Wednesday, October 20, 2021

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जब एक डॉक्टर ने पेश की इंसानियत की हिमालयी मिसाल

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दोस्तों इंसानियत किसी मजहब, किसी जाति या किसी इलाके की मोहताज नहीं होती। यह इंसान का अपना जज्बा होता है जो अपनी संवेदनाओं से पैदा होता है। इंसान किस तरीके से अपने को सोचने-समझने की संकीर्णताओं से मुक्त करता है, अपने को ऊपर उठाता है, अपने भीतर कितनी उदात्तता तथा बड़प्पन अर्जित करता है, वह इसी जज्बे पर निर्भर करता है। आइए एक उदाहरण दिखाते हैं।

यह घटना है दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(AIIMS) की, जहां एक डॉक्टर ने अपनी जान को जोखिम में डालकर भी अपने मरीज की जान बचाना जरूरी समझा। जिस समय वेंटिलेटर के अंदर उस मरीज की हालत बहुत खराब हो गई थी और लग रहा था कि अब वह बचेगा नहीं क्योंकि उसकी ट्यूब बाहर निकल गई थी और ऐसे में बहुत जल्दी ही उसको कार्डियक अरेस्ट का खतरा उत्पन्न हो गया था जिससे उसकी जान जा सकती थी। जब डॉक्टर ने अपने सुरक्षा उपकरण के साथ उस ट्यूब को सही करने की कोशिश की तो भाप की वजह से बार-बार उसके पीपीई और सुरक्षा चश्मे के पार दिखना बंद हो जा रहा था।

मरीज को खतरे में देखकर डॉक्टर ने फौरन निर्णय लिया और तुरंत अपनी सुरक्षा किट और आंखों से सुरक्षा चश्मा हटा दिया और उस मरीज के वेंटिलेटर में ट्यूब को सही कर दिया। इससे मरीज की जान जाने का खतरा खत्म हो गया लेकिन उस डॉक्टर ने सुरक्षा मानदंडों का उल्लंघन किया था। तुरंत उसने अपने वरिष्ठ लोगों को सूचित किया और वरिष्ठ डॉक्टरों ने उसको क्वॉरंटाइन कर दिया।

कोरोना के इस भीषण संकट के समय में जब डॉक्टर, नर्स, लैब टेक्नीशियन, वार्ड-ब्वॉय, सफाईकर्मियों सहित सभी चिकित्सा कर्मी जिस तरह अपनी जान जोखिम में डाल कर लोगों की सेवा में लगे हुए हैं और उनमें से काफी लोग कोरोना की चपेट में भी आ चुके हैं और बहुत सारे चिकित्साकर्मियों की मौत हो चुकी है, ऐसे में इतनी खतरनाक स्थिति में वेंटिलेटर में पड़े हुए मरीज की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालना आसान काम नहीं है।

उस डॉक्टर के भीतर की मनुष्यता के उसी जज्बे ने उसको यह काम करने का आह्वान किया और उसने वह खतरा मोल भी लिया। उसके बाद क्वॉरंटाइन रहते हुए उस डॉक्टर ने अपने पिता से बातचीत किया। वे पिछले दो साल से अपने परिवार के बीच में नहीं जा पाए थे। डॉक्टर साहब अपने पिताजी से बात करते हुए थोड़ा डर रहे थे कि पिताजी अपनी जान को जोखिम में डालने के लिए उनको डांटेंगे। लेकिन पिताजी ने समझाया कि बेटा तुमने बहुत बड़ा काम किया है। तुमने आज इंसानियत को बचा लिया है और इस नेक काम को करते हुए अगर तुम्हारी जान चली भी जाती है तो यह मौत नहीं, शहादत होती।

क्या आप जानते हैं कि वह डॉक्टर साहब कौन हैं? वे हैं डॉक्टर ज़ाहिद अब्दुल मजीद और वे रहने वाले हैं कश्मीर के अनंतनाग जिले के वानीहामा दियालगाम गांव के। अब आप सोच सकते हैं कि यह बात मैं क्यों कहना चाहता हूं। हम लोग बहुत ही जल्दी धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर, भाषा के आधार पर अन्य लोगों को अपने से कमतर बताना शुरू कर देते हैं। हमारे भीतर धीरे-धीरे जहर भरा जा रहा है। जो चालू राजनीति है वह अपने छोटे, क्षुद्र फायदों के लिए हमें इस्तेमाल करने के लिए हमें जहरीला बना रही है, और हमें प्रेम करने की जगह नफ़रत करना सिखा रही है।

धीरे-धीरे हम इंसानियत के जो महान मूल्य हैं उनसे दूर होते जा रहे हैं। ये मूल्य एक धर्म या एक जाति या किसी एक इलाक़े के लोगों की बपौती नहीं हैं। लोगों का मूल्यांकन इंसानियत के इन्हीं मूल्यों और गुणों के आधार पर किया जाना चाहिए। इतनी नकारात्मक परिस्थितियों और घटाटोप अंधेरे के बावजूद ऐसे लोग दुनिया में हर जगह मौजूद हैं जो अपने हितों पर सार्वजनिक हितों को तरजीह देते हैं और इंसानियत की उस महान विरासत के सच्चे वारिस हैं जिसे सारी दुनिया में नैतिकता कहा जाता है।

एक समय था जब पूरी दुनिया में ये मूल्य तलाशे और तराशे जा रहे थे। इन्हीं को कालान्तर में धर्म के नाम से जाना जाने लगा। समाज के विकास की कुछ खास अवस्थाओं में समाज में व्यवस्था स्थापित करने की तात्कालिक जरूरतों के कारण ये धर्म अस्तित्व में आए थे। उस दौर में सभी धर्म कुछ महान मूल्यों की रचना कर रहे थे। उस दौर में इन धर्मों की प्रासंगिकता और उपयोगिता भी थी। लेकिन धीरे-धीरे इन धर्मों से उच्चतर नैतिक मूल्यों की आत्मा निकल गई और केवल कर्मकांडों की मृत देह बची रही। आज इसी मृत देह यानि ‘ममी’ की रखवाली में दुनिया के सारे धर्म अपने वर्तमान और भविष्य का खून बहा रहे हैं।

 संकीर्णता की राजनीति ने हमारी आंखों पर जो पट्टी बांधी है और हमारे दिलों में जिन पूर्वाग्रहों का बीजारोपण करके खाद-पानी दिया है, उसका शिकार धार्मिक अल्पसंख्यकों के अलावा कश्मीर और कश्मीरी लोग भी हुए हैं। कोशिश करके देश के शेष हिस्से के लोगों में उनके प्रति इस परायेपन को रोपा गया है।

महानता डींगें नहीं हांकती। आदर्श अपना ढिंढोरा नहीं पीटते। जिस हृदय में करुणा और त्याग की भावना पैदा हो जाती है वहां से संकीर्णता और नफ़रत का नामोनिशान मिट जाता है। हम अगर सतर्क नहीं रहे तो धर्म-धर्म चिल्लाते हुए अनैतिकता की गहरी खाई में जा गिरेंगे। अपने बेटे को शाबाशी देते हुए डॉक्टर ज़ाहिद अब्दुल मजीद के पिताजी के उन उद्गारों में व्यक्त भावना की ऊंचाई से ही मनुष्यता के महान शिखर निर्मित होते हैं। हमारी महानता की बुनियाद हमारी उदारता होगी। अन्य मनुष्यों और प्रकृति के प्रति हमारा सरोकार होगा। अच्छा समाज अच्छे लोगों से बनता है अच्छे आदर्शों से बनता है। और अगर हमारे भीतर अच्छे गुण, ऊंचे आदर्श और नैतिक मूल्य नहीं हैं तो हम चाहे किसी भी धर्म के हों हम अच्छे इंसान नहीं हैं। और जो अच्छे लोग होते हैं वे अच्छे आविष्कारों की तरह पूरी मनुष्यता की धरोहर होते हैं।

(शैलेश का लेख।)

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