर बिक्री, आबकारी आदि करों में छूट देती हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट में नवंबर 2013 में चीफ जस्टिस पी सतशिवम की बेंच के सम्मुख जस्टिस मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को चुनौती देने वाले अखबार मालिकों की याचिका का विरोध करते हुए तत्कालीन सॉलिसीटर जनरल मोहन परासरण ने दलील दी थी कि 1956 का वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट जनकल्याणकारी राज्य के कार्यों का एक आदर्श उदाहरण है।

जो बात उन्होंने नहीं कही वो ये है कि प्रेस क्लब के अधिकतर पत्रकार ही होते हैं। भारत के हर राज्य में प्रेस क्लब है। केरल जैसे राज्य में जिला स्तर पर भी प्रेस क्लब हैं जिन्हें वहां की सरकार ने भूखंड या भवन आवंटित किये हैं। उनकी आय का बड़ा हिस्सा उन भवनों में चलने वाले व्यावसायिक कार्यों से मिलता है। प्रेस कांफ्रेंस लगभग अनिवार्य रूप से प्रेस क्लबों में ही आयोजित किये जाते हैं जो उनके आयोजकों और पत्रकारों के लिए भी सुविधाजनक है। बिहार में शराबबंदी करने वाले मुख्यमंत्री नीतिश कुमार तक ने पटना में प्रेस क्लब भवन का उद्घाटन किया है। 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव सरकार ने लखनऊ में चाइना गेट पर यूपी प्रेस क्लब का पुनर्निर्माण कराया। चंडीगढ़ प्रेस क्लब का अपना स्वीमिंग पूल है। मुंबई प्रेस क्लब में हर शनिवार देशी-विदेशी किसी फिल्म का प्रदर्शन कर उस पर विचार-विमर्श किया जाता है।

प्रेस क्लब में सीपी झा, अनिल सिन्हा, राजेश कुमार समेत तमाम वरिष्ठ पत्रकार

इतिहास

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ब्रिटिश वास्तुकार सर एड्विन्स लैंडसीयर लूट्यन्स (1869 :1944) के शिल्प पर बसाये नई दिल्ली नगर के बीचों बीच संसद भवन और कृषि , रेल आदि केन्द्रीय मंत्रालयों के भवनों के पास 1 रायसीना रोड पर एक पुरानी कोठी में स्थित है। इसकी स्थापना का सुझाव 1930 के दशक में असोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया के, जो बाद में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया यानि पीटीआई बनी, के संपादक रहे दिग्गज पत्रकार दुर्गा दास ने लंदन प्रेस क्लब को देख कर दिया था।

दुर्गा दास के मेमायर्स के मुताबिक 20 दिसंबर 1957 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की स्थापना हुई और उसका एक कंपनी के रूप में 10 मार्च 1958 को पंजीकरण हुआ। उनके प्रयासों की ही बदौलत भारत में ब्रिटिश हुकमरानी के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने इसके लिए 1 राय सीना रोड का बंगला आवंटित किया। किन्हीं कारणों से यह आवंटन रद्द कर दिया गया। लेकिन बाद में मौजूदा स्थल पर ही 2 फरवरी 1959 को तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का उद्घाटन किया। तब हिंदुस्तान टाइम्स के संपादकदुर्गा दास इसके पहले अध्यक्ष और दिग्गज पत्रकार डीआर मानकेकर पहले सेक्रेटरी जनरल बनेतब इसके सिर्फ 30 सदस्य थेपिछले बरस के चुनाव के चीफ इलेक्शन कमिश्नर यानि सीईसी एमएमसी शर्मा के दस्तखत से इस स्तंभकार को जारी वोटर्स लिस्ट के मुताबिक तब इसके कुल 9130 सदस्य थे। इस बार के भी सीईसी एमएमसी शर्मा ही हैंक्लब की सदस्यता के लिए पत्रकारों की ऑर्डिनेरी और अन्य के लिए असोसिएट 1 और असोसिएट 2 के अलावा कॉर्पोरेट केटेगरी भी है।

दिवंगत कवि, लेखक और संपादक रघुवीर सहाय ने 28 अप्रैल 1990 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (नई दिल्ली) में  ‘सत्ता और पत्रकारिता ‘ विषय पर दिल्ली यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ( डीयूडब्ल्यूजे) की संगोष्ठी में कहा था कि नागरिक अपना-अपना अधिकार किसी भी पत्रकार को उनके प्रतिनिधि के रूप में इसलिए सौंपते हैं कि वह सरकार के रूप में उन अधिकारों की रक्षा करे और नागरिकों के प्रति जवाबदेह रहे। पत्रकार उन नागरिकों के प्रतिरूप हैं जिनके प्रति सरकार जवाबदेह है। परंतु पत्रकार यह नहीं कह सकते कि नागरिक,सरकार से, जिसे उन्होंने अपने अधिकार सौंप कर अस्तित्व प्रदान किया है बिना पत्रकार नामक बिचौलिये के जवाब तलब नहीं करेंगे। इसी संगोष्ठी में नवभारत टाइम्स के संपादक रहे दिवंगत राजेन्द्र माथुर ने कहा था कि आजकल संपादक से आशा की जाती है कि वह हर दिन राजा को शाप दे कि ‘ तू आदमी से चूहा हो जा, तू चूहे से गिरगिट हो जा, क्योंकि हिन्दुस्तानी मध्यवर्ग को राज्यहंता होने में बड़ा सुख मिलता है “।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के 2021 के पिछले वार्षिक चुनाव में इसके प्रेसिडेंट पद पर वरीय पत्रकार आनंद के सहाय की जगह उमाकांत लखेड़ा निर्वाचित हुए थे। आनंद के सहाय ने युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने के लिए खुद चुनाव नहीं लड़ा था। लखेड़ा जी ने एशियन एज के संजय बसाक को करीब एक सौ वोटों के अंतर से हराया था। 2022 के चुनाव मैदान में इस पद के लिए उमाकांत लखेड़ा फिर उतरे हैं। इस बार के चुनाव मैदान में नई प्रबंधन कमेटी के प्रेसिडेंट समेत 21 पदों के लिए चार पैनल हैं। कुल मिलाकर एक सौ से अधिक उम्मीदवार हैं। कुछेक ऐसे भी हैं जो एक साथ कई पदों के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। उमाकांत लखेड़ा के विरुद्ध पैनलों में से एक के अगुआ फिर संजय बसाक ही हैं।  

पिछले बरस के चुनाव परिणाम
अध्यक्ष : संजय बसाक 632 वोट उमाकांत लखेडा 729 वोट
उपाध्यक्ष : पल्लवी घोष 655 वोट शाहिद के. अब्बास 668 वोट

सेक्रेटरी जनरल : राहिल चोपड़ा 132 वोट, संतोष के. ठाकुर 576 वोट, विनय कुमार 635 वोट

ज्वाइंट सेक्रेटरी : अंजलि भाटिया 226 वोट, चंद्रशेखर लूथरा 578 वोट, मानस प्रतिम गोहेन 470 वोट
कोषाध्यक्ष : ज्योतिका ग्रोवर हल्लान 629 वोट, सुधिरंजन सेन 649 वोट

कार्यकारिणी के निर्वाचित 16 सदस्य
1. ए.यू. आसिफ 2. अमृता मधुकाल्या , 3. अनिन्द्य चट्टोपाध्याय , 4. अंजलि ओझा , 5. अतुल कुमार मिश्रा, 6. वसंत पी., 7. कल्याण बरुआ, 8. मृगांक प्रभाकर , 9. पूनम अग्रवाल , 10. प्रवीण जैन , 11. राकेश नेगी , 12. संजय चौधरी, 13. श्रीपर्णा चक्रवर्ती ,14. स्वाति माथुर ,15. वाल्सा विलियम्स, 16. विजय शंकर चतुर्वेदी

उपरोक्त संगोष्ठी को अभी नेशनल हेरल्ड की संपादक मृणाल पांडे ने भी संबोधित कर कहा था कि ‘ एक कुमायूनी मुहावरा के संदर्भ में सत्ता और पत्रकारिता का रिश्ता यूं है कि उसके साथ चल भी नहीं सकती और उसके बगैर रह भी नहीं सकती”।

जनसत्ता के संपादक रहे दिवंगत प्रभाष जोशी ने कहा था कि “सत्ता और पत्रकारिता के चरित्र में आपसी संघर्ष अंतर्निहित है। पर यह संघर्ष तभी संभव है जब प्रेस ,सत्ता के निकट भी हो और दूरी भी बनाए रखे। राजसत्ता चाहे दमनकारी हो या उदार वह स्वतंत्र प्रेस को केवल बर्दाश्त करती है। सत्ता के साथ पत्रकारों का संघर्ष जितना सांस्थानिक है उतना ही व्यक्तिगत है। इसलिए उसे सत्ता की बैसाखी से बचना चाहिए “।

प्रेस क्लब के निवर्तमान अध्यक्ष उमाकांत लखेड़ा जो मौजूदा चुनाव में भी अध्यक्ष पद के प्रत्याशी हैं

भविष्य

तक्षक पोस्ट की संपादक श्वेता आर रश्मि ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के इस बार के चुनाव में विभिन्न पैनलों द्वारा अपने प्रचार के लिए भारी धन खर्च कर पीआर एजेंसियों के किये गए इस्तेमाल की भर्त्सना कर कहा है कि पत्रकारों को सियासी नेताओं के तौर तरीके अपनाने से बचना चाहिए। उन्होंने तो नहीं कहा पर कई सदस्यों ने इस स्तंभकार को बताया कि उनके मोबाइल फोन पर दिन भर अनगिनत सचित्र व्हाट्सअप संदेश आते रहते हैं। एक ही प्रत्याशी के कई व्हाट्सअप संदेश आते रहते हैं। सवाल है कि प्रेस क्लब सदस्यों की निजता का घोर उल्लंघन करके उनके मोबाइल फोन नंबर और ईमेल आईडी इन वेंडरों को किसने कैसे दिए? यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई) के विशेष संवाददाता रहे राजेश वर्मा का कहना है कि प्रेस क्लब चुनाव में आईटी वेंडरों के इस्तेमाल पर रोक लगाना लगभग असंभव है। लेकिन प्रेस क्लब चुनाव आयोग इस तरह की हरकतों के लिए विभिन्न पैनल और निर्गुट उम्मीदवारों से कैफियत तलब तो कर ही सकता है। क्योंकि प्रेस क्लब चुनाव में शराब बहे या ना बहे पैसा तो बह ही रहा है। ये दुखद स्थिति है।

(सीपी नाम से चर्चित पत्रकार,यूनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से दिसंबर 2017 में रिटायर होने के बाद बिहार के अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं। इन दिनों वह दिल्ली में हैं।)

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