चुनाव में मानवाधिकार क्यों नहीं बन पाता मुद्दा ?

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इस माह भारत की मानवाधिकारों की स्थिति पर विश्व मानवाधिकार आयोग द्वारा मूल्यांकन किया जाएगा। यह मूल्यांकन भारत में मानवाधिकार आयोग की भारत में मानवाधिकारों की स्थिति पर पेश की जाने वाली रिपोर्ट के अलावा संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट और भारत में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली कुछ अन्य संस्थाओं की रिपोर्टों के आधार पर किया जाएगा। साल 2022 में और फिर 2023 में इस संस्था में पेश की गई रिपोर्टों के अनुसार भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बेशर्मीं से चुप्पी साध रखी है।

हालांकि आज़ादी के बाद भारत के पूंजीवादी शासकों ने यहां के लोगों पर अलग-अलग तरीक़ों से ज़ुल्म ढाए हैं, लेकिन साल 2014 में फासीवादी आर.एस.एस. की राजनीतिक शाखा भाजपा के सत्ता पर काबिज़ होने के बाद लोगों के सीमित जनवादी अधिकारों को भी और तेज़ी से छीना जा रहा है। देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी का पूरी तरह से गला घोंटने की कोशिश की जा रही है। सरकार के ख़ि‍लाफ़ उठने वाली किसी भी तरह की जायज़ आवाज़ को देशद्रोही घोषित कर जेल में ठूंसने के कई मामले सामने आए हैं।        

क्रांतिकारियों, जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों,पत्रकारों समेत अल्पसंख्यक भाईचारे जैसे मुस्लिम, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर दमन का कुल्हाड़ा तेज़ किया है। नागरिकता संशोधन क़ानून, देशद्रोह, यू.ए.पी.ए. जैसे काले क़ानून लोगों पर थोपे जा रहे हैं। मणिपुर में सरकारी शह पर दो समुदायों में हिंसा भड़काई जा रही है और सरेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। यह सब कुछ होने के बावज़ूद भी तथाकथित मानवाधिकार आयोग की आंखें नहीं खुलीं और लोगों के अधिकारों की सुरक्षा करना तो दूर इन मामलों की जांच तक नहीं की गई। भारत सरकार ने 1948 में संयुक्त राष्ट्र में हुए मानवाधिकार समझौते पर हस्ताक्षर किया है और भारतीय संविधान में भी इनमें कुछ अधिकार दर्ज़ हैं, लेकिन व्यवहार में कभी भी इन अधिकारों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया।

मानव इतिहास में हमेशा मानवाधिकारों की अवधारणा नहीं थी। इतिहास के एक विशेष चरण यानी सामंतवाद से पूंजीवाद में विकास के दौरान मनुष्य के कुछ ना छीने जा सकने वाले अधिकारों के संबंधित चेतना विकसित हुई। यह आवाज़ असल में उभर रहे पूंजीवादी वर्ग के हितों के अनुकूल थी। सामंती बंधनों को तोड़ने के लिए पूंजीपति वर्ग ने इतिहास में प्रगतिशील भूमिका निभाई। मानवाधिकारों को ऐतिहासिक संदर्भ में देखने से यह पता चलता है कि ये असल में विश्व दृष्टिकोण को परिभाषित करते थे।

सामंती व्यवस्था में राजा को भगवान का दूत माना जाता था। इस प्रकार समाज में लोगों पर कई तरह की पाबंदियां लगी हुई होती थीं। ये सामंती ज़ंजीरें सामंती समाज के गर्भ से पैदा हो रही पूंजीवादी व्यवस्था के विकास के रास्ते में रुकावट थीं। सामंती वर्गों के विशेष अधिकारों को ख़त्म करने के लिए सभी मनुष्यों के समान होने और प्रकृति द्वारा केवल मनुष्य होने के नाम पर मिलने वाले अधिकारों की अवधारणा विकसित हुई।

उभर रहे पूंजीवादी वर्ग के विद्वानों ने इस चेतना के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पूंजीवाद को अपनी आर्थिक ज़रूरतें पूरी करने के लिए सामंती बंधनों से आज़ाद मनुष्य की ज़रूरत थी, भले ही पूंजीपति के लिए आज़ादी का असल अर्थ मज़दूरों को अपनी श्रमशक्ति बेचने की आज़ादी था। सामंती समाज में राजा के ख़ि‍लाफ़ किसी भी तरह के विचार व्यक्त करने की सख़्त मनाही थी, इसलिए इसके ख़ि‍लाफ़ अभिव्यक्ति की आज़ादी की अवधारणा उभरी। इन अधिकारों में पूंजीपति वर्ग के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र अधिकार था, वह था निजी संपत्ति का अधिकार।

महान फ्रांसीसी बुर्जुआ क्रांति के बाद बने संविधान में इन अधिकारों को कानूनी तौर पर मान्यता मिली,लेकिन एक बार सामंती समाज को ख़त्म कर देने के बाद अपना राज्य स्थापित कर लेने के पश्चात पूंजीपति वर्ग के आज़ादी, समानता और भाईचारे के नारों की पोल खुलनी शुरू हो गई। जहां तक पूंजीपति वर्ग ने सामाजिक विकास में प्रगतिशील भूमिका निभाई, वहां तक मानवाधिकारों की वर्तमान अवधारणा का भी इतिहास में सकारात्मक योगदान है। अपने सकारात्मक पहलू के बावज़ूद यह नहीं भूलना चाहिए कि इन अधिकारों का आधार पूंजीवादी विश्व दृष्टिकोण में है, जो निजी संपत्ति के अधिकार पर टिका हुआ है और जो असल में श्रमशक्ति की लूट करने के अधिकार के रूप में लागू होता है।

पिछले कुछ समय से भारत में मानवाधिकारों का हनन तेज़ी से बढ़ा है। साल 2014 में फासीवादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा के दिल्ली की गद्दी पर बैठने के बाद भारत के लोगों का दमन और भी तेज़ गति से बढ़ा है। भाजपा सरकार ने देश में रह रहे अल्पसंख्यक समुदायों; ख़ासकर मुसलमानों पर एक योजनाबद्ध सांप्रदायिक-फासीवादी हमला बोला है। देश में सांप्रदायिक भीड़ द्वारा मुसलमानों को मारने के कई मामले सामने आ चुके हैं। हर दिन मस्जिदों की तोड़-फोड़ करना और उन पर भगवा झंडा लगाना आम बात है।

मुसलमानों को देश में दोयम दर्जे के नागरिक बनाने और उनसे सभी नागरिक अधिकार छीनने के इरादे से भाजपा द्वारा नागरिकता संशोधन कानून लाया गया है। यह कानून मुसलमानों के अलावा अन्य सभी धर्मों के लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान करने की इजाज़त देता है। भले ही साल 2020 में इस क़ानून के ख़ि‍लाफ़ उठे जन उभार के कारण भाजपा ने इस पर चुप्पी साध ली थी, लेकिन अब फिर से 2024 में इसे लागू किया जा रहा है। इस क़ानून के अलावा भाजपा की हुकूमत वाले कई राज्यों में धर्म परिवर्तन, तथाकथित लव-जेहाद विरोधी, हिजाब विरोधी क़ानून लाकर नागरिकों के खाने, पहनने और अपनी इच्छा से जीवन साथी चुनने के बहुत ही बुनियादी मानव अधिकारों पर भी हमला किया जा रहा है।

वैसे तो भारतीय संविधान देश के हर नागरिक को अपनी पसंद के किसी भी धर्म का पालन करने की आजादी देता है, लेकिन भाजपा के शासन में ये क़ानून सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही रह गए हैं। एक निजी एजेंसी के हाल के रिपोर्ट के अनुसार 2023 में ईसाई संस्थानों पर 601 हमले हुए हैं। 3 मई 2023 को मणिपुर में शुरू हुई हिंसा आज भी किसी ना किसी रूप में जारी है। भाजपा सरकार ने बड़ी संख्या में जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को यू.ए.पी.ए. के तहत झूठे आरोप लगाकर जेलों में बंद कर दिया है, यहां तक कि सरकार की थोड़ी-सी भी आलोचना करने पर पत्रकारों पर झूठे केस बनाना, ईडी, आयकर और अन्य सरकारी एजेंसियों द्वारा छापे मरवाना आम बात हो गई है।

कुछ समय पहले एक ऑनलाइन चैनल न्यूज़क्लिक के संपादकों और अन्य पत्रकारों के ख़ि‍लाफ़ तथाकथित देशद्रोही गतिविधियों को अंजाम देने और विदेशी चंदा लेने के आरोप लगाकर गिरफ़्तारियां की गई थीं। उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक लड़की के हुए बलात्कार और क़त्ल की रिपोर्टिंग करने गए पत्रकार सिद्दीक कप्पन के ख़ि‍लाफ़ यू.ए.पी.ए. के तहत मामला दर्ज करके उसे दो साल से अधिक समय तक जेल में रखा गया।

भीमा कोरेगांव मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर जी.एन. साईबाबा को शारीरिक रूप से 90% अक्षम होने के बावज़ूद लगभग 10 साल तक जेल में बिताने पड़े। आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले पादरी स्टेन स्वामी की जेल में बिना इलाज़ के मौत हो गई थी। इनके अलावा ऐसे और भी हज़ारों मामले हैं, जिनमें सरेआम मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, पर इस आयोग को कृषि कानूनों के ख़ि‍लाफ़ संघर्षशील लोगों के विरुद्ध नोटिस निकालना ज़रूर याद रहा। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि कैसे पूंजीवादी शासक ख़ुद अपने संविधान में बनाए गए मानकों पर भी खरे नहीं उतर रहे।

आज भारत में किसी भी आम चुनाव में मानवाधिकारों का हनन कोई मुद्दा नहीं बन पाता। ऐसा नहीं है कि पहले की सरकारों में मानवाधिकारों का हनन नहीं होता था, लेकिन आज संघ परिवार अपनी फासीवादी राजनीति को देश में स्थापित करने के लिए व्यापक तौर पर समूचे देश में मानवाधिकारों का‌ उल्लघंन कर रहा है। वास्तव में आज मानवाधिकार के ख़िलाफ़ संघर्ष के मुद्दे को फासीवाद के ख़िलाफ़ हो रहे संघर्ष से ‌जोड़ने‌ की ज़रूरत है।

(स्वदेश कुमार सिन्हा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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