श्रमिक स्पेशल ट्रेनें, भटकी हैं या भटकाई गई हैं!

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यह रहस्य ही रहेगा कि दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क वाले देश, जिसमें हजारों ट्रेनें निर्धारित रूट पर चलती हैं वहां कुछ सैकड़ा ट्रेनें कैसे भटकीं और मटकीं, दिख तो यह रहा है कि रेल भटकी हैं, लेकिन अंदर की कहानी कुछ और बता रही है। इस बारे में उर्दू का एक प्रसिद्ध शेर सटीक बैठता है,

गैर मुमकिन है कि हालात की गुत्थी सुलझे, 

अहले दानिश ने बहुत सोच के उलझाया है।

रेल परिचालन का जो सामान्य तरीका है उसके परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि कोई भी रेल कभी भी भटक नहीं सकती। परिचालन से जुडे़ लोग जानते हैं कि रेल के इंजन जिसमें कम से कम दो क्रू मेम्बर होते हैं, वह स्टेशनों के कर्मचारियों से निर्देशित होते हैं जो सीधे तौर पर कंट्रोल रूम से शासित व निर्देशित होते हैं। 

भटकने वाली और 2-3 दिन का सफर 5-7 दिनों में पूरा करने वाली ट्रेनों के बारे में रेल के अधिकारियों और रेल मंत्री का स्पष्टीकरण और बयान किसी भी दृष्टि से स्वीकार योग्य नहीं है।

बयानों में कहा गया कि एक ही तरफ जाने वाली ट्रेनों की अधिक संख्या के कारण ट्रेन लाइनों में कंजेशन हो गया था, सबसे दिलचस्प बहाना था कि एक के पीछे दूसरी ट्रेन आने/खड़ी रहने से कंफ्यूजन हो गया और ट्रेन को दूसरी लाइन में भेज दिया गया। या ब्रांच लाइन/जंक्शन में कंजेशन होने के कारण रेल को दूसरे प्वाइंट या जंक्शन से भेजा गया (इस मामले में यहां 10-20 किमी का नहीं सैकड़ों किमी का अन्तर)

रेल संचालन का तरीका कमोबेश अंग्रेजों के जमाने से एक सा चला आ रहा है, इसमें बदलाव तकनीकी का और तरीके का आया है, लेकिन मूल अभी भी वही और वैसा ही चल रहा है।

जहां पहले टेलीग्राफी/टेलीफोन, घंटी आदि से ट्रेन से आने जाने की सूचना दी जाती थी, अब इसके लिए जीपीआरएस और 4जी की तकनीक है। जिससे कि रेल के किसी स्टेशन पर आने से पहले सूचना होती है, वह कैसी ट्रेन है, मेल, एक्सप्रेस विशेष, वीआईपी है, उसे रोकना है या सीधे जाने देना है, यह सब पहले से तय होता है। इसमें बदलाव का अधिकार रेल क्रू तो छोड़िए उस स्टेशन के स्टेशन मास्टर के पास भी नहीं होता। 

वह रेल जब स्टेशन पर आती है तो उसके आने का और जाने का समय लिखा जाता है। सूत्रों के अनुसार श्रमिक स्पेशल का, पूरा ब्योरा रेल के कंट्रोल रूम से ट्रेन के रूट के स्टेशनों को भेजा गया था, जिन स्टेशनों पर इन ट्रेनों से प्रवासी उतरने थे या जहां प्रवासी यात्रियों को खाना पानी देना था, उन स्टेशनों को विशेष निर्देश थे। जहां ट्रेन को रोककर खाना दिया गया या क्रू बदलने पर क्रू केबिन को सेनेटाइज किया गया था, जिसके बाद उन्हें रवाना कर दिया गया। जिन स्टेशनों पर प्रवासी यात्रियों को नहीं उतरना था, वहां के स्टेशनों को अपने आउटर सिग्नल डाउन रखकर ट्रेन को थ्रू निकालने को कहा गया था।

ऐसे में ट्रेन के भटकने का प्रश्न ही नहीं होता, यह बहाना कि निर्धारित ट्रेन न होने से स्टाफ (स्टेशन मास्टर और केबिन स्टाफ) ने किसी भ्रमवश आगे वाली ट्रेन के साथ पिछली ट्रेन को भी उसी लाइन में भेज दिया, मूर्खतापूर्ण है। 

ऐसा होना इसलिए भी असम्भव है कि हर ट्रेन का अलग नम्बर होता है और उसके लिए कंट्रोल रूम को अलग से निर्देश आता है, यहां तक कि उसको लाइन क्लियर देने का भी। फिर हर ट्रेन में जीपीआरएस सिस्टम होने के कारण रेल के कंट्रोल रूम में हर रेल अपने रूट पर चलती हुई मॉनीटर की जाती है। अब ऐसा तो नहीं हो सकता कि डिवीजन और सेन्ट्रल कंट्रोल रूम में काम करने वाले घोड़े बेच के सो गए हों और ट्रेन सैकड़ों किलोमीटर दूसरे रूट और यहां तक कि उल्टी दिशा में चली जाए।

फिर यदि ऐसी गलती हो भी जाए, तो हर रूट में 10-15 किलोमीटर पर एक छोटा और 40-50 किलोमीटर पर एक बड़ा स्टेशन आता है, कहीं कहीं 100 किमी के अन्दर जंक्शन आ जाते हैं। जहां कोई भी भी ट्रेन बिना नम्बर और कंट्रोल रूम की परमिशन के नहीं घुस सकती। यदि वहां से भी ट्रेन थ्रू निकल गई हैं, तो यह सीधे-सीधे रेलवे बोर्ड की अक्षमता, लापरवाही अथवा और बहुत कुछ 

है। क्योंकि एक स्टेशन की गलती अगले स्टेशन पर सुधारी जा सकती थी, रेल रोक कर उसका संचालन ठीक किया जा सकता था। हर छोटे से छोटे स्टेशन में कम से कम 3-4 रेल लाइन होती हैं जहां दो रेलों को खड़ा करने व एक को थ्रू पास करने (बिना स्टापेज चले जाने) की सुविधा होती है। बडे़ स्टेशनों में बहुत रेल लाइनें होती हैं। 

आश्चर्य तो इस बात पर है कि इस संकट से पहले और मोदी काल में भी यदि रेलवे स्टेशनों, व यार्डों में शंटिंग करते समय रेल रैक गलत लाइन पर चले जाएं, या एक पहिया गलत लाइन पर चढ़ जाए तो संबंधित अमले पर तुरंत कार्रवाई होती थी, जो कि एक सामान्य प्रक्रिया है। 

लेकिन 40 से अधिक ट्रेनों के भटकने और उससे हुई भारी परेशानी व यात्रियों की असामयिक मौतों के बाद भी किसी कर्मचारी अधिकारी पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है। 

यदि यह गलती स्थानीय स्तर पर हुई होती तो अभी तक सैकड़ों कर्मचारियों की नौकरी पर बन आती, लेकिन ऐसी कोई खबर अभी तक नहीं आई, जिससे यह आशंका होती है कि इन श्रमिक ट्रेनों को जान बूझकर भटकाने के लिए जिम्मेदार कंट्रोल रूमों से भी ऊपर कई शक्तियां थीं। 

यह वही शक्तियां हो सकती हैं जिन्होंने कर्नाटक और गुजरात में मजदूरों की घर वापसी में हर सम्भव अड़चनें लगाई थीं। बस इसमें रेल कर्मचारी निरपेक्ष हो गए थे।

 यह निरपेक्षता अहम के रूप में मोदी युग में सरकार ने कर्मचारियों में भर दी है कि वह जिस संस्थान में काम करते हैं उस रेल की आय यात्रियों को दिए किराए से नहीं होती उनकी तनख्वाह सरकार दे रही हैं, जिसके लिए रेलवे स्टेशनों में जगह जगह बोर्ड लगा गए है, जिसमें यात्रियों को सचेत किया जाता कि यात्रियों के द्वारा दिए जा रहे किराए से रेल का मात्र 57% खर्चा निकलता है। 

इसका असर यह हुआ है कि रेल कर्मचारी यात्री सेवा को कम महत्व देने लगा है, हालांकि यह भावना पहले ही थी परन्तु लालू काल में यह न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई थी। 

इसका कुप्रभाव ऐसे संक्रमण काल में प्रवासी यात्रियों को भी झेलना पड़ा है । यही बिंदु रेल को निजीकरण की ओर लेजाने में सरकार का सहायक हो रहा है। 

भारतीय रेल का बड़ा शानदार गौरवशाली इतिहास रहा है,  दुख है कि कोरोना के आपातकालीन दौर में जब रेल पर बडी जिम्मेदारी थी वह अनेक प्रकार की त्रासदी की जिम्मेदार और हिस्सेदार बन गई है। और मैं जब अपने शेष जीवन में रेल का सफर करूंगा तो मुझे यह सब बार बार याद आएगा। 

(इस्लाम हुसैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और काठगोदाम में रहते हैं।)

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