Sun. May 31st, 2020

ज़िंदगी के साथ जब मौत चलने लगे

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साइकिल पर घर जाते मजदूर।

बस्तर। बढ़ते लॉकडाउन ने एक बार फिर दिहाड़ी मजदूरों की समस्या बढ़ा दी है। तेलंगाना में भूखे-प्यासे फंसे मजदूर इंतजार कर रहे थे कि कब यह लॉक डाउन खत्म हो और कब वे घर जाएं। मजदूरों ने सरकारों से गुहार लगाई हमें खाना दे दो, घर पहुंचा दो। मगर सरकारों ने इनकी नहीं सुनी। अंततः भूख ने इन मजदूरों का सब्र तोड़ दिया। लगभग 17 मजदूरों ने पैसों का बंदोबस्त कर 5-5 हजार रुपए की साइकिल खरीद निकल गए अपने घर पश्चिम बंगाल जाने के लिए। 

रेड जोन तेलंगाना से 2 दिन पहले साइकिल से अपने घर वेस्ट बंगाल के लिए निकले ये 17 मजदूर अब तक लगभग 500 किमी का सफर तय कर छत्तीसगढ़ के नेशनल हाइवे 63 तक पहुंच चुके है। अब इन्हें करीब 13 से 14 सौ किमी का सफर आगे और तय करना है। 

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उन मजदूरों में से एक ने बताया कि “पश्चिम बंगाल से वारंगल काम के लिए गए थे। 2 महीने के लॉक डाउन के बाद काम बंद है। पैसे खत्म हो गए। जिस कंपनी में काम कर रहे थे न तो उसके मालिक ने खाना दिया और न ही सरकार ने। 

जैसे-तैसे लोगों ने हमारी मदद की। दिन भर में एक ही बार खाना मिल जाए वो भी बड़ी बात थी। पास बनाकर घर सुरक्षित वापस भेजने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते थक गए। लेकिन सरकारें हमारी सुन नहीं रहीं। मजबूरी में हमें साइकिल खरीद कर अब उसी से ही घर के लिए निकलना पड़ा”।

एक मज़दूर ने बताया कि “मां हार्ट पेशेंट है, हर दिन मेरे लिए रोती है। न तो पश्चिम बंगाल और न ही तेलंगाना सरकार ने मदद की। ऊपर से कहा गया कि बिना पास के पैदल ही निकल जाओ। तंग आकर 100 से ज़्यादा लोगों ने साइकिल खरीदी और हम ऐसे ही निकल गए। कुछ लोग महाराष्ट्र के रास्ते से गए हैं जबकि हम छत्तीसगढ़ से होकर जा रहे हैं। 

जगदलपुर, ओडिशा, झारखंड होते हुए पश्चिम बंगाल पहुंच जाएंगे। अभी 2 दिन पहले  निकले हैं। यूं ही चलते रहे तो 13 दिन और लगेंगे हमें घर पहुंचने में। मजदूरों ने कहा कि बस्तर नक्सल क्षेत्र है। लॉक डाउन के बाद अब तो दर्द ऐसा है कि साइकिल चलाते, पैदल चलते मौत भी आ जाए तो गम नहीं। फिर नक्सलियों से किस बात का भय”। 

गीदम पहुंचे मजदूर पेड़ के नीचे जब आराम कर रहे थे तो एक मजदूर ने अपने घर फोन लगाया अपने परिवार से बात कर कहा कि आप लोग चिंता न करें हम सब जल्द मिलेंगे कहते हुए रो पड़ा। यह मंजर देख आस पास खड़े सभी मजदूरों सहित मीडिया कर्मियों की आंखें भी नम हो गईं। 

इस बीच इन पंक्तियों के लेखक की नजर एक मजदूर के पैरों पर पड़ी, मजदूर ने केवल एक पैर में ही चप्पल पहन रखी थी। जब मैंने पूछा कि दूसरी चप्पल कहां गई तो उसने कहा कि साइकिल चलाते तो कभी पैदल चलते चप्पल घिस-घिस कर टूट गयी। दूसरे पैर में इस लिए पहन रखी है ताकि एक पैर तो सुरक्षित रहे। 

मजदूरों का दर्द सिर्फ साइकिल पर सवार होकर निकलने तक का नहीं, बल्कि ये भूख से भी लड़ रहे हैं। गीदम में नाका के पास बैठे मजदूर बोतल में भरे पानी में चीनी डाल रहे थे। पूछने पर बताया कि 3 दिनों से अन्न का एक दाना पेट में नहीं गया। पानी में चीनी घोलकर ही पी रहे। जहां जगह मिलती है वहां सो जाते हैं। पानी भी कई बार नसीब नहीं होता। जितने पैसे थे सबको मिलाकर साइकिल खरीद ली। अब केवल 2-3 सौ रुपये ही हमारे पास बचे हैं। 

मजदूरों की यह बात सुनकर पत्रकार लोकेश शर्मा ने अपने पास से इन मजदूरों के लिए कुछ पैसे दे कर आर्थिक मदद की। ताकि रास्ते में यदि कहीं भी दुकानें खुली हों तो ये कुछ खा कर अपना पेट भर सकें। 

 गीदम तहसीलदार प्रीति दुर्गम को इसकी सूचना दी गयी। तहसीलदार ने तुरंत पटवारी ओम प्रकाश कश्यप को भेजा। मजदूरों को अस्पताल ले जाकर जांच कराई गई व कारली ले जाकर भोजन की व्यवस्था की गई। मजदूर भावुक हो गए और कहा कि छत्तीसगढ़ ने हमारा दर्द समझा। एक मजदूर ने बताया कि चलते-चलते पाँव दुख गए, इसलिए रोज एक दर्द की मेडिसिन ले कर चल रहे हैं। मंजिल दूर है जैसे-तैसे पहुंच जाएंगे। 

(बस्तर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

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