Saturday, October 23, 2021

Add News

लाख टके का सवाल! कौन होगा जदयू का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष?

ज़रूर पढ़े

इन दिनों जदयू के भीतर भारी गहमा-गहमी है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा। जिन नामों की चर्चा है, उनमें उपेंद्र कुशवाहा का नाम सबसे आगे है। वैसे जदयू के भीतर चार विकल्पों पर चर्चा हो रही है। पहला, उपेंद्र कुशवाहा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे। दूसरा ललन सिंह होंगे। तीसरा आरसीपी सिंह अध्यक्ष बने रहें और चौथा खुद नीतीश कुमार राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद फिर से संभालें।

यहां यह ध्यान देना जरूरी है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला कोई तात्कालिक और रूटीन कार्य है या यह भविष्य की राजनीति को देखते हुए तय होगा।

जदयू के भीतर राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला इस बार तात्कालिक और रूटीन कार्य नहीं हो सकता। 2010 और 2021 में बड़ा फर्क आ गया है। तब जदयू-भाजपा गठबंधन में जदयू की हैसियत बड़े भाई की थी। नीतीश कुमार के सामने भाजपा से कोई प्रत्यक्ष चुनौती नहीं थी। तब यह रूटीन कार्य हुआ करता था। आज स्थितियां बदल चुकी हैं।

2020 विधानसभा चुनाव में जदयू को सिर्फ 43 सीटें मिलीं, जबकि भाजपा को 74 सीटों पर जीत मिली। इसके बाद भाजपा ने नीतीश की इच्छा के विपरीत कई फैसले लिये। नीतीश भाजपा के दबाव को कम करना चाहते थे, इसी उद्देश्य से बसपा के जमा खान सहित कुछ निर्दलीय को पार्टी में शामिल कराया गया। लेकिन उन्हें सबसे बड़ी राहत बंगाल में भाजपा की हार और लोजपा को तोड़कर मिली। इसके बावजूद भाजपा रह-रह कर उन्हें मुश्किल में डाल देती है। नीतीश जानते हैं कि वे भाजपा की मजबूरी बन गए हैं। भाजपा एक सीमा से आगे उनके खिलाफ नहीं जा सकती।

तात्कालिक तौर पर नीतीश कुमार भले ही सुरक्षित हों, पर उन्हें मालूम है कि अगर 2024 से पहले उन्होंने अपनी स्थिति मजबूत नहीं की, तो लोकसभा चुनाव में उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। नीतीश की नजर पूरी तरह 2024 पर है। इसीलिए समता पार्टी में साथ रहे और बाद में धुर विरोधी रहे रालोसपा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में शामिल कराया। उन्हें एमएलसी बनाया गया। सबसे बढ़कर उन्हें पार्टी संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। फिलहाल कुशवाहा बिहार दौरे पर हैं। वे गांव-गांव में पार्टी कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं। हर जिले की बैठक को संबोधित कर रहे हैं। अब उनकी यात्रा का स्वागत करने बड़े नेता भी आ रहे हैं। रोहतास में पूर्व मंत्री जयकुमार सिंह ने उनका स्वागत किया। कुशवाहा उन कार्यकर्ताओं के परिवार से भी मिल रहे हैं, जिनके घर कोरोना के कारण किसी का निधन हुआ। उनके कार्यक्रम में जिले के प्रमुख कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं। अमूमन इस तरह का दौरा पार्टी अध्यक्ष करते हैं, लेकिन यह काम कुशवाहा कर रहे हैं। यह भी ध्यान देने की बात है कि फिलहाल कोई चुनाव नहीं है, पार्टी का कोई बड़ा अभियान नहीं है। जाहिर है उपेंद्र कुशवाहा की यात्रा पार्टी में स्वीकार्यता के लिए आयोजित की गई है, ताकि कल उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाए, तो यह स्वाभाविक लगे।

उपेंद्र कुशवाहा 2020 के विधानसभा चुनाव में कुछ खास नहीं कर सके। उनकी पार्टी रालोसपा ने 99 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन जीत एक भी नहीं मिली। 94 सीटों पर जमानत जब्त हो गई। पार्टी को महज 1.77 प्रतिशत वोट मिले। उपेंद्र कुशवाहा के लिए एनडीए में जगह नहीं थी। नीतीश भी अपना आधार विस्तार करने को बेताब हैं और कुशवाहा भी नई जमीन तलाश रहे थे। दोनों के बीच एकता हुई।

नीतीश को मालूम है कि भले ही उपेंद्र कुशवाहा विधानसभा चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सके, लेकिन कुशवाहा समाज में उनकी प्रतिष्ठा है। पहचान है। 2014 लोकसभा चुनाव में रालोसपा तीन सीटों पर चुनाव लड़ी और तीनों जीती थी। अगर कुशवाहा को आगे बढ़ाया जाए, तो इस समाज का बड़ा हिस्सा जदयू के साथ जुड़ सकता है। पिछड़ी जाति में यादव के बाद सबसे अधिक आबादी कुशवाहा की ही है। जदयू से पहले समता पार्टी के काल में पार्टी का मुख्य आधार लव-कुश अर्थात कुर्मी-कुशवाहा समीकरण था। इसके साथ ही भूमिहारों और राजपूतों के कई जाने-पहचाने चेहरे थे। अतिपिछड़ों का समूह था।

नीतीश अगर उपेंद्र कुशवाहा को इतना आगे बढ़ा रहे हैं, तो यह यूं ही नहीं है।

2024 लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी के आधार विस्तार के साथ राजनीति में अलग पहचान भी उन्हें कायम करना होगा। विधानसभा चुनाव में यह देखा गया कि जदयू प्रत्याशी भी नीतीश के पोस्टर से ज्यादा प्रधानमंत्री मोदी के पोस्टर लगा कर प्रचार कर रहे थे। जदयू के समर्थक पर भाजपा का वैचारिक प्रभाव बढ़ा है। पार्टी की अलग पहचान बनाने में भी कुशवाहा ज्यादा कारगर होंगे। अपनी बिहार यात्रा के लिए सासाराम प्रस्थान करने से पहले उन्होंने पत्रकारों से कहा कि जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए। इसके पक्ष में उन्होंने तर्क भी दिए। उसी दिन भाजपा के नेता कह चुके थे कि जाति आधारित जनगणना नहीं होगी। कुशवाहा समाजवादी पृष्ठभूमि से रहे हैं।

उधर, आरसीपी सिंह की छवि भाजपा के करीबी नेताओं की रही है। वे पार्टी की अलग छवि नहीं बना सकते। आरसीपी सिंह आईएएस अधिकारी रहे हैं। इसलिए उनके काम करने का तरीका किसी जन नेता से सर्वथा भिन्न है। ललन सिंह भी जन नेता नहीं रहे हैं। उन्हें राष्ट्रीय़ अध्यक्ष बना कर भूमिहारों में सिर्फ संदेश दिया जा सकता है, पार्टी का जनाधार नहीं बढ़ेगा। उपेंद्र कुशवाहा के अलावा कोई दूसरा नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकता है, लेकिन ऐसा तभी होगा, जब उपेंद्र कुशवाहा के नाम पर सहमति बिल्कुल ही न बन पाए। वैसी स्थिति में कोई तात्कालिक व्यवस्था की जा सकती है। ज्यादा संभावना इस बात की ही है कि पार्टी उपेंद्र कुशवाहा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए, ताकि 2024 में वह बड़े भाई की तरह हिस्सेदारी न हासिल कर सकें, तो कम-से-कम बराबर की हिस्सेदारी का दावा जरूर कर सके। अब सबकी नजर 31 जुलाई को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर है।

(कुमार अनिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल पटना में रहते हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

अडानी-भूपेश बघेल की मिलीभगत का एक और नमूना, कानून की धज्जियां उड़ाकर परसा कोल ब्लॉक को दी गई वन स्वीकृति

रायपुर। हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित परसा ओपन कास्ट कोयला खदान परियोजना को दिनांक 21 अक्टूबर, 2021 को केन्द्रीय...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -