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कोरोनोत्तरकाल: क्या हम नए वर्ल्ड आर्डर के लिये तैयार हैं?

सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्तों तथा अन्य भत्तों पर जो कटौती केंद्र सरकार द्वारा की गयी है उसका कारण कोरोना जन्य आर्थिक संकट बताया जा रहा है। यह सच है कि, इस आर्थिक संकट का तात्कालिक कारण कोविड 19 अवश्य है, पर इस संकट की पृष्ठभूमि में 2016 से ही लिए जा रहे कुछ ऐसे आर्थिक निर्णय हैं, जिनसे न केवल देश की आर्थिक स्थिति लगातार गिरती चली गयी और अब जब यह कोरोना आपदा आयी तो हम इस संकट में इतनी बुरी तरह से फंस गए, कि अब कोई चारा ही नहीं शेष है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी, कई तरह के खर्चों में कटौती कर्मचारियों के वेतन से करने का निश्चय किया है और इस आशय का एक नोटिफिकेशन भी जारी किया है। अब इस कटौती से, किस कर्मचारी को कितना कम मिलेगा यह तो जब वेतन का हर कर्मचारी या विभाग आकलन करे तभी जाना जा सकेगा। लॉक डाउन में इस पर कुछ लोग जोड़ घटाना कर भी रहे होंगे। निश्चित ही, इस तरह के निर्णय और नोटिफिकेशन अन्य राज्य सरकारों ने भी जारी किया होगा।

क्योंकि लम्बे समय से राज्यों को जीएसटी में केंद्र से उनका हिस्सा जो करों में मिलता है वह नहीं मिल पाया है। भत्तों की ऐसी कटौतियों से,  निजी क्षेत्रों के असंगठित वर्ग के कर्मचारियों की वेतन कटौती और उनकी छंटनी का खतरा बढ़ जाएगा। इससे बेरोजगारी जो पहले से ही चिंताजनक स्थिति में है और अधिक विकराल रूप धारण कर लेगी। ऐसी स्थिति में सरकार कुछ नहीं कर पायेगी क्योंकि वह तो खुद ही खर्चा बचाने के नाम पर अपने स्टाफ के वेतन से कटौती का रास्ता अख्तियार कर चुकी है।

आखिर कोरोना आपदा से निपटने के लिये सरकार की योजनाएं क्या हैं ? यह कोरोना के विरुद्ध एक युद्ध है। यह इस सदी का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य बन सकता है। और यह युद्ध है भी। हर युद्ध मे जनता और सरकार की सक्रिय भूमिका होती है। इस युद्ध में भी है। सरकार की जनता यानी हमसे क्या अपेक्षाएं हैं ?

सरकार की अपेक्षाएं हमसे यह हैं कि,

● हम घरों में ही रहें।

● सोशल डिस्टेंसिंग या फिजिकल डिस्टेंसिंग का पालन करें।

● व्यक्तिगत साफ सफाई का ध्यान रखें

● कोविड 19 के लक्षण मिलते ही मेडिकल स्टाफ को सूचित करें और उनकी सलाह मानें।

● कोरोना संदिग्ध व्यक्तियों के बारे में सरकार द्वारा दिये गए हेल्पलाइन नम्बर पर संबंधित अधिकारियों को सूचना दें।

● पुलिस, मेडिकल स्टाफ तथा अन्य आवश्यक सेवाओं में लगे सरकारी कर्मचारियों का सहयोग करें और उनके साथ अभद्रता न करें।

जनता यह सब कर भी रही है। पर सब लोग स्वभावतः विधि पालक होते भी नहीं हैं तो कुछ कानून का उल्लंघन करने वाले सरकार के इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं बल्कि उल्लंघन कर समस्या भी उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसे लोगों से निपटने के लिए सरकार के पास पर्याप्त अधिकार और शक्तियां भी हैं और अगर शक्तिहीनता की स्थिति सरकार समझती है तो वह नए कानून बना कर और शक्तियां ले भी सकती है, जैसा सरकार ने अभी डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ को कुछ असामाजिक तत्वों के हमले और हिंसा से निपटने के लिये कानूनी संरक्षण भी दिया है।

अब कुछ और समस्याओं पर दृष्टिपात करते हैं,

● सरकार ने कहा है कि उद्योगपति लॉक डाउन के अवधि का वेतन न काटें और न ही नौकरी से किसी को निकालें ?

● यह भी कहा है कि निजी स्कूल तीन महीने की एकमुश्त फीस के लिये अभिभावकों पर कोई दबाव न डालें।

लेकिन वेतन काटने और नौकरियों से निकालने की भी खबरें आ रही हैं और स्कूलों से भी फीस के तगादे अभिभावकों को मिल रहे हैं। सरकार के पास ऐसी समस्याओं से निपटने के लिये क्या कोई योजना या पर्याप्त इच्छाशक्ति भी है या यह सब एक पब्लिसिटी स्टंट है केवल ?

30 जनवरी को पहला केस मिलने के बाद से अब तक लगभग ढाई महीने बीत चुके हैं, और आज तक टेस्ट किट, पीपीई की व्यवस्था तक नहीं हो सकी तो यह मान के चलिए कि सरकार की नाक के नीचे न केवल नौकरियां ही लोगों की जाएंगी बल्कि उन्हें स्कूलों से भी कोई राहत नहीं मिलने वाली है। सरकार को यह बताना चाहिए कि लोगों की नौकरियां सुरक्षित रहें, औऱ उसने जो वादे किये हैं, उनकी पूर्ति के लिये क्या वह क्या कदम उठा रही है। उद्योगों और निजी स्कूलों की अपनी समस्याएं हैं। वे उचित होंगी भी। पर सरकार ने भी तो कोई वादा सोच समझ कर और किसी योजना के आलोक में ही किया होगा या यूं ही यह सब जुमले ही हैं ?

2014 के बाद, जब यह सरकार आयी थी तो बेशुमार उम्मीदें भी लेकर आयी थी। हम सब पर गुजरात मॉडल का नशा तारी था। लगा कि गुजरात की तकदीर बदल देने वाले प्रधानमंत्री देश को भी गुजरात की राह पर सरपट दौड़ा देंगे। पर कोरोना आपदा ने तो गुजरात मॉडल की वास्तविकता को ही उजागर कर दिया। दूर के ढोल सुहावने ज़रूर लगते हैं, पर वे होते हैं, ढोल ही। शोर करते हुए अंदर से खोखले।

सरकार ने 2014 के बाद, मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया आदि मोहक नामों वाली कितनी ही योजनाएं, भव्यता के साथ प्रारंभ कीं, पर आज तक न तो सरकार यह बता पाई कि इन महान और कर्ण प्रिय नामधारी योजनाओं के अंतर्गत देश मे कौन सी औद्योगिक प्रगति हुई, किन क्षेत्रों में हम आत्मनिर्भर हुए और न ही सरकार समर्थक मित्रों को यह साहस हुआ कि वे अपनी ही सरकार से यह असहज सवाल कर सकें।

हम जैसे लोग जिन्हें सरकार की नीति, नीयत और नियति पर प्रारंभ से ही अविश्वास रहा है, यह सवाल, यह जानते हुए भी कि सरकार द्वारा इसका उत्तर मुश्किल से ही मिलेगा, ज़रूर उठाते रहे हैं। और सरकार ने भी, कभी उन सवालों का उत्तर नहीं दिया है। सरकार की तरफ से सत्तारूढ़ दल का आईटी सेल और साइबर लफंगे ज़रूर इन सवालों के पूछने को हतोत्साहित करते रहे और उनका यह कार्य आज भी बदस्तूर जारी है। इसके अतिरिक्त सरकार से ऐसा सवाल पूछने वाले लोग, देश विरोधी, धर्म द्रोही तक माने जाने लगे।

पर आज जब देश के समस्त केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते और अन्य भत्तों को निर्ममता पूर्वक काट लेने की घोषणा कर दी गयी है तो सरकारी कर्मचारियों में एक असंतोष भी दिख रहा है। सेना के एक अवकाश प्राप्त मेजर ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर की है। कटौती का यह सिलसिला, केवल केंद्र सरकार के कर्मचारियों तक ही नहीं रहेगा, बल्कि यह राज्य सरकारों तक भी पहुंचेगा और फिर निजी कंपनियां तथा कॉरपोरेट भी इसी राह पर चल पड़ेंगे।

इसके परिणामस्वरूप समस्त नौकरीपेशा लोगों में असंतोष तो होगा ही साथ ही इसका विपरीत असर बाजार के मांग और पूर्ति के संतुलन पर भी पड़ेगा, जो नोटबन्दी के निर्णय के बाद से ही असंतुलित बना हुआ है और जो आर्थिक मंदी का एक बड़ा कारण भी है। सरकार अपने अनुपयोगी खर्चों में कटौती कर के, अनुपयोगी प्रोजेक्ट्स को कुछ समय के लिये स्थगित कर के इस कमी को पूरा करने की योजना पर विचार कर सकती है। सरकार, वित्तीय कुप्रबंधन की शुरू से ही शिकार रही है। सरकार के एजेंडे में जन नहीं बल्कि उद्योगपति और वे भी कुछ चुने हुए औद्योगिक घराने ही रहते हैं।

उनका मोह अब सरकार छोड़ भी नहीं सकती है। 2016 की नोटबन्दी के बाद से जो आर्थिक सूचकांक, चाहे वह आयात-निर्यात से सम्बंधित हों, या मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के, या डॉलर रुपये के विनिमय दर के, या जीडीपी के प्रतिशत के, या सरकार को मिलने वाले राजस्व के, हर क्षेत्र में लगातार गिरावट दर्ज होती गयी और यह सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। कोरोना आपदा न भी आती तो भी हमारी आर्थिक स्थिति दयनीय ही रहती और अब तो कोढ़ में खाज की तरह की स्थिति हो गई है।

प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि कोरोना के बाद एक नया वर्ल्ड आर्डर बनेगा। यह कोई नयी बात नहीं है। हर बड़ी घटना चाहे वह क्रांति हो या त्रासदी, उसके गर्भ में एक नए वर्ल्ड आर्डर का बीज अंकुरित हो ही जाता है। फ्रेंच क्रांति, औद्योगिक क्रांति, प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युध्द के बाद नए वर्ल्ड आर्डर बने हैं। दुनिया का स्वरूप बदला है। नये आर्थिक मॉडल का जन्म हुआ है। सामाजिक संरचनाओं में परिवर्तन हुआ है। राजनीतिक विचारधाराओं के स्वरूप नए हुए हैं। यही नहीं साहित्य, ललित कलाओं और जीवन शैली भी अप्रभावित नहीं रही है। कोरोना के बाद भी एक वैश्विक परिवर्तन अवश्यम्भावी है। यह काल चक्र है जो समय-समय पर अपनी गति और घूर्णन बदलता रहता है।

पर उसका स्वरूप क्या होगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता है। मनुष्य तो अभी अपने जीवन रक्षा के लिये जूझ रहा है। सब फिलहाल अस्पष्ट है। लेकिन, इस नए वर्ल्ड आर्डर में 130 करोड़ की विशाल जनशक्ति, विविध प्राकृतिक और बहुलतावाद से भरे संसाधनों के साथ भारत की क्या स्थिति होगी, क्या इस आसन्न भूमिका पर कभी सरकार ने सोचा है? हो सकता है सरकार ने सोचा भी हो और कुछ कर भी रही हो। पर जनता को यह जानने का अधिकार है कि बदलते वर्ल्ड आर्डर में सरकार की क्या योजनाएं हैं औऱ जनता से उसकी क्या अपेक्षायें हैं।

कोरोना ने चीन की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों पर आघात पहुंचाया है। चीन ही नहीं पूरा यूरोप तबाही के दौर से गुज़र रहा है। बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर वाले देश इस आपदा से जूझने में हांफ जा रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति के कुछ अजीबोगरीब बयान उनकी बौखलाहट को ही बता रहे हैं। वहां का पूंजीवादी समाज अपने वित्तीय घाटे से चिंतित है और वह इस लॉक डाउन को शिथिल करना चाहता है, पर वहाँ के डॉक्टरों और चिकित्सा वैज्ञानिकों की राय उनसे विपरीत है। वहां इस साल चुनाव भी है। इसकी भी चिंता अमेरिकी राष्ट्रपति को है। अमेरिका और जापान जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक ताकतों का यह मानना है कि यह आपदा प्रकृति जन्य नहीं बल्कि मानव जन्य है।

हालांकि इस आरोप के संबंध में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिले हैं अब तक, पर यह आशंका निर्मूल है यह भी अभी तक प्रमाणित नहीं हुआ है। हालांकि लैंसेट और नेचर जैसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक शोध पत्रिकाओं ने इस वायरस को प्रकृति जन्य ही बताया है। पर यह मुद्दा विश्व में एक बड़े आर्थिक वैमनस्य और प्रतिद्वन्द्विता को ही जन्म देगा। इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। जापान ने चीन से अपने कुछ महत्वपूर्ण उद्योगों को समेटने के निर्णय कर लिए हैं और यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है।

चीन से अन्य देशों के औद्योगिक इकाइयों के पलायन के समय यह उम्मीद बंधी थी कि वहां से निकल कर वे उद्योग भारत में आएंगे और भारत की औद्योगिक दशा सुधरेगी। अर्थ विशेषज्ञों का यह भी आकलन है कि अपने आकार और मानव संसाधन के बल पर भारत चीन को चुनौती दे सकता है और वह चीन के विपरीत औद्योगिक हब का एक नया विकल्प बन सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। हालांकि अभी संभावनाएं समाप्त नहीं हुई हैं, लेकिन जो प्रारंभिक रुझान, चीन से उद्योगों के पलायन के मिले हैं वे आशाजनक नहीं हैं। भाजपा के ही समर्थक शेषाद्रिचारी के एक ट्वीट से यह ज्ञात होता है कि चीन से पलायित होने वाली कम्पनियों ने भारत के प्रति उदासीनता दिखाई है। शेषाद्रि अंग्रेज़ी टीवी चैनलों पर बीजेपी के पक्षकार और वे संघ का एक बौद्धिक चेहरा भी हैं। अपने ट्वीट में वे कहते हैं,

“नोमुरा ग्रुप के एक अध्ययन से पता चला कि पिछले कुछ महीनों में चीन से क़रीब 56 विदेशी फ़ैक्टरियों ने ठिकाना बदला। 26 वियतनाम चली गईं, 11 ताईवान गईं और 8 ने थाईलैण्ड का रुख़ किया। भारत के हिस्से में सिर्फ तीन आईं। इनका “मेक इन इंडिया”और प्रधानमंत्री कार्यालय से सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ ?नौकरशाही, राजनीति, काहिलियत या उत्साह विहीनता?”

क्या अब भी यह सवाल सरकार से नहीं पूछा जाएगा कि भारत के हिस्से में केवल तीन ही कंपनियां क्यों आईं? क्या हम नए वर्ल्ड आर्डर के लिये केवल जुमलों में ही तैयार हैं और वास्तविकता में हमें अंदाज़ा ही नहीं कि हम सोच क्या रहे हैं और हमें करना क्या है ? यह न केवल एक वैचारिक दारिद्र्य है बल्कि हद दर्जे की नीति विहीनिता। क्या सरकार को यह नहीं बताना चाहिए कि मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया और स्टैंड अप इंडिया में कितने उद्योग लगे और देश की आर्थिकी में उनका क्या योगदान रहा ? हम आज सामान्य सी पीपीई उपकरण और टेस्ट किट तक तो बना ही नहीं पा रहे हैं और उसके लिये भी चीन पर आश्रित हैं जो हमें त्रुटिपूर्ण टेस्ट किट दे दे रहा है, फिर हम बड़े उद्योगों और उत्पाद की क्या बात करें।

सरकार न केवल नीति और नीयत के ही संकट से ग्रस्त है बल्कि प्रशासनिक रूप से इसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। 2016 की 8 नवम्बर को रात 8 बजे नोटबन्दी की घोषणा के क्रियान्वयन का प्रश्न हो या जीएसटी को लागू करने का सवाल या अब लॉक डाउन प्रतिबन्धों के पालन कराने की प्रशासनिक दक्षता, इन तीनों निर्णयों में सरकार की प्रशासनिक अक्षमता स्पष्टत: दिखी है। नोटबन्दी के संबंध में दो महीने में जितने, एक दूसरे को ओवरलैप करते हुए आदेश वित्त मंत्रालय और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी किये गए, उनकी संख्या और निर्गत आदेश ही यह बताने के लिये पर्याप्त हैं कि सरकार को खुद ही पता नहीं था कि वह नोटबन्दी करने क्यों जा रही है और इससे देश को लाभ क्या होगा।

यही हाल जीएसटी के क्रियान्वयन का रहा। न तो यह देश एक कर रहा और न ही इसने कर ढांचे को सरलीकृत किया  बल्कि इसकी प्रक्रियागत जटिलताओं ने छोटे और मध्यम वर्ग के व्यापारियों को इतना उलझा कर रख दिया कि उनके व्यवसाय पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ा। जीएसटी की प्रक्रियागत जटिलताओं को लेकर एक मज़ाक़ चल पड़ा कि इसकी जटिलता को सभवतः वित्त मंत्रालय भी नहीं हल कर पाएगा।

कोरोना के बाद नया वर्ल्ड ऑर्डर क्या होगा, यह अभी अस्पष्ट है पर 2014 के बाद भारत में सरकार के समक्ष जी जहाँपनाह मोड में जाने और सरकार से एक भी सवाल न पूछने की जो नयी संस्कृति जन्मी है वह संकीर्ण यूरोपीय राष्ट्रवाद की उपज है जो शनैःशनैः फासिज़्म के दरवाजे पर ले जाकर खड़ी कर देती है। चाहे मामला नोटबन्दी का हो, या सरकार द्वारा किये गए वादों का हो, या राजनीतिक दलों को मिलने वाले आर्थिक चन्दों का हो, या इलेक्टोरल बांड से जुड़ा हो, या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद भी बड़े कर्ज़खोर पूंजीपतियों की सूची का हो, या जज बीएच लोया की संदिग्ध मृत्यु का हो, या आनन-फानन में राफेल सौदा के ऑफसेट ठेके में हिंदुस्तान एयरोनॉटिकल कम्पनी के बजाय अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को दायित्व सौंपने का हो, या अन्य किसी भी सरकारी नीति का हो, या सरकार की लोकलुभावन घोषणाओं का हो या 100 स्मार्ट सिटी या बुलेट ट्रेन का हो, हर मुद्दे पर सरकार से सवाल न पूछने और सरकार की जवाबदेही तय न करने का ही यह घातक परिणाम है कि आज सरकार अपने कर्मचारियों के महंगाई भत्तों सहित अन्य भत्तों में कटौती करने जा रही है, तो वह निश्चिंत है कि विरोध के स्वर नहीं उठेंगे और अगर उठेंगे भी तो असहज नहीं करेंगे।

सरकार समर्थक भी दुखी हैं। खिन्न हैं। पर सरकार के खिलाफ खड़े होकर सरकार को कठघरे में खड़े करने और आंख में आंख डाल कर सवाल करने के अपने अधिकार को उन्होंने पहले ही तिलांजलि दे दी है। फासिज़्म ऐसी ही चुप्पी चाहता है। वह जनता के सवाल पूछने को हतोत्साहित करता है, उसकी खिल्ली उड़ाता है, सवाल करने वालों को देशद्रोही कहता है, खुद को देश का पर्याय समझ लेता है और जब उसे लगता है कि अधिकतर सवाल पूछने वाले अब साष्टांग हो गए हैं तो वह फिर दमन और अंत मे आत्मघात पर उतर आता है। सरकार को चाहिए कि वह, इस कटौती आदेश पर पुनर्विचार करे और सेंट्रल विस्टा सहित अन्य अनुपयोगी प्रोजेक्ट्स को जून 2021 तक स्थगित करे और उसके धन से इस संकट का सामना करे।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

This post was last modified on April 27, 2020 9:23 am

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