Friday, March 1, 2024

नेहरू से आरएसएस-बीजेपी का तो ठीक है लेकिन ‘आज तक’ को क्यों है एलर्जी?

आज तक की श्वेता सिंह आप को याद है, वही एंकर जिसने भारतीय मुद्रा 2000 रुपए के नोट को लेकर एक अफवाह फैलाई थी कि उसमें एक इलेक्ट्रॉनिक चिप है जो नोट लोकेशन बता देगी ? होना तो यह चाहिए था कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) और सरकार, भारतीय मुद्रा के बारे में, इस प्रकार की, अफवाह फैलाने के बारे में, ‘आजतक’ और ‘जी न्यूज’ के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करते, पर अफवाह के ही दम पर सत्ता में आने वाले लोग, अफवाह के खिलाफ क्यों और कैसे करते! 

उसी ‘आज तक’ की श्वेता सिंह ने आज़ादी पर बनाए एक कार्यक्रम में जिसमें जवाहरलाल नेहरू संसद के ऊपर टेरेस में आज़ादी का जश्न मना रहे हैं, लोगों का अभिवादन स्वीकार कर रहे हैं, के दृश्य हैं। लोग उमड़ पड़े हैं और एक नई सुबह का आगाज हो रहा है। नेहरू ने इसे ट्रिस्ट विद डेस्टिनी कहा था, यानी नियति से साक्षात्कार। 

यह भी एक सुखद संयोग ही है कि, जिस, इंडियन नेशनल कांग्रेस ने, जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में, 30 दिसंबर 1929 को पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित कर, अपने लक्ष्य की घोषणा कर दी थी, वही जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में आजादी के इस उत्सव में जनता के साथ शामिल हैं। 

श्वेता सिंह, उस वीडियो की क्लिपिंग दिखाती हैं और खुद को एक ऐसी जगह खड़ा कर लेती हैं जहां से, सब दिख रहे हैं, बस नेहरू नहीं दिख रहे हैं। बिल्कुल, अस्तित्वहीन राहु की तरह, जो सूर्य को ढंक कर ग्रहण का श्रेय ले लेता है। जब यह प्रोमो जारी हुआ तो, इसकी बेहद विपरीत प्रतिक्रिया भी होनी थी और हुई भी। जब आलोचना और लानत-मलामत का दौर चला तो, श्वेता सिंह ने उसे हटा दिया और फिर जो फिल्म चलने लगी, उसमें नेहरू दिखने लगे। 

नेहरू को लेकर, आरएसएस और बीजेपी की अपनी सोच है और नेहरू से उनका विरोध लंबे समय से रहा है। पर आज तक आरएसएस या बीजेपी का कोई सिद्धांतकार नेहरू की वैचारिकी का विरोध नहीं करता है, वह उन पर निजी हमले करता है। कभी वह नेहरू के परिवार को, किसी गयासुद्दीन का वंशज बताता है, तो कभी, उनसे एडविना माउंटबेटन के साथ , उनके संबंधों के बारे में, अपनी सोच से चर्चा करता है। अब न वे गयासुद्दीन की चर्चा करते हैं, और एडविना की। क्योंकि गयासुद्दीन कोई था ही नहीं और नेहरू एडविना संबंधों पर अब लोग ध्यान भी नहीं देते। 

इस गोयबेल ब्रांड दुष्प्रचार का एक लाभ यह हुआ कि, जिस नेहरू को नई पीढ़ी ने भुला दिया था, उसे इनके बारे में उत्कंठा हुई और नेहरू की लिखी और नेहरू पर लिखी किताबें ढूंढी जाने और पढ़ी जानें लगीं। फिर राहु हटा और सूर्य की आभा पुनः फैलने लगी। आरएसएस और बीजेपी की यह वैचारिक दरिद्रता है कि, उनके किसी सिद्धांतकार/विचारक/प्रचारक ने नेहरू की विचारधारा, उनकी नीतियों पर कोई ऐसी किताब नहीं लिखी, जो चर्चा में आई हो। 

आरएसएस/बीजेपी तो गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष, भगत सिंह आदि की विचारधाराओं के खिलाफ, अपने जन्म से ही है। गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष और भगत सिंह सभी अपनी अलग-अलग रणनीति और सोच के बावजूद इस एक बात पर सहमत थे कि, देश से ब्रिटिश राज खत्म हो, और देश का मूल स्वरूप, बहुलतावाद, और सेक्युलर चरित्र बना रहे। जब कि आरएसएस, देश के मूल स्वरूप बहुलतावाद और सेक्युलर मूल्यों के खिलाफ तब भी था और अब भी है। 

आरएसएस/बीजेपी की अपनी विचारधारा है, और उन्हें भी एक आजाद देश में अपनी सोच रखने का पूरा हक है। पर इतिहास को, विकृत करके, नेहरू को जानबूझकर नजरअंदाज करके, भारतीय मुद्रा का अपमान करते हुए उसके बारे में अफवाह फैलाने के बारे में, आज तक का क्या उद्देश्य है ? 

न तो यह पत्रकारिता है और न ही इतिहास का पुनर्पाठ, यह केवल और केवल गोयबेल ब्रांड दुष्प्रचार है और ऐसे दुर्भावना से भरे मिथ्या प्रचार के इस सबसे तेज चाटुकार और चाटुकारिता को रखे सबसे आगे वाले चैनल, आज तक का विरोध किया जाना चाहिए। 

एक बात और, नेहरू न केवल देश के प्रथम प्रधानमंत्री ही रहे हैं, बल्कि देश के आर्थिकी और विकास की नींव भी उन्होंने रखी है। यह अलग बात है कि आज नेहरू द्वारा बनाई संस्थाएं, धीरे-धीरे नष्ट की जा रही हैं, और सार्वजनिक उपक्रम, आदि को बेच कर सरकार अपना खर्चा चला रही है। 

‘आज तक’ यदि नेहरू की कमियां ही उजागर करना चाहता है तो, उसे नेहरू के योगदान और उनकी कमियों पर एक लम्बा सेमिनार लाइव दिखाना चाहिए, जिसमें आरएसएस/बीजेपी के भी विचारक प्रचारक हों, गांधी नेहरू परंपरा के चिंतक भी और अकादमिक विद्वान और लेखक भी हों। श्वेता सिंह ब्रांड की तरह इस छिछोरे मॉडल से नेहरू और खुल कर प्रासंगिक होंगे न कि, नेपथ्य में चले जायेंगे। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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