Tuesday, October 4, 2022

आखिर सच से इतना खौफ क्यों खाती है सत्ता?

ज़रूर पढ़े

अभिव्यक्ति के विरोधियों की भावनाएं बड़ी जल्दी-जल्दी आहत होने लगती हैं और उन्हें अभिव्यक्ति की हर आज़ादी, देश के मौलिक अधिकारों के दुरुपयोग और देशद्रोह के रूप में नज़र आने लगता है। जिन्हें कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस और डोमिनियन स्टेटस, सम्प्रभुता की बारीकियां नहीं मालूम हैं, जिन्होंने अपने जन्म से लेकर आज तक साम्राज्यवादी गोरे प्रभुओं के खिलाफ कभी एक शब्द भी नहीं कहा, जिन्हें 2014 के पहले का देश आदिम युग का नज़र आता है, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम के महानायकों, गांधी, भगत सिंह, सुभाष, नेहरू, पटेल, आज़ाद, आदि के लिए एक बार भी प्रशंसात्मक बातें नहीं कहीं, उन्हें हर उस हास्य कलाकार की बात पर चिढ़ मचती है जो, सच और खरा है। चाहे वह स्टैंड अप कॉमेडियन कुणाल कामरा हों या श्याम रंगीला या अब एक और नाम सामने आया है वीर दास का।

व्यंग्य लिखना आसान नहीं होता है और उसे नजरअंदाज करना तो और भी मुश्किल। गम्भीर और तथ्यात्मक लेख तो, दिमाग के रास्ते धीरे धीरे अंदर रिसते हुए पैठते हैं पर व्यंग्य, तीर ए नीमकश की तरह, न जिगर के पार होता हैं, और न ही उनका दर्द भूलता है। सत्ता जब लोकतंत्र की राह छोड़ कर फासिस्ट बनने की ओर अग्रसर होने लगती है तो वह, अपने भक्तों की भीड़ में खड़े एक भी व्यक्ति की तंजिया मुस्कान से असहज हो जाती है और उसके पांव अंदर से डगमगाने लगते हैं।

जब चार्ली चैप्लिन ने डिक्टेटर फ़िल्म बनाई तो लोगों ने कहा कि, यह हिटलर को नाराज़ कर देगी। पर चार्ली ने उसे रिलीज किया और उस फिल्म के अंतिम हिस्से में उनके भाषण ने युद्ध के दुष्परिणामों और सत्ता के अहंकार का, जिस खूबसूरती, साफगोई और दृढ़ता से दिग्दर्शन कराया है वह चार्ली को अकेले बीसवीं सदी का महानतम फिल्मकार घोषित करने के लिये पर्याप्त है। हिटलर ने जब फ़िल्म की चर्चा सुनी तो, उसने इसे चार्ली के साथ ही देखने की इच्छा व्यक्त की। पर ऐसा न हो सका। कहते हैं, हिटलर ने फ़िल्म को एकांत में देखा और अंत मे उस भाषण पर वह फूट फूट कर रोया। पर उसके यह आंसू भी उसका अहंकार और दम्भ नहीं बहा सके और वह अंत मे पराजित हुआ, और उसने आत्महत्या कर के जान दे दी।

द डिक्टेटर फ़िल्म, चार्ली और हिटलर का उल्लेख केवल इसलिए कि सत्ता व्यंग्यकारों और कॉमेडियन से भी बेतरह खौफजदा रहती है, वह सहज भाव से न तो अपनी आलोचना ग्रहण करती है, न मज़ाक़ और न ही खिलखिलाहट। उसका गाम्भीर्य, सौम्य नहीं होता है वह ओढ़ा हुआ कर्कश होता है।

आज कल एक और स्टैंड अप कॉमेडियन की कविता और वीडियो चर्चा में है। यह हैं वीर दास। वीर दास के स्टैंडअप कॉमेडी शोज दुनिया भर में खासे लोकप्रिय हैं। वे कॉमेडियन के साथ, एक्टर भी हैं। उन्होंने ‘गो गोवा गॉन’, ‘बदमाश कंपनी’, कंगना रनौत के साथ रिवॉल्वर रानी, डेली बेली जैसी फिल्में की हैं। वीर दास का जन्म 31 मई, 1979 को देहरादून में हुआ था।

वीर दास ने सोमवार को अपने यूट्यूब चैनल पर 6 मिनट का एक वीडियो शेयर किया। जो अमेरिका में वॉशिंगटन डीसी के जॉन एफ़ कैनेडी सेंटर में हुए उनके एक शो का है। इस कॉमेडी शो में वीर दास ने एक मोनोलॉग पढ़ा, जिसका शीर्षक है – ‘आई कम फ्रॉम टू इंडियाज़’ यानी मैं दो भारत से आता हूँ। इस वीडियो में उन्होंने भारत के विरोधाभासों को रखा है। यह वीडियो रिलीज होते ही केवल चंद घंटों के भीतर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और इसके पक्ष और विपक्ष में तरह तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कई लोगों ने, खुल कर अपनी बात कहने के लिए वीर दास की प्रशंसा की तो कई लोगों ने उनके इस शो को देश का अपमान कहा। कुछ लोग तो, उन पर भारत की छवि वैश्विक स्तर पर ख़राब करने का आरोप लगाते हुए उनकी जमकर आलोचना कर रहे हैं।

आशुतोष दुबे नाम के एक शख़्स ने वीरदास के ख़िलाफ़ मुंबई पुलिस को एक लिखित शिकायत दी है, जिसमें, वीरदास के ऊपर, भारत के ख़िलाफ़ अभद्र टिप्पणी करने का आरोप लगाया है। आशुतोष दुबे के अनुसार, वीर दास ने ऐसे बयान दिए हैं, जिससे प्रतीत होता है कि भारत का लोकतंत्र ख़तरे में है जो कि एक निराधार आरोप है।

मुंबई के बाद, दिल्ली के तिलक मार्ग थाने पर भी वीर दास के ख़िलाफ़ एक  शिकायत दर्ज की गई है जो, आदित्य झा नाम के एक व्यक्ति ने दर्ज कराई है। इसमें भी यह आरोप लगाया गया है कि, अमेरिका में आयोजित एक कार्यक्रम में कॉमेडियन ने देश के खिलाफ़ अभद्र टिप्पणी की है।

अब वीर दास की यह कविता पढ़िये, जो उनके वीडियो में है।

‘मैं दो भारत से आता हूँ’

मैं एक उस भारत से आता हूँ, जहाँ बच्चे एक दूसरे का हाथ भी मास्क पहन कर पकड़ते हैं, लेकिन नेता बिना मास्क एक-दूसरे को गले लगाते हैं।

मैं उस भारत से आता हूँ, जहाँ एक्यूआई 9000 है लेकिन हम फिर भी अपनी छतों पर लेटकर रात में तारे देखते हैं।

मैं उस भारत से आता हूँ, जहाँ हम दिन में औरतों की पूजा करते हैं और रात में उनका गैंगरेप हो जाता है।

मैं उस भारत से आता हूँ, जहाँ हम ट्विटर पर बॉलीवुड को लेकर बँट जाते हैं, लेकिन थियेटर के अंधेरों में बॉलीवुड के कारण एक होते हैं।

मैं एक ऐसे भारत से आता हूँ, जहाँ पत्रकारिता ख़त्म हो चुकी है, मर्द पत्रकार एक दूसरे की वाहवाही कर रहे हैं

और महिला पत्रकार सड़कों पर लैपटॉप लिए बैठी हैं, सच्चाई बता रही हैं।

मैं उस भारत से आता हूँ, जहाँ हमारी हँसी की खिलखिलाहट हमारे घर की दीवारों के बाहर तक आप सुन सकते हैं

और मैं उस भारत से भी आता हूँ, जहाँ कॉमेडी क्लब की दीवारें तोड़ दी जाती हैं, जब उसके अंदर से हंसी की आवाज़ आती है।

मैं उस भारत से आता हूँ, जहाँ बड़ी आबादी 30 साल से कम उम्र की है लेकिन हम 75 साल के नेताओं के 150 साल पुराने आइडिया सुनना बंद नहीं करते।

मैं ऐसे भारत से आता हूँ, जहाँ हमें पीएम से जुड़ी हर सूचना दी जाती है लेकिन हमें पीएमकेयर्स की कोई सूचना नहीं मिलती।

मैं ऐसे भारत से आता हूँ, जहाँ औरतें साड़ी और स्नीकर पहनती हैं और इसके बाद भी उन्हें एक बुज़ुर्ग से सलाह लेनी पड़ती है, जिसने जीवन भर साड़ी नहीं पहनी।

मैं उस भारत से आता हूँ, जहाँ हम शाकाहारी होने में गर्व महसूस करते हैं लेकिन उन्हीं किसानों को कुचल देते हैं, जो ये सब्ज़ियां उगाते हैं।

मैं उस भारत से आता हूँ, जहाँ सैनिकों को हम पूरा समर्थन देते हैं तब तक, जब तक उनकी पेंशन पर बात ना की जाए।

मैं उस भारत से आता हूँ, जो चुप नहीं बैठेगा

मैं उस भारत से आता हूँ, जो बोलेगा भी नहीं

मैं उस भारत से आता हूँ जो मुझे हमारी बुराइयों पर बात करने के लिए कोसेगा

मैं उस भारत से आता हूँ, जो लोग अपनी कमियों पर खुल कर बात करते हैं

मैं उस भारत से आता हूँ, जो ये देखेगा और कहेगा ‘ये कॉमेडी नहीं है।। जोक कहाँ है?’

और मैं उस भारत से भी आता हूँ

जो ये देखेगा और जानेगा कि ये जोक ही है। बस मज़ाकिया नहीं है।

बीबीसी की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट, कपिल सिब्बल ने वीर दास के समर्थन में एक ट्वीट किया है कि, ”वीर दास इसमें कोई शक नहीं है कि दो भारत है। हम नहीं चाहते हैं कि एक भारतीय दुनिया को इस बारे में बताए। हम असहिष्णु और पाखंडी हैं।”

लेकिन एक अन्य कांग्रेस के नेता,  अभिषेक मनु सिंघवी ने वीर दास की आलोचना करते हुए ट्वीट किया है। ”कुछ लोगों की बुराइयों को पूरे देश के संदर्भ में सामान्य बना कर पेश करना और देश को दुनिया के सामने बदनाम करना ठीक नहीं है। औपनिवेशिक शासन के दौरान जिन लोगों ने भारत को पश्चिमी दुनिया के सामने सपेरों और लुटेरों के देश के रूप में चित्रित किया, उनका अस्तित्व अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है।”

शशि थरूर ने ट्विट किया, ”एक स्टैंडअप कॉमेडियन जिसे सही मायने में ‘स्टैंड-अप’ होने का मतलब पता है, शारीरिक नहीं बल्कि नैतिकता के आधार पर खड़े होने का अर्थ जानता है। वीर दास ने लाखों लोगों की तरफ़ से बोला है। अपने 6 मिनट के वीडियो में उन्होंने दो तरह के भारत की बात की है और बताया है कि वह किस भारत के लिए खड़े हैं। ये जोक तो है लेकिन मज़ाकिया बिल्कुल नहीं है।”

इसके अतिरिक्त, स्वराज्य आन्दोलन के योगेंद्र यादव, ने कहा है, ‘जरूर सुनें, वीर दास बता रहे हैं, उन दो भारत के बारे में जहाँ के वह रहने वाले हैं, दुख की बात है कि हम एक ऐसे मुकाम पर पहुँच गए हैं, जहाँ जैसा है, वैसा कहना भी साहस का काम बन चुका है।”

वीर संघवी, ने वीर दास के पक्ष में ट्वीट किया है और कहा है, “बहादुर, दृष्टिकोण रखने वाले और प्रतिभाशाली वीर दास के साथ एकजुटता दिखाते हुए मैं इस लिंक को शेयर कर रहा हूँ।”

बीजेपी नेता प्रीति गांधी लिखती हैं, ”वीर दास ऐसे आप भारत से आते हैं, जहाँ आप अपने ही देश का अपमान करके अपनी जीविका चला रहे हैं। आप एक ऐसे भारत से आते हैं, जो आपकी घिनौनी, अपमान जनक बकवास को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में पेश करने की अनुमति देता है। आप एक ऐसे भारत से आते हैं, जिसने आपकी झूठी निंदा को लंबे समय तक सहन किया है।”

समर्थन और विरोध की तमाम प्रतिक्रियाओं के बीच वीरदास ने भी कहा है कि, ”मैंने एक वीडियो यूट्यूब पर शेयर किया है, उस पर ख़ूब प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। ये वीडियो भारत के दोहरेपन को लेकर है, दो पक्ष जो एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, जैसा कि हर देश का एक अच्छा और बुरा पक्ष होता है और ये बात रहस्य नहीं है। वीडियो हमसे अपील करता है कि हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हम महान हैं और इस बात पर कभी फ़ोकस करना बंद ना करें कि हमें क्या चीज़ महान बनाती है। वीडियो का अंत देशप्रेम से ओत-प्रोत तालियों की तेज़ गड़गड़ाहट से होती है, ये ताली उस देश के लिए है, जिसे हम सब प्यार करते हैं, जिसमें हमारा विश्वास है और जिस पर हमें गर्व है। इस वीडियो का मक़सद ये बताना है कि हेडलाइन के अलग हमारा देश बहुत कुछ है, इसकी गहराई और ख़ूबसूरती- इसीलिए लोगों ने तालियां बजाईं।

इस वीडियो के छोटे से हिस्से से आपको बरगलाया जा रहा है, ऐसा मत होने दीजिए। लोगों ने भारत के लिए चीयर किया और वो नफ़रत नहीं प्यार से भरी आवाज़ें थीं। लोगों ने सम्मान के साथ भारत के लिए तालियां बजाई ना कि द्वेष से। आप नकारात्मकता के साथ शाबाशी नहीं छिपा सकते, आपके टिकट नहीं बिक सकते। ये तभी हो सकता है, जब आपको ख़ुद पर गर्व हो। मुझे मेरे देश पर गर्व है और मैं ये गर्व अपने साथ लेकर चलता हूँ। लोगों से खचाखच भरे कमरे में अगर लोग भारत के सम्मान में खड़े होते हैं तो मेरे लिए ये पवित्र प्यार की तरह है। मैं आपसे भी वही कह रहा हूँ जो उन दर्शकों से कहा था- हमें रोशनी पर फ़ोकस करना है, हम क्यों महान हैं ये याद रखना है और लोगों में प्यार बाँटना है।”

क्या देश मे दो भारत नही हैं ? एक तरफ देश की सारी सम्पदा कुछ घरानों में सिमटती जा रही है और 80 करोड़ लोग सरकार के ही अनुसार, 5 किलो राशन पर जीवन गुजार रहे हैं क्या यह दो बंटे भारत की तस्वीर नहीं है ? अगर यह आप सोचें कि दुनिया हमारी आर्थिक स्थिति से परिचित नहीं है और हम अरबों  रुपये के विज्ञापन से देश की विपन्नता छुपा लेंगे तो, यह हमारा भ्रम है।

दुनियाभर के तमाम आर्थिकी के शोध संस्थान, चाहे वे किन्ही विश्वविद्यालयों के हों या किसी एनजीओ के वे सभी देशों की अर्थव्यवस्था और उसके सूचकांकों का अध्ययन करते रहते हैं और 2014 के बाद, साल दर साल, चाहे, वह जीडीपी हो, या हंगर इंडेक्स, या खुशी इंडेक्स या प्रेस की आज़ादी का इंडेक्स, हम गिरते ही जा रहे हैं। हम एक ऐसे आर्थिक व्यवस्था में तब्दील हो चुके हैं जो अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को निरन्तर बढ़ाती चली जा रही है। 8 हजार करोड़ का पीएम का जहाज और लॉककडाउन में सड़कों पर सैकड़ों किलोमीटर की दूरी पार करते लोग, यह जताने के लिये पर्याप्त हैं कि, इस भारत मे दो भारत हैं।

यह स्थिति आज की ही नहीं है, बल्कि लोकसभा में लोहिया ने जब 3 आना और तेरह आना की बहस शुरू की थी तो, यह स्थिति तब भी थी। आर्थिकी कुछ बेहतर होना शुरू हुयी, पर 2014 के बाद सरकार ने कुछ ऐसे फैसले लिये जिससे आर्थिक विषमता बढ़ती चली गयी। इस कविता में जो कुछ भी कहा गया है वह सच है। उसी अमेरिका की टाइम मैगजीन ने, एक लेख अपने डिवाइडर इन चीफ नाम के मुखपृष्ठ पर नरेंद्र मोदी जी की फ़ोटो के साथ छापा था, तब भी बवाल मचा था कि, यह अपमान करने और देश को नीचा दिखाने की साज़िश है। पर क्या 2014 के बाद देश मे सामाजिक ताने बाने को नुकसान नहीं पहुंचाया गया है ? और नुकसान पहुंचाने वाला समूह सरकार के साथ खड़ा भी रहता है।

ज़रूरत, ऐसे शो पर आहत होने की नहीं, आत्ममंथन करने की है कि एक ही भारत में दो परस्पर विपरीत भारत क्यों पनप रहे हैं और इस विषमता को चाहे वह आर्थिक विषमता हो, या सामाजिक, विषमता, दूर करने का क्या उपाय है और सरकार के पास, इस गहरी होती खाईं को पाटने का क्या उपाय है। बात बात पर ज़ुबानबन्दी, हक़बयाँ करते ट्वीट पर यूएपीए और देशद्रोह का मुकदमा, एक विफल गवर्नेंस और अहंकारी सत्ता का प्रतीक है, जिसका अंत भी बेहद दुःखद और दारुण होता है।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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