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जब गोबर से पाला पड़ा कोरोनावायरस का!

‘‘गोबर और गोमूत्र से काम नहीं बना। कल मछली खाकर देखता हूं’’।

मई के मध्य में यह साधारण सा फेसबुक पोस्ट, जो गाय के मल को कोरोना-19 के उपचार के रूप में खारिज कर रहा था, क्यों मणिपुर, इम्फाल के एक पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम के देशद्रोह के केस में गिरफ्तारी का कारण बन गया?

इस पोस्ट ने सत्ताधारी दल भाजपा के सदस्यों को परेशान कर डाला क्योंकि वह ठीक उस समय आया जब भाजपा के मणिपुर अध्यक्ष सैक्षोम जितेंद्र सिंह की कोविड से मौत हो चुकी थी; वे गोबर व गोमूत्र द्वारा कोविड के उचाार के मुखर प्रवक्ता रहे हैं। भाजपा सदस्यों की शिकायत के आधार पर ही वांगखेम को कठोर राष्ट्रीय सूरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था, जिसका प्रयोग आम तौर पर अपराधियों और आतंकवादियों के विरुद्ध किया जाता है।

इस घटना से पता चलता है कि हिंदुत्व नाम का आंदोलन सूडोसांइस को कितनी गंभीरता से लेता है और प्रतिपादित करता है। यह आंदोलन हिन्दू वर्चस्व और उग्र राष्ट्रवाद का मिश्रण है और यह भारतीय राजनीति पर कुछ दशकों से अपना वर्चस्व कायम किये हुए है। हालांकि ‘निश्चिंतता’ को इस बार के खतरनाक कोविड-19 की दूसरी लहर को रोक पाने की नाकामयाबी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, इससे अधिक बड़ी भूमिका उन लोगों ने अदा की है जो मोदी सरकार में रहते हुए ढेर सारी अनर्गल बातें उगल रहे हैं। मोदी सरकार के 2014 में सत्ता में आने के बाद से उनके गहरे अधिनायकवादी दृष्टिकोण के अलावा दूसरा अवगुण है हर चीज़-जलवायु परिवर्तन से लेकर जीवजाति के उद्भव तक के बारे में झूठा सिद्धान्त प्रतिपादित करना। कुछ वर्षों पूर्व प्रधानमंत्री ने स्वयं एक सार्वजनिक मंच से दावा किया था कि हिंदू देवता श्री गणेश, जिनका सिर हाथी का है, प्राचीन भारत में विकसित प्लास्टिक सर्जरी का एक नमूना है। मुम्बई में 2015 में सम्पन्न प्रतिष्ठित भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दौरान एक प्रस्तुति में दावा किया गया था कि वैदिक काल में आज के वायुयान का अधिक उन्नत रूप मौजूद था।

इस तरह के सरकारी तौर पर समर्थन-प्राप्त पोंगापंथ कोविड-19 के संदर्भ में बहुत ही घातक साबित हुआ है। अप्रैल माह में तीर्थयात्री हरिद्वार के कुंभ मेले में गंगा में पवित्र स्नान के लिए एकत्र हुए, भाजपा के तीरथ सिंह रावत, उत्ताराखंड के मुख्ययमंत्री ने कहा कि हिंदुओं द्वारा पुण्य माना जाने वाला पवित्र गंगाजल कोविड-19 को भगा देगा।

यह धार्मिक पर्व, जो एक माह से अधिक लम्बा चला और 90 लाख लोगों का समागम स्थल बना, महामारी के संपूर्ण इतिहास में सबसे अधिक संक्रमणकारी साबित हुआ। कोविड-19 की दूसरी लहर का ग्राफ तेजी से तब चढ़ा जब सब तीर्थयात्री मेले से देश के विभिन्न हिस्सों को लौटे।

तब से दसियों लाख लोग अस्पताल पहुंचे और बुनियादी ऑक्सीजन सपोर्ट व बेड के अभाव में हज़ारों को मौत के मुंह में जाना पड़ा। हल्की पहली लहर, जिस पर सरकार ने विजय प्राप्त कर लेने का दावा किया था, के बाद भारत ने पिछले डेढ़ माह में प्रतिदिन सबसे अधिक संक्रमित लोगों और सबसे अधिक मौतों के मामले में विश्व रिकॉर्ड कायम किया है।

परंतु अनर्गल किस्म के दावों के लिए खिताब उस मंत्र के लिए दिया जाना चाहिये जो सत्ता में बैठा हर व्यक्ति जप रहा था-गोबर और गोमूत्र का कई रोगों के लिए औषधिक गुण। कोविड-19 के मामले में भी महामारी शुरू होने के बाद से ही लोकप्रिय मीडिया और वॉट्सऐप नेटवर्क में इस मुद्दे पर संदेशों और वीडियोज़ की बाढ़ सी आ गई।

गुजरात में, जो प्रधानमंत्री का गृह राज्य है, मीडिया रिपोर्ट आई कि भक्तों ने इस आशा में कि उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी और वे कोविड से जल्दी मुक्त हो जाएंगे, अपने बदन को गाय के गोबर और गोमूत्र से लीप दिया।

हिन्दू महासभा का मुखिया, जो कि भाजपा के साथ जुड़ा एक कट्टरपंथी तत्व है, ने कोरोना वायरस को भगाने के लिए मार्च के महीने में नई दिल्ली में एक गोमूत्र पीने का पर्व आयोजित किया।

फर्जी़ उपचार और विचार प्रतिपादित करने के अलावा दक्षिणपंथी हिंदुत्वादी दल और उसके समर्थकों ने आधुनिक मेडिकल साइंस पर भी लगातार वार किया; वे उसे ‘‘अंग्रेजी औषधि’’ कहकर उसका मखौल बनाते हैं। मसलन, मई के प्रारम्भ में योग गुरू ‘बाबा’ रामदेव, जो परंपरागत औषधियों के उद्यम में लगे हैं और जो भाजपा नेताओं के काफी करीब हैं, ने भारत के मेडिकल समुदाय को यह दावा करके काफी आक्रोशित कर दिया कि दसियों हज़ार लोग आधुनिक दवाएं खाकर मौत के घाट उतर गए।

बड़े लापरवाह ढंग से उन्होंने यह दावा भी किया कि भारत में जो सैकड़ों कथित रूप से आक्सीजन के अभाव से मरे थे वे सच कहिये तो अपनी गलती से ही मरे थे क्योंकि उन्हें ‘‘ठीक से श्वास लेना’’ ही नहीं आता था। भारत के स्वास्थ्य मंत्री के हस्तक्षेप के बाद (डॉक्टरों की कड़ी निंदा से चिंतित होकर) रामदेव ने माफी मांगी, पर उनके बयानों ने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा को चलाने वाले और उनके सहयोगी संगठन किस तरह की भावनाओं से ग्रसित हैं।

सूडो साइंस की महामारी, जिसको राजनेताओं और भारतीय जनमानस का प्रभावशाली हिस्सा समर्थन देता है, विडम्बनापूर्ण है क्योंकि भारतीय लोग एक अंतरिक्ष व परमाणु शक्ति होने का गर्व भी रखते हैं। भारत सॉफ्टवेयर व फार्मास्यूटिकल्स जैसे ज्ञान-गहन क्षेत्रों में अग्रणी देश के रूप में प्रसिद्ध है।

इन सफलताओं का राज है कि शुरुआती निवेश विज्ञान के श्रेष्ठतम संस्थानों के निमार्ण में और बेहतर वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण में किये गए। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वैज्ञानिक स्वभाव (scientific temper),आधुनिक विज्ञान, शोध व शिक्षा के बड़े हिमायती थे। पर हाल के दशकों में भारत के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों की ईमानदारी में काफी क्षरण हुआ है और आम तौर पर विज्ञान-संबंधी नीतियों को कमजोर किया गया है।

यह सब कुछ, और साथ में हिन्दुत्व आंदोलन का सत्तासीन होना, जो अर्ध-सत्य पर ही टिका हुआ है और एक ऐसे मिथकीय काल का जयगान करता रहता है जब ‘‘भारत महान था’’, ढेर सारे राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर तार्किक सार्वजनिक बहस या समझदारी के लिए घातक साबित हुआ है।

कुछ अर्थों में भारत की वर्तमान स्थिति नाज़ी शासन के समरूप है। यह शासन करीब एक शताब्दी पूर्व रहस्यवाद और राष्ट्रीय गौरव के संमिश्रण के बल पर सत्ता में आई थी। यह तब जब उस देश में विश्व के सबसे बड़े वैज्ञानिक और विचारक हुआ करते थे। युजेनिक्स (Eugenics)के नस्लवादी विधा को समर्थन देने के अलावा हिटलर के डेप्युटी रुडाल्फ हेस जैसे सर्वोच्च नाजी नेताओं ने ढेर सारी सूडो-वैज्ञानिक सिद्धान्तों को वैकल्पिक औषधियों के नाम पर बढ़ावा दिया था।

नाजी सत्ता इस बात के लिए भी कुख्यात थी कि उसने कई नृशंस मेडिकल प्रयोग कैदियों, दिव्यांगों और अन्य ऐसे लोगों पर किये जिन्हें वे अवांछित समझते थे, जैसे कि यहूदी।

जबकि समकालीन भारत अभी इस हद दर्जे की अनैतिकता तक नहीं पहुंचा है, यह देखते हुए कि भारत के सत्ताधारी किस हद तक अल्पसंख्यक जनमानस के प्रति अधिकतम नफरत पाले हुए हैं और कितने संदिग्ध समाधानों के प्रति आसक्त रहते हैं, यह दावे के साथ कह पाना असंभव है कि वह कब मानव इतिहास के न्यूनतम स्तर तक पहुंच जाएंगे।

(सत्या सागर एक पत्रकार हैं। उनसे sagarnama@gmail.com  पर संपर्क किया जा सकता है।)

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This post was last modified on June 6, 2021 12:55 pm

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