Saturday, October 16, 2021

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महाड़ सत्याग्रह के बहाने: क्या गाय के गोबर और मूत्र पर ही भारत देश का भविष्य टिका हुआ है?

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जो लोग मूर्खतापूर्ण उपचारों का प्रचार-प्रसार करते हैं, उन्हें इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि कई लोगों को गौमूत्र पीने के बाद अस्पताल में  भर्ती होना पड़ा है। रामदेव ने भी कोरोना के लिए अश्वगंधा को निवारक के रूप में घोषित किया जिसे चिकित्सकों ने खारिज कर दिया। जान की कीमत इस आदमी के लिए दो कौड़ी के बराबर भी नहीं है। प्रधानमन्त्री को भी कुल 500 से अधिक डॉक्टरों ने, गोमूत्र के अफवाह को गलत करार देते हुए पत्र लिखा। 

दुनिया के दूसरे हिस्सों में जहां कोरोना वायरस के लिए बेहतर इंतजामात किये जा रहे हैं वहीं हमारा देश व्यवस्था के मामले में जम्हाई ले रहा है। और सरकार और उसके नुमाइंदे संकल्प और धैर्य की दुहाई दे रहे हैं। हमारी हालत इटली जैसी है, जिसने खुद को पूंजीवादी सिस्टम में फिट होने के लिए सब कुछ किया और अब खुद की रक्षा करने की ताकत उसमें नहीं है। किसी भी आपदा में हमारे हाथ-पाँव फूल जाते हैं, यही जाहिर करते हैं कि पब्लिक महज एक नम्बर है। आधार नम्बर। खुद के अनुभव पर बता सकता हूं कि अस्पतालों की हालत मेरे प्रदेश में बद से बदतर है और निजी अस्पताल पहुंच के बाहर। खैर। 

इतिहास में थोड़ा पीछे जाएं तो पाते हैं कि ‘बोले समझौता’ होने के बावजूद सार्वजनिक स्थानों के उपयोग पर दलित जातियों को रोक थी। मतलब समझौता रस्मी और कागज़ी था। इसी के विरोध में 1927 में महाड़ सत्याग्रह हुआ था। इस सत्याग्रह का यह महत्व है कि इसने पहली बार तय किया कि पानी भी एक पब्लिक कमोडिटी है। और जो अपनी जाति अभिमान का गुणगान करते नहीं थकते उन्होंने किस तरह से पानी को भी अपनी मिल्कियत बना रखा था (जो कि आज भी कहीं-कहीं देखने को मिल ही जाता है) वह देखने लायक था। उन्होंने महाड़ म्यूनिसिपल द्वारा इंसानियत के पक्ष में दिए गए आदेश को मानने से इनकार कर दिया। 

20 मार्च 1927 वह ऐतिहासिक दिन था जब अम्बेडकर ने यह तय कर लिया था कि अब सूरत बदलनी चाहिए। उन्होंने इसे लगभग आर या पार की लड़ाई बना दी थी। करीब पांच हजार दलित स्त्री-पुरुषों के साथ चवदार तलाब का पानी पीया और घोषित कर दिया कि यह एक सार्वजनिक उपयोग का स्थल है। सवर्ण आदतन इसे बर्दाश्त नहीं कर पाए और हिंसक होकर अत्याचार किये। इसके अलावा अपना रामबाण ‘पञ्चगव्य’ पानी में मिला दिया। ताकि जल का उपयोग न किया जा सके और पवित्रता का ढोंग भी बना रहे। दुर्भाग्यवश इस प्रतिरोध को वापस ले लेना पड़ा था।

यह पहली बार था कि दलित समुदाय के लोग किसी समाज सुधारक के साथ अपने प्रतिरोध को जता रहे थे। इस विरोध ने उनमें आत्म संबल पैदा किया। इस दिन को ‘सामाजिक सशक्तिकरण दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। दिसम्बर 25, 1925 को मनुस्मृति दहन और हिन्दू समाज में बराबरी की माँग ने सवर्णों के बीच बेचैनी पैदा कर दी थी। जिसका प्रतिफलन महाड़ सत्याग्रह के रूप में देखा जा सकता है।

लगभग तिरानवे साल बाद भी यदि स्थिति जस की तस बनी हुई है तो क्या यह इस देश के लिए दुर्भाग्य का सबब नहीं है? क्या लगभग सौ साल का अंतराल हम में कोई भी तब्दीली ला पाया है? 

क्या इसी को हम ‘सब का साथ और सबका विकास’ कहते हैं? 

क्या गाय का गोबर और मूत्र ही देश के विकास का मूलमंत्र बनेगा? क्या पानी की भी कोई जाति होती है?

(मूलतः मुज़फ़्फ़रपुर निवासी कवि-लेखक अनुज नागालैंड यूनिवर्सिटी, कोहिमा में पढ़ाते हैं।)

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