Saturday, December 4, 2021

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पुण्यतिथि पर विशेष: क्या राजेन्द्र यादव का सही मूल्यांकन होना बाकी है?

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आज से करीब 50 साल से भी पहले प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मारियो पूजो की बहुचर्चित किताब” गॉडफादर” आयी थी जो करीब 67 सप्ताह यानी करीब सवा साल तक बेस्ट सेलर रही। दो साल में वह किताब दो करोड़ बिकी। बाद में उस पर फ़िल्म बनी और दुनिया भर में दिखाई गई तथा चर्चित हुई। मरलीन ब्रांडो जो गॉडफादर बने थे, उससे अमर हो गए। यह किताब और फ़िल्म इतनी चली कि लोग बात बात में “गॉडफादर” का जिक्र करने लगे। बातचीत में लोग एक दूसरे से कहते और पूछते सुने गए कि तुम्हारा” गॉडफादर” कौन है। यह शब्द मानो एक मुहावरा बन गया और इस शब्द से किसी व्यक्ति की हैसियत का भी पता चलने लगा।

“गॉडफादर” समाज की शक्ति संरचना और प्रभुत्व का एक प्रतीक बन गया। ध्यान रहे “गॉडफादर” और “मेंटर” में फर्क है। “गॉडफादर” एक आपराधिक संगठन या माफिया के सरगना का प्रतीक था। लेकिन यह प्रतीक इतना शक्तिशाली था कि वह सब कुछ नियंत्रित करता था। साहित्य की दुनिया में भी मेंटर के रूप में ” गॉडफादर “का इस्तेमाल होने लगा। लेकिन” गॉडफादर” में अर्थ की वह ध्वनि नहीं जो “मेंटर” में है। मेंटर” गुरु” या” निर्माता” है जबकि “गॉडफादर” संरक्षक अधिक है। वह लोगों को प्रमोट करता है। उसमें एक नकारात्मक ध्वनि भी है।उसमें शक्ति प्रदर्शन आत्मप्रदर्शन का तत्व अधिक है।

हिंदी के युवा कथाकार अभिषेक कश्यप (जो उम्र के हिसाब से अधिक युवा भी नहीं हैं,) की किताब “गॉडफादर” आयी है जो हिंदी के प्रख्यात लेखक संपादक राजेन्द्र यादव पर केंद्रित है। राजेंद्र जी अभिषेक के ही नहीं बल्कि कई लेखक और लेखिकाओं के “गॉडफादर” रहे। एक लेखिका ने तो उन्हें कृष्ण की ही संज्ञा दी। बाद में उनकी आलोचना भी की। यह सच है कि राजेंद्र जी ने अभिषेक जैसे युवा लेखकों को अवसर दिया स्नेह दिया प्यार दिया ।एक आत्मीयता प्रदान की।
तो क्या राजेन्द्र यादव वाकई गॉडफादर थे? आज तक किसी ने किसी लेखक पर “गॉडफादर” शीर्षक से कोई किताब नहीं लिखी।यह इस दृष्टि से पहली किताब है।आखिर गॉडफादर से उनका क्या अभिप्राय है?

पुराने जमाने मे साहित्य के” गुरु” होते थे या “साहित्यकार निर्माता” जैसे महावीर प्रसाद द्विवेदी थे, गणेश शंकर विद्यार्थी थे,आचार्य शिवपूजन सहाय थे ,बनारसी दास चतुर्वेदी थे हजारी प्रसाद दिवेदी थेऔर बाद में अज्ञेय और भैरव प्रसाद गुप्त थे जिन्होंने नई पीढ़ी को सींचा, उनका निर्माण किया। राजेन्द्र यादव उसी परम्परा के संपादक थे पर भिन्न थे।वे बिंदास थे,आचार्य की तरह धीर गंभीर नहीं थे बल्कि सहज सरल थे लोगों से घुलमिल जाते थे, याराना थे युवा वर्ग से दोस्ताना थे। किसी तरह की” गुरुता” नहीं थी उनमें। धर्मवीर भारती का आतंक भी नहीं था न नामवर जी का गुरुडम था पर वह विवाद प्रिय और शिष्य प्रिय भी थे।

“हंस” पत्रिका को जो लोकप्रियता हासिल हुई वह बहुवचन या समास या आलोचना या पहल को प्राप्त नहीं थी। पर हंस का एक परिवार था और दरबार भी था। वह साहित्यशक्ति का एक केंद्र था। एक केंद्र जेएनयू में था ,एक संस्कृति मंत्रालय में भी था,एक दरियागंज में भी। पर राजेन्द्र जी नेतृत्व कर्ता भी थे, साहित्य को दिशा देने वाले संवाद और विवाद के साथ जीने वाले और वह स्टंट भी करते थे,थोड़े प्रचार और प्रदर्शन में भी यकीन करते थे लेकिन इतना तो सब मानते हैं कि दलित साहित्य और स्त्री विमर्श को उन्होंने जगह दी।

उन्हें आवाज़ दी ,पहचान दी। उन्होंने इसे बहस के केंद्र में लाया। साहित्य में ब्राह्मणवाद और ठाकुरवाद की दुरभिसंधियों को तोड़ा। हालांकि उन पर सवर्णों ने पिछड़ावाद का भी आरोप लगाया। राजेंद्र जी के प्रिय लेखकों में एक तरफ़ पंकज बिष्ट थे तो दूसरी तरफ संजीव और शिवमूर्ति तो प्रियम्वद और संजय सहाय भी थे। सारा राय, गीतांजलि श्री, सृंजय को उन्होंने सबसे पहले जगह दी। अखिलेश भी उनके प्रिय थे पर उदय प्रकाश उनके शिविर में नहीं थे।

अभिषेक की यह किताब संस्मरणात्मक है। वह राजेंद्र जी की रचनाओं या उनकी जीवन दृष्टि या उनकी वैचारिकता का कोई मूल्यांकन नहीं करती। वह उनका अभीष्ट भी नहीं है। वह उनके व्यक्तित्व को खोलती जरूर है।
अभिषेक ने अपनी पहली कहानी छपने से लेकर ज्योति प्रसंग तक राजेंद्र जी को समेटा है। बेबाक ढंग से चुटीले अंदाज में लिखा है।इनमें कुछ विवादास्पद प्रसंग भी हैं। किताब रोचक है। इसमें राजेंद्र जी के ठहाके भी हैं। मोहन राकेश, कमलेश्वर प्रसंग है। उनसे दोस्ती और प्रतिस्पर्धा के किस्से भी हैं।
लेकिन अभिषेक राजेंद्र जी से मोहाविष्ट अधिक लगते हैं। वे लेखकों को हीरो की तरह देखते हैं। उनमें एक तरह का ग्लैमर भी देखते हैं। असल में नई कहानी के तीन तिलंगों ने साहित्य को glamours बनाने की कोशिश की लेकिन इनमें वैचारिक रूप से अधिक परिपक्व राजेंद्र जी ही थेउनकी दृष्टि साफ थी। राजेंद्र जी के अवदान का वास्तविक मूल्यांकन होना अभी बाकी है। बहरहाल, उनकी पुण्यतिथि पर अभिषेषक की किताब के बहाने फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है।

(विमल कुमार वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं। आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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