जाति जनगणना आखिर क्यों है जरूरी

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व कद्दावर समाजवादी नेता लालू प्रसाद यादव ने जातिगत जनगणना को लेकर एक ट्वीट किया जो सियासी गलियारे में चर्चा का विषय बना हुआ है। लालू यादव ने अपने ट्वीट में लिखा, “अगर 2021 जनगणना में जातियों की गणना नहीं होगी तो बिहार के अलावा देश के सभी पिछड़े-अति पिछड़ों के साथ दलित और अल्पसंख्यक भी गणना का बहिष्कार कर सकते हैं। जनगणना के जिन आँकड़ों से देश की बहुसंख्यक आबादी का भला नहीं होता हो, तो फिर जानवरों की गणना वाले आँकड़ों का क्या हम अचार डालेंगे?”

जातिगत जनगणना को लेकर वर्तमान समय में बीजेपी और संघ का रुख बिल्कुल नकारात्मक और लीपापोती का है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने 20 जुलाई 2021 को लोकसभा में दिए जवाब में कहा कि, “फ़िलहाल केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा किसी और जाति की गिनती का कोई आदेश नहीं दिया है। पिछली बार की तरह ही इस बार भी एससी और एसटी को ही जनगणना में शामिल किया गया है।”

सवाल उठता है कि आखिर जाति आधारित जनगणना का इतना विरोध क्यों ? जातिगत जनगणना को नहीं कराने के पीछे की षड्यंत्रकारी सोच क्या हैं ? आख़िर वे कौन से लोग हैं जो इसका विरोध कर रहे हैं और क्यों? आख़िर बहुसंख्यक आबादी के हक़ को छीनकर कब तक चन्द वर्चस्वशाली वर्ग को प्रदान किया जाता रहेगा?

सवाल अनेक हैं और इसके उत्तर वर्तमान सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था की अहम जरूरत हैं। लेकिन दुर्भाग्य कि सरकार अपने दायित्व के निर्वहन के बदले पलायनवादी रवैया अपना रही है।

ऐसा नहीं है कि जाति आधारित जनगणना कोई नवीन मांग है। कई दशकों से जाति आधारित जनगणना की मांग की जाती रही है। केंद्र में जब पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार जनता पार्टी की अगुवाई में बनी तो बीपी मण्डल की अध्यक्षता में एक आयोग (मंडल आयोग) का गठन किया गया मंडल आयोग के समय भी यह माँग जोरों से उठी थी। मंडल आयोग ने अपने सिफारिश में भी यह कहा कि रिपोर्ट तैयार करते हुए काफी मुश्किलें आईं क्योंकि भारत में ओबीसी के बारे में उनके पास कोई प्राथमिक और प्रामाणिक आंकड़ा ही नहीं है। मंडल आयोग की सिफ़ारिश के आधार पर ही जनसंख्या में भागीदारी के आधार पर ओबीसी जातियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई।  ये जनसंख्या 1931 में हुई जातिगत जनगणना में सामने आई थी। 1931 के बाद  1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया गया, लेकिन उसे प्रकाशित नहीं किया गया। 1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) का आंकड़ा तो दिया गया, लेकिन ओबीसी (Other Backward Class) और दूसरी जातियों का आंकड़ा नहीं दिया गया। यूपीए 2 के शासनकाल में भी 2010 में जातिगत जनगणना का वायदा किया गया लेकिन 2011 की जनगणना में इसे अमल में नहीं लाया गया।

आज तक बहुसंख्यक ओबीसी वर्ग को उचित भागीदारी नहीं मिली। और अगर इस वर्ग की सही भागीदारी सुनिश्चित करना है या ओबीसी समूह के लिए कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण व क्रियान्वयन करना है तो इसके लिए इनकी गिनती बहुत ही ज्यादा आवश्यक है। ऐसे में  लालू प्रसाद यादव के द्वारा इस आवश्यक मुद्दे को उठाना एक नए समतामूलक राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था के नवीन युग के आगमन की आहट है। पिछड़ों और शोषितों के हक-हुकूक के लिए हमेशा से सड़क से लेकर सदन कर संघर्ष करने वाले लालू प्रसाद यादव एक बार फिर से युवा तेवर में दिख रहे हैं जिसने सत्ताधारी दल की चिंता को बढ़ा दिया है।

अब तो सत्ताधारी एनडीए खेमे से भी जातिगत जनगणना को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू की करारी हार के बाद से अपने परंपरागत वोटबैंक को समेटने में जुटे हुए हैं। ऐसे में जातिगत जनगणना को समर्थन देना नीतीश कुमार की राजनैतिक मजबूरी भी है। यही कारण है कि पिछले दिनों नीतीश कुमार ने भी जातिगत जनगणना के पक्ष में सहमति जताई। और जाति आधरित जनगणना की मांग उठाई और इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भी लिखा।

मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार और नीट परीक्षा के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण देने के बाद बीजेपी खुद को ओबीसी समुदाय की हिमायती बताने का ढिंढोरा पीटती रही है लेकिन जातिगत जनगणना के नाम पर भड़क उठती है, यह बीजेपी के दोहरे चरित्र को उजागर करती है। जातिगत जनगणना के बाद निश्चित रूप से ओबीसी समुदाय की उचित भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का दबाव बीजेपी सरकार पर बढ़ेगा और 50% आरक्षण के कोटे पर नए सिरे से विचार की भी जरूरत पड़ेगी। वैसे भी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग उठती रही है और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का नारा बुलंद किया जाता रहा है।

अब जबकि ओबीसी आरक्षण संशोधन विधेयक (127 वां संविधान संशोधन विधेयक) सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया है और इस विधेयक के पारित होने के बाद राज्यों को अपनी तरह से ओबीसी की लिस्ट बनाने का अधिकार होगा, ऐसे में जातिगत जनगणना नहीं कराने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। इस बिल पर चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद संघमित्रा मौर्य ने भी जाति आधरित जनगणना की मांग का समर्थन कर सरकार को हैरानी में डाल दिया। बीजेपी सांसद संघमित्रा मौर्य ने कहा कि, “वर्ष 1931 में जब जातिगत जनगणना हुई थी, तब देश में 52 फीसदी ओबीसी थे। लेकिन अब किसी को कोई नंबर की जानकारी ही नहीं है, ऐसे में अगर जातिगत जनगणना होती है तो ओबीसी समुदाय को सरकारों की योजनाओं का लाभ मिलेगा।” विदित हो कि 5 मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर पुनर्विचार की एक याचिका पर सुनवाई करने की मांग खारिज करते हुए कहा था कि, “102 वें संविधान संशोधन के बाद OBC लिस्ट जारी करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।”

OBC आरक्षण संशोधन विधेयक के पारित होने के बाद अब जो स्थिति बनती है वो बहुत ही असमंजस में डालने वाली है। इससे कई राज्यों में वर्चस्वशाली अगड़ी जातियों को भी ज़बरन ओबीसी की लिस्ट में डालकर वास्तविक ओबीसी समूह के हितों को नकुसान पहुंचाने का कार्य आसान हो जाएगा। इसलिए संभावित भेदभाव को रोकने के लिए भी जाति आधारित जनगणना आवश्यक हो गई है।

सरकार ओबीसी समूह के उप-वर्गीकरण के लिए पहले से ही अनुच्छेद 340 के तहत अक्टूबर 2017 में रोहिणी आयोग का गठन कर चुकी है। रोहिणी आयोग के कार्यकाल को बार-बार बढ़ाया जाता रहा है। उप-श्रेणीकरण के पीछे यह तर्क दिया जाता रहा है कि OBC की केंद्रीय सूची में शामिल कुछ ही संपन्न समुदायों को 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ प्राप्त होता है। ऐसे में अब अगर राज्यों के द्वारा इस लिस्ट में और वर्चस्वशाली जातियों को शामिल कर दिया जाता है तो समस्या और बढ़ जाएगी। ओबीसी समूह के जातियों का उप-श्रेणीकरण का कार्य करना है तो विभिन्न जातियों की गणना किए बगैर यह कार्य निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ढंग से नहीं किया जा सकता है।

वर्ष 2010 में संसद में बीजेपी के नेता गोपीनाथ मुंडे ने 2011 की जनगणना को लेकर कहा था, “अगर इस बार भी जनगणना में हम ओबीसी की जनगणना नहीं करेंगे, तो ओबीसी को सामाजिक न्याय देने के लिए और 10 साल और पीछे चलें जायेंगे जो इस समुदाय के साथ अन्याय होगा।” लेकिन अब जब बीजेपी की सरकार केंद्र में है तो वह अपने ही वायदे से मुकर रही है। समय-समय पर बीजेपी ओबीसी समुदाय के हितों का स्वांग रचकर चुनावी फायदा उठाती रही है लेकिन कार्य के नाम पर ओबीसी समूह को केवल झुनझुना थमाती रही हैं। यह बात किसी से छिपी नही है कि बीजेपी का जन्म आरएसएस की जिस विचारधारा से हुआ है वह मूलतः समाजवाद विरोधी सामंती मनुवादी सवर्णों के तुष्टीकरण पर आधारित है। जिनकी आस्था न समाजवाद में रही है न देश के संविधान में रही है।

2019 में जब संसद में 124 वें संविधान संशोधन विधेयक के जरिये  15% सवर्णों के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया तो इस बिल के विरोध में मात्र 10 वोट (लोकसभा में 3 वोट और राज्यसभा में 7 वोट) पड़े थे। उस समय भी इस बिल का खुले रूप में विरोध करने वाली मुख्य पार्टी राजद ही थी।

वर्ष 2011 में जब ग्रामीण विकास मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय के अधीन सोशियो इकोनॉमिक कास्ट सेंसस (Socio Economic and Caste Census- SECC) आधारित डेटा जुटाया था तो इस समय भी यूपीए सरकार ने यह फैसला राजद अध्यक्ष लालू यादव यादव और समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के दबाव में ही लिया था। हालांकि उस समय भी जाति आधारित आंकड़े प्रकाशित नहीं किए गए।

अब एक बार फिर से लालू प्रसाद यादव ने जाति आधारित जनगणना की मांग को लेकर संघर्ष का ऐलान कर दिया है। ऐसे में सरकार की राह आसान नहीं होगी और यूपी विधानसभा चुनाव में ही इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है। इतना तो तय है कि लोक कल्याणकारी समतामूलक समाजिक व्यवस्था को स्थापित करने के लिए जाति आधारित जनगणना समय की मांग है, इससे भागना ओबीसी वर्ग के साथ अन्याय होगा। जाति आधारित जनगणना को लेकर पहले कांग्रेस और अब बीजेपी ऐतिहासिक भूल करने जा रही है।

(दया नन्द स्वतंत्र लेखक हैं और आजकल बिहार में रहते हैं।)

  

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