Sunday, October 24, 2021

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पंजाब में शाही कैप्टन हटा दलित मुख्यमंत्री बनाने के चुनावी मायने

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पंजाब में कांग्रेस विधायक दल के नवनिर्वाचित नेता सरदार चरणजीत सिंह चन्नी ने 20 सितंबर 2021 को चंडीगढ़ में राजभवन में पूर्वाहन 11 बजे राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पंजाब कांग्रेस प्रभारी हरीश रावत और अन्य की उपस्थिति में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो इस पाकिस्तान से लगे करीब साढ़े 3 करोड़ की आबादी के इस सीमांत कृषि–प्रधान सूबा ही नहीं भारत भर की सियासत में नया चुनावी अध्याय शुरू हो गया। उनके साथ सुखजिंदर सिंह रंधावा और ओम प्रकाश सोनी ने भी मंत्री पद और गोपनीयता की शपथ ली। चन्नी सिख समुदाय में अभी भी बरकरार जाति व्यवस्था के तहत अनुसूचित जाति के हैं। यानि वे दलित हैं। वह 1966 में भारत के राज्यों के पुनर्गठन के बाद से पंजाब के सर्वप्रथम और अभी देश भर के इकलौते दलित मुख्यमंत्री हैं। रंधावा जट सिख और सोनी हिंदू समुदाय के हैं। सियासी हल्कों में दोनों को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है।  

चन्नी जी के मुख्यमंत्री बन जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी समेत कई सियासी पार्टियों के नेताओं ने बधाई दी। मोदी जी ने फौरन अपने ट्वीट में लिखा कि वह राज्य की नई सरकार से मिलकर पंजाब की बेहतरी के लिए काम करते रहेंगे। राहुल गांधी ने फेसबुक पर अपने एक पोस्ट में लिखा :” पंजाब के नए मुख्यमंत्री श्री चरणजीत सिंह चन्नी जी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुआ। हम आज भी जनता की प्रगति के लिए प्रतिबद्ध हैं और आगे भी रहेंगे। ये नयी शुरुआत पंजाब को मुबारक हो !

“आम आदमी पार्टी के पंजाब अध्यक्ष और लोक सभा सदस्य भगवंत मान ने अपने ट्वीट में पंजाबी में एक लाइन लिखकर चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनने पर बधाई दी।

विधि एवं प्रबंधन शिक्षा में स्नातक और अब पीएचडी भी कर रहे 48 वर्षीय चन्नी ने शपथ ग्रहण के बाद मुख्यमंत्री पद की बागडोर संभालने के फौरन बाद मीडिया से बातचीत में ‘ एक आम आदमी ‘ को सीएम बनाने के लिए कांग्रेस ‘आलाकमान‘ का धन्यवाद दिया। उन्होंने तनिक भावुक स्वर मेँ कहा: मैं आम आदमी हूं। यहाँ बैठा हूँ । किसानों पर आंच आई तो गर्दन पेश कर दूंगा’।  

राहुल गांधी ने दिल्ली में अपनी माँ और कांग्रेस की मौजूदा अध्यक्ष सोनिया गांधी, बड़ी बहन और उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री के लिए पार्टी की घोषित दावेदार प्रियंका गांधी वढेरा समेत कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ गहरी मंत्रणा के बाद नए सीएम के रूप में चन्नी के नाम पर मुहर लगाई। कहते हैं कांग्रेस के पंजाब अध्यक्ष और भारतीय क्रिकेट टीम के सलामी बल्लेबाज रहे नवजोत सिंह सिद्धू ने भी चन्नी के नाम पर सहमति दे दी थी।

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच रविवार को नए सीएम के लिए कई नाम पर चर्चा हुई। अंततः चन्नी को ही का नया नेता घोषित कर दिया गया। पार्टी विधायक दल के सदस्य विधायकों ने चंडीगढ़ में सात सितारा जेडबल्यू मैरियट होटल में कांग्रेस राज्य प्रभारी हरीश रावत की उपस्थिति में हुई बैठक में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को नया सीएम चुनने के लिए विधिवत अधिकृत कर दिया गया।

बैठक में कांग्रेस के कुल 80 में से 78 विधायक मौजूद थे। कैप्टन अमरिंदर सिंह और एक अन्य विधायक इस बैठक में नहीं आए।  

इस प्रस्ताव के मिल जाने पर सोनिया गांधी दिल्ली की भीषण गर्मी से निजात पाने, राहुल को मामला संभालने की जिम्मेवारी सौंप हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला पहुंच गईं जहां प्रियंका पहले से मौजूद हैं। प्रियंका का हिमाचल में अपना एक बसेरा है। ऐसे में पंजाब की सियासी बिसात की बाजी पर मोहरों की चाल और उन्हें बदलने का फैसला राहुल के ही हाथ में आ गया। इसलिए वह खुद चन्नी के शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित भी हुए। खबर है कि शपथ ग्रहण समारोह के बाद राहुल भी अपनी माँ और बहन के पास शिमला पहुँच गए हैं।

पंजाब ही नहीं यूपी का भी चुनावी गणित और रसायन है

सियासी और मीडिया हल्कों में सवाल दर सवाल उठे कि कांग्रेस ने कैप्टन को क्यों हटाया, जिन्होंने पिछले विधान सभा चुनाव में पार्टी को बड़ी जीत दिलाई और उसके बाद स्थानीय नगर निकायों के भी चुनाव में कांग्रेस का परचम लहराए रखा? ये भी सवाल उठे कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (आप) से कांग्रेस में आए नवजोत सिंह सिद्धू को ही नया सीएम क्यों नहीं बनाया गया, जो राहुल गांधी की पसंद हैं और कैप्टन अमरिंदर सिंह के सार्वजनिक तौर पर व्यक्त नानुकुर के बावजूद हाल में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किये गए हैं? ये सवाल खूब उठे कि क्या पहले भी कांग्रेस अध्यक्ष रहे राहुल गांधी अब फिर अपनी वृद्ध माँ की जगह पार्टी की कमान संभाल सकते हैं?

उल्लेख किया गया कि पंजाब के पूर्ववर्ती पटियाला राजघराना के वारिस और भारतीय सेना में कैप्टन रहे ये वही राजनेता हैं जिन्होंने 2014 के लोक सभा चुनाव में अमृतसर की अहम सीट पर मोदी जी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शीर्षस्थ नेताओं में शामिल एवं केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली (अब दिवंगत) को चारों खाने चित्त कर दिया था।   

कुछ स्वनामधन्य मीडिया मठाधीशों ने हास्यास्पद रूप से ये सवाल उठाया कि जाति व्यवस्था को नकार देने वाले सिख धार्मिक समुदाय के बीच से कांग्रेस द्वारा अनुसूचित जाति के चन्नी जी को सीएम बनाए जाने का बखान करने का औचित्य क्या है? जाहिर है इन स्वयंभू विद्वानों को भारत में सामाजिक संस्तरण की रत्ती भर जानकारी नहीं हैं। होती तो वे नहीं भूलते कि राजीव गांधी सरकार में केन्द्रीय गृह मंत्री रहे बूटा सिँह (अब दिवंगत) सिख समुदाय के ही थे और अनुसूचित जाति के थे।

इन मीडिया मठाधीशों को डेविड मेंडलबाम की लिखी समाजशास्त्र के उस क्लासिक टेक्स्ट बुक सोसायटी इन इंडिया के 700 से अधिक पन्ने में से कम से कम कुछ तो पलटने चाहिए जिसमें साफ है पंजाब में सिख धार्मिक समुदाय के लोग बहुसंख्यक होने और उनके केश काटने की मनाही होने के बावजूद नाई जातिगत पेशा के पुरुष और महिला की भी समाज में शिशु के जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु उपरांत भी जरूरत पड़ती है।

ये सच है कि सिखों में बुनियादी तौर पर जात-पात, अगड़ा-पिछड़ा, अवर्ण -सवर्ण नहीं होता। पर जब से देश की सियासत जातीय चक्कर में पड़ी है इसका वायरस पंजाब में भी पसरा है। फिर भी पंजाब हिंदी भाषी राज्यों की तरह के जातिवादी जहर से काफी हद तक बचा हुआ है।  

दलित सीएम लिस्ट

वरीय पत्रकार शीतल पी सिंह ने फेसबुक पर एक लिस्ट पोस्ट की है जिसके मुताबिक भारत की आजादी के बाद 1947 से चन्नी जी को मिलाकर केवल नौ दलित मुख्यमंत्री रहे हैं इनमें डी संजीवैया (आंध्र प्रदेश, 1960 ,कांग्रेस ), कर्पूरी ठाकुर ( बिहार ,1970, सोशलिस्ट पार्टी ), भोला पासवान शास्त्री (बिहार,1978,कांग्रेस) रामसुंदर दास (बिहार ,1979 ,जनता दल ) जगन्नाथ पहाड़िया (राजस्थान ,1980 ,कांग्रेस ), मायावती (उत्तर प्रदेश, जून 1995 से चार बार,बसपा) ,सुशील कुमार शिंदे ( महाराष्ट्र , 2003, कांग्रेस ), जीतन राम मांझी (बिहार, 2014 , जनता दल यूनाइटेड), (चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब , 2021, कांग्रेस )। इनमें से कर्पूरी ठाकुर को बिहार में दलित नहीं बल्कि अति पिछड़े वर्ग की जातियों में से नाई जाति का माना जाता है। 

राहुल गांधी का बहुराज्यीय दलित कार्ड

दरअसल, कांग्रेस ने चन्नी को सीएम बनाकर उत्तर प्रदेश के दलितों को भी रिझाने की कोशिश की है ,जहां पंजाब, गुजरात और कुछ अन्य राज्यों के साथ ही 2022 के प्रारम्भ में विधान सभा के चुनाव निर्धारित हैं। गुजरात में चुनावी तकाजों के कारण भाजपा ने सीएम की कुर्सी से विजय रुपानी को हटा कर पाटीदार, भूपेन्द्र पटेल को बिठा दिया।

चन्नी दलित सिख (रामदसिया सिख) समुदाय के हैं और अमरिंदर सरकार में तकनीकी शिक्षा मंत्री थे। वह रूपनगर जिले के चमकौर साहिब विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। वह इस क्षेत्र से 2007 में पहली बार विधायक बने और इसके बाद से लगातार जीतते रहे हैं। वह विधान सभा में विपक्ष के नेता भी रह चुके हैं।

दलित नेता चन्नी को सीएम पद देकर राहुल ने पंजाब की धरती से यूपी, राजस्थान और दूसरे राज्यों के लोगों को भी सियासी राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। ये राहुल गांधी का बहुराज्यीय दलित कार्ड है। गोवा की 40 सीट की मौजूदा विधान सभा 16 मार्च 2017 को गठित हुई थी। उसका कार्यकाल 15 मार्च को खत्म होगा। अन्य विधान सभाओं में से 60 सीटों की मणिपुर का 19 मार्च को ,70 सीट के उत्तराखंड का 23 मार्च को और 403 सीट के उत्तर प्रदेश विधान सभा का कार्यकाल 14 मई तक है।

चन्नी पर आरोप

राष्ट्रीय महिला आयोग की भाजपा समर्थक अध्यक्ष श्रीमती रेखा शर्मा ने चन्‍नी जी को सीएम पद से हटाने की मांग कर बयान दिया है कि वह मुख्यमंत्री बनने लायक नहीं हैं और उन पर 2018 में चर्चित ‘ मी- टू ‘ के दौर में यौन कदाचार के आरोप लगे थे। वो भूल गईं कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांत के अनुसार जब तक किसी पर लगा आरोप अदालत में सिद्ध नहीं हो जाता उसे निर्दोष ही माना जाता है।

भाजपा की चुनावी हैसियत

करीब एक बरस से जारी किसान आंदोलन को हल्के में लेने के कारण भाजपा को रावी, सतलुज आदि अनेक बड़ी नदियों के इस सूबा में 2022 में निर्धारित विधान सभा चुनाव में कोई पानी देने वाला भी शायद ही मिले। कुल 117 सीट की विधान सभा का मौजूदा कार्यकाल 27 मार्च 2022 को समाप्त हो रहा है। उसके पहले ही नई विधान सभा के चुनाव कराने होंगे। ऐसे में मोदी जी की पार्टी पंजाब में राम भरोसे भी नहीं लगती है।

पंजाब के हालिया स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त जीत के बाद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर ने मोदी सरकार को आगाह किया था कि वह किसान आंदोलन को हल्के से न लें। उन्होंने निकाय चुनाव के परिणाम घोषित होने के उपरांत इसी बरस 17 फरवरी 2021 को ट्वीट किया: किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ देशभर के सभी आयु-वर्ग के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। फिर से केन्द्र से अपील करता हूं, वो इस आंदोलन को हल्के में ना ले और अपने बनाए नए कृषि कानूनों को वापस ले।

कांग्रेस ने छह नगर निगमों: बठिंडा, बटाला, अबोहर, होशियारपुर , कपूरथला और पठानकोट में भारी जीत हासिल की। वह मोगा नगर निगम चुनाव में भी सबसे बड़ी पार्टी साबित हुई। कांग्रेस को मोगा में बहुमत से सिर्फ छह सीट की कमी पड़ी। शहरी निकाय चुनावों में विपक्षी दलों का सूपड़ा साफ हो गया।

ये चुनाव मोदी सरकार द्वारा संसद में और खास कर राज्यसभा में तिकड़म से पारित कराये तीन कृषि कानूनों के खिलाफ 25 सितंबर, 2020 से दिल्ली के बॉर्डर पर जारी जबरदस्त किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में हुए थे। राज्य में नगर निगमों के साथ ही 109 नगर परिषदों के भी चुनाव हुए थे। इनमें कांग्रेस का ही बोलबाला रहा। किसान आंदोलन में शामिल अधिकतर पंजाब एवं हरियाणा से हैं।

दिवंगत पूर्व लोक सभा स्पीकर बलराम जाखड़ के पुत्र एवं पंजाब प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने कहा था पंजाबियों ने मोदी जी भाजपा और पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की ‘ शिरोमणि अकाली दल ‘ (शिअद) की ही नहीं बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी ‘(आप) की भी सियासत को खारिज कर दिया।

पंजाब नगर निगमों और नगर परिषदों के चुनाव में कुल 9,222 उम्मीदवार थे। इनमें सबसे ज्यादा 2,037 उम्मीदवार कांग्रेस के ही थे। शिअद ने 1,569 , भाजपा ने 1,003, आआपा ने 1,606 और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 160 उम्मीदवार चुनावी मुकाबले में उतारे थे. कुल 2,832 निर्दलीय उम्मीदवार भी थे। मोगा में किसी भी राजनीतिक दल को बहुमत नहीं मिला। कांग्रेस इस निगम के 50 वार्डों में से 20 में जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी। शिअद चार वार्डों में ही जीत सकी। भाजपा की झोली में सिर्फ एक सीट आई। वहाँ दस निर्दलीय उम्मीदवार जीते। स्थानीय निकाय चुनाव के लिए परंपरागत बैलेट से 14 फरवरी को कराये गए मतदान में पंजीकृत वोटरों में से 70 प्रतिशत से कुछ अधिक ने वोट दिए थे।

पंजाब दा कैप्टन

कैप्टन ने पिछले चुनाव में घर-घर जाकर रोज़गार देने का वादा किया था। उनका दावा है कांग्रेस सरकार ने राज्य में 17.60 लाख युवाओं को रोज़गार दिया और एक लाख अन्य नौजवानों को नौकरी देने की योजना  पर काम चल रहा है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने शनिवार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफ़े से पहले पंजाब कांग्रेस विधायक दल की बैठक होनी तय थी। उस बैठक में अमरिंदर सिंह ने भाग नहीं लिया।

अरविन्द केजरीवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने इस चुनाव में अपनी आम आदमी पार्टी (आप) की तैयारी तेज करने कुछ माह पहले पंजाब का दौरा कर कहा था कि आप की सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री सिख समुदाय का ही बनेगा और लोगों को दिल्ली के मॉडल पर 300 यूनिट बिजली मुफ्त दी जाएगी। उनका कहना था राज्य में अतिरिक्त बिजली उत्पादन के बावजूद लंबे समय तक बिजली कटौती की जाती है और लोगों को खेती के लिए बिजली नहीं मिलती है। बिजली उत्पादक राज्य होने के बावजूद पंजाब में बिजली देश में सबसे महंगी है। हम दिल्ली में बिजली का उत्पादन नहीं करते हैं। हम इसे दूसरे राज्यों से खरीदते हैं और इसके बावजूद दिल्ली में सबसे सस्ती दर पर बिजली आपूर्ति की जा रही है।

शिरोमणि अकाली दल (बादल)

पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की पार्टी शिअद ने पिछले बरस शिअद ने कृषि कानूनों के ही विरोध में भाजपा के नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) से रिश्ता तोड़ने के साथ ही मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हरसिमरत कौर बादल को हटा लिया था। वह बादल सीनियर के सुपुत्र सुखबीर सिंह बादल की पत्नी हैं। दोनों सियासी दल निकाय चुनाव में अलग-अलग लड़े थे। अकाली दल ने विधान सभा चुनाव में बसपा से गठबंधन करने की घोषणा की है।

वोटिंग

नई विधान सभा चुनाव के लिए मतदान वोटर वेरिफाइड पेपर औडित ट्रोल (वीवीपीएटी) की अलग मशीन से जुड़ी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से ही कराये जाएंगे।

बहरहाल, देखना यह है कि निर्वाचन आयोग पंजाब में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कब करता है और मोदी जी इस राज्य में कांग्रेस को जीतने से रोकने के क्या क्या जतन करते हैं। देखना ये भी है कि पंजाब में कांग्रेस के इस प्रयोग का उत्तर प्रदेश में कितना असर पड़ेगा और क्या भाजपा किसी भी राज्य में किसी दलित को मुख्यमंत्री का दावेदार घोषित करेगी।

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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