Saturday, October 16, 2021

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सेंट्रल विस्टा की बलिवेदी पर राष्ट्रीय अभिलेखागार

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सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के चर्चा में आने के बाद राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली की ऐतिहासिक इमारत भी चर्चा में आ गई है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि अभिलेखागार की इमारत का कुछ हिस्सा, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट से प्रभावित हो सकता है यद्यपि सरकार की ओर से इस आशंका को निर्मूल बताया गया है मगर आशंका निर्मूल नहीं है ? जो नक्शा तैयार किया गया है उससे अभिलेखागार का नया हिस्सा प्रभावित होगा। प्रभावित तो दो अन्य भवन भी हो रहे हैं मगर अभिलेखागार का महत्व अतुलनीय है। किसी भी मुल्क के लिए अभिलेखागारों का अस्तित्व, उनकी ऐतिहासिकता और शोध की बुनियाद को प्रतिबिंबित करता है। हमारे देश में अंग्रेजों के आने के बाद ही अभिलेखागार की अवधारणा प्रकाश में आयी। उसके पूर्व ऐसा कोई अभिलेखागार दिखाई नहीं देता जहां इस भू-भाग के इतिहास को विश्लेषित करने की सामग्री उपलब्ध हो।  

कलकत्ता में इम्पीरियल रिकार्ड डिपार्टमेन्ट के रूप में स्थापित, राष्ट्रीय अभिलेखागार दुर्लभ अभिलेखों का संरक्षक है जो दक्षिण पूर्व एशिया में सबसे बड़ा अभिलेखागार है। यहाँ पर सरकारी दस्तावेज, प्राच्य अभिलेख, मानचित्र और गणमान्य व्यक्तियों के निजी अभिलेख भी सुरक्षित हैं। यह अभिलेखीय सामग्री शोधकर्ताओं, प्रशासकों एवं अन्य उपयोगकर्ताओं को अमूल्य सूचना प्रदान करती है। यह भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन है। अभी मार्च 2021 में राष्ट्रीय अभिलेखागार की 125 वीं स्थापना दिवस मनाया गया।  

किसी समाज की बौद्धिकता का आकलन, शोधार्थियों की सक्रियता और शोध की गुणवत्ता से लगाया जाता है। शोधार्थियों के लिये मौलिक अभिलेखों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी, जिला स्तर से लेकर देश स्तर तक के अभिलेखागारों (आर्काइव्स) की होती है। अभिलेखागारों में अभिलेखों के रख-रखाव की एक सुनिश्चित कार्यप्रणाली होती है, जिसमें विभाग, शाखा, पत्रावली संख्या और वर्षानुसार अभिलेखों को रखा जाता है। उनकी सुरक्षा के लिये अमोनिया गैस चैम्बर का निर्माण किया जाता है तथा रसायनिक तत्वों का इस्तेमाल कर कीड़ों से बचाया जाता है। दुनिया के विकसित देशों में अभिलेखों को सुरक्षित रखने के लिये माइक्रोफिल्म या डिजिटाइजेशन का सहारा लिया गया है। नेशनल आर्काइव लंदन और ब्रिटिश लायब्रेरी में प्राचीन अभिलेख एवं अठारहवीं सदी के अखबारों को ढूंढा जा सकता है तो अमेरिका के लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में 1690 से अब तक के अखबारों को देखा जा सकता है। अमेरिका के सैकड़ों वर्ष पुराने अखबार इंटरनेट के जरिये देखे, पढ़े जा सकते हैं।

नेशनल आर्काइव लंदन और नेशनल आर्काइव्स ऑफ आस्ट्रेलिया ने तमाम ऐतिहासिक अभिलेखों को डाउनलोड की सुविधा दे रखी है। हमारे यहां ‘अभिलेख पटल’ नाम से डिजीटाइजेशन की ढीली-ढाली व्यवस्था अभी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रही है क्योंकि इसे हमने सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर एक निजी एजेंसी के हाथ में दे रखा है। लम्बे समय से प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है। अपने यहां लापरवाही एवं अभिलेखागारों की उपेक्षा के कारण मुंबई, भोपाल, लखनऊ, दिल्ली और कोलकाता सहित तमाम अभिलेखागार में रखे पुराने अभिलेख एवं अखबार सड़ रहे हैं। राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली के बीस से तीस प्रतिशत अभिलेख, जो कैटलागों में दर्ज हैं, गायब हो चुके हैं। गृह, राजनीति और पुलिस विभाग की सबसे ज्यादा पत्रावलियां गायब हुई हैं। प्रदेश स्तरों के अभिलेखागार, दीमकों की चपेट में हैं और जिला स्तर के तमाम अभिलेख, जिलाधिकारी कार्यालय के अभिलेखागारों में या न्यायालयों के अभिलेखागारों में सड़ चुके हैं। वहां के कर्मचारियों को पता ही नहीं कि उनके यहां कौन-कौन से अभिलेख उपलब्ध हैं या उनका क्या महत्व है। जिलों का इतिहास या स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी संबंधी अभिलेखों को जिला स्तर पर ढूंढना असंभव है। 

राष्ट्रीय अभिलेखागार के ज्यादातर अभिलेख ब्रिटिश कालीन हैं और उन्हें उठाने, अन्यत्र रखने की प्रक्रिया में पन्ने टूट जाते हैं। यही कारण हैं कि पत्रावलियों एक ब्लाक से दूसरे ब्लाक में हटाने पर कई पत्रावलियां खराब हो गई हैं। अगर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के कारण, एक बार फिर राष्ट्रीय अभिलेखागार की पत्रावलियों को इधर-उधर किया गया तो यह अभिलेखों के नष्ट होने की कीमत पर होगा। अभिलेखों को पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। 

ऐसे में देश की ज्ञान संपदा को विकसित करने के लिए राष्ट्रीय अभिलेखागार सहित सभी अभिलेखागारों का संरक्षण जरूरी है। देश के विभिन्न अभिलेखागारों में जो ऐतिहासिक महत्व के अभिलेख बचे हुये हैं अगर उन्हें अविलम्ब डिजिटल नहीं किया गया तो आने वाले समय में शोधार्थियों को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। आजादी के बाद कुछ राज्यों ने शुरू-शुरु में ऐतिहासिक दस्तावेजों को प्रकाशित कर उल्लेखनीय कार्य किया था परन्तु बाद में उनका पुनः प्रकाशन नहीं किया गया। यही कारण है कि अब वे दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। हमारे यहां व्यक्तिगत अभिलेखागारों के प्रति समाज में रुचि नहीं है। भोपाल का एकमात्र ‘सप्रे संग्रहालय’ हमारे लिये छोटा ही सही, अनुकरणीय उदाहरण है, जहां व्यक्तिगत प्रयास से कुछ अभिलेख सुरक्षित रखे हुये हैं। 

कोई भी समाज, जो अपने दस्तावेजों, ऐतिहासिक महत्व की चीजों, संस्कृति और कलाओं को संरक्षित नहीं रख सकता, उसकी सार्वभौमिकता, स्वतंत्रता या गरिमा का कोई मूल्य नहीं होता है। अपने यहां जो कुछ भी अभिलेखागार बचे हुये हैं, वे अंग्रेजों की देन हैं। हमने उन्हें विकसित करना तो दूर, संरक्षित रखने का काम भी नहीं किया है। ऐसे में गुणात्मक शोधकार्य कैसे होगा, यह चिंता का विषय है। 

(सुभाष चन्द्र कुशवाहा यूपी सरकार की उच्च सेवा से रिटायर हुए हैं। और इस समय संस्कृति और समाज से जुड़े तमाम पक्षों पर लेखन का काम कर रहे हैं। आपने कई किताबें भी लिखी हैं जो बेहद चर्चित रही हैं।)

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