दिल्ली चुनाव में बेघरों का मुद्दा क्यों नहीं

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जनवरी जाने को है। देश भर में बारिश के बाद ठंड वापस अपनी रंगत पर है। जमीन गीली, आसमान गीला, हवाएं गीली। एक गीली ठंडी सुबह मैं दिल्ली के चक्कर लगाता हूं। कनॉट प्लेस सेंट्रल पार्क, जंतर मंतर, मंडी हाउस, जामिया के पास, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के पास फुटपाथ पर, तिलक ब्रिज, साहिबाबाद के स्टेशन के बाहर आदि कई स्थानों पर लोग फर्शों पर लेटे मिले।

यूपी-दिल्ली (साहिबाबाद-दिलशाद गार्डेन) बॉर्डर की ओवर ब्रिज के नीचे एक भाई अपने चार बच्चों के साथ लेटे दिखे। वो कानपुर से अजीविका की तलाश में दिल्ली आए और ओवरब्रिज के नीचे ही रहते हैं। मैंने उनसे पूछा कि वो क्या करते हैं तो उन्होंने बताया कि इस ओबरब्रिज के नीचे लगे पौधों के रख-रखाव का काम करते हैं। इसके लिए उन्हें 80 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से दिहाड़ी मिलती है।

वहीं एक पति-पत्नी साहिबाबाद स्टेशन के फुट ओबरब्रिज पर सोते हैं। स्टेशन के बाहर बगल ही अस्थायी शेल्टर होम (आधे दिसंबर में) लगाया गया है। मैंने उनसे पूछा कि वो वहां क्यों नहीं जाते सोने के लिए? उन्होंने बताया कि वह सिर्फ़ पुरुषों के लिए है महिलाओं को नहीं जाने देते। ऐसे में पत्नी को छोड़कर वहां अकेले रहने कैसे जाऊं।

जंतर-मंतर की बाउंड्री किनारे एक आदमी लेटा है। लोग बाग आ-जा रहे हैं। कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में एक आदमी नंगे फर्श पर ठंड से कंपकंपाता लेटा है। लोग-बाग आ-जा रहे हैं। किसी के दिल में कुछ नहीं चुभता।

ये दृश्य न पत्रकार की कलम देख पाती है, न उनके कैमरे को नज़र जाती है। यह गरीब न तो राजनीतिक जरूरतों में फिट बैठते हैं और न पत्रकार की लेखनी में। न ही कैमरों को इनकी जरूरत है। पत्रकारिता की भाषा में यह लो मार्केट खबर है।  

बिना मौत के आंकड़ों के नहीं छपती खबरें
जब तक ठंड से मौत के आंकड़े नहीं बनते सनसनी खबरें नहीं बनतीं। ब्रेकिंग न्यूज और हेडलाइन तो ख़ैर तब भी नहीं बनती। मीडिया ख़बरों में भी अपना मुनाफ़ा देखती है। बेघरों और गरीबों की ख़बरे मुनाफ़ा कमाकर नहीं देतीं। शायद इसीलिए मीडिया की आंखों में गरीब, बेघर लोग नहीं दिखते। मीडिया की वैन लाइव कवरेज के लिए ऐसी जगहों पर नहीं खड़ी होती।

दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड के एक अफसर इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं, “रैन बसेरों से जुड़ी मीडिया की पूरी रिपोर्टिंग डेड स्कल डाटा पर चलती है। ये आंकड़ा आपको कौन देता है? फर्जी आंकड़ों पर स्टोरी बना दी जाती है। साल भर की मौतें जोड़ दी जाती हैं, जबकि अधिकतर मौतें मई-जून में होती हैं।

गर्मियों के लिए अभी रैन बसेरे उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, पर हम उस पर भी काम कर रहे हैं। मीडिया दिल्ली के रैन बसेरे पर लिखता है। यहीं एनसीआर में कई रैन बसेरों में मूलभूत सुविधांए नदारद हैं। मुंबई में तो रैन बसेरे हैं ही नहीं। आप हमारी खामियों की आलोचना कीजिए वो ठीक है, लेकिन हमारे प्रयासों को पूरी तरह नकारिए तो नहीं।”

दिल्ली के चुनाव में बेघर मुद्दा नहीं
दिल्ली में चुनाव चल रहा है, लेकिन बेघरों का मुद्दा चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया। एक कारण ये है कि जिनके पास अपने रहने का ठिकाना नहीं, वो क्या खाक किसी के वोटर होते होंगे। दिल्ली चुनाव में भाजपा के लिए सीएए, धारा 370, तीन तलाक और पाकिस्तान मुद्दा है। तो कजरीवाल साहब अपने चुनावी विज्ञापनों में पिछले पांच साल के किए धरे पर अपनी पीठ ठोक रहे हैं। कांग्रेस भी सफाई और बेरोजगारी के मुद्दे उठा रही है पर बेघर लोग उसके चुनावी मुद्दे में नहीं हैं।

अपर्याप्त हैं शेल्टर होम की संख्या
दिल्ली में शेल्टर होम की संख्या अपर्याप्त हैं। दिल्ली में स्थायी और अस्थायी कुल मिलाकर 250-270 शेल्टर होम हैं। जबकि 2011 की जनगणना के मुताबिक दिल्ली में ऐसे करीब डेढ़ लाख से ज्यादा लोग बेघर हैं। जबकि 2001 की जनसंख्या में बेघरों की संख्या 50 हजार के करीब थी। अनुमानतः दिल्ली में बेघरों की वर्तमान संख्या ढाई लाख के ऊपर होगी, जबकि एक शेल्टर होम में 30-50 लोगों के रहने की ही व्यवस्था होती है। जनगणना 2011 के अनुसार पूरे देश में 17,73,040 लोग बेघर हैं, जोकि कई देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। हालांकि ये आंकड़े दस साल पुराने हैं फिर भी बेहद भयावह हैं। 

दिल्ली पुलिस करती है बेघरों को प्रताड़ित 
बेघर होना सामाजिक, राजनीतिक डिसऑर्डर का लक्षण है। बावजूद इसके सरकारी और सामान्य भ्रांतिया बेघरों के बारे में ये है कि ये लोग भिखारी, चोर या ड्रग्स लेने वाले हैं  जो कि गलत है। इन पर मौसम की मार के साथ पुलिस की बेरहम मार भी पड़ती है। अधिकतर जगहों से पुलिस इन्हें बंग्लादेशी कहकर मार भगाती है। 90% बेघर कामगार लोग हैं। कोई वेंडर है। कोई मजदूर है। कोई रिक्शा चालक है। कोई पल्लेदारी करता है। कोई हॉकर है। कोई सफाईकर्मी है।

कुल मिलाकर ये लोग नगर निर्माता हैं। बेघर लोग गरीबी के आखिरी पायदान के लोग हैं, गांधी जिन्हें अंत्योदय कहा करते थे। इनके प्रति सम्मान की दृष्टि विकसित किए जाने की ज़रूरत है। इन्हें स्किल ट्रेनिंग दिए जाने की ज़रूरत है। जिन्हें समाज से कम मिला है, उन्हें सरकार द्वारा ज्यादा दिया जाना चाहिए। 

हजारों घर वर्षों से खाली पड़े हैं
किसी किसी के पास कई घर हैं। तो किसी के पास एक झुग्गी भी नहीं। कोई आलीशान घर में ताला बंद करके विदेशों में रहता है। एक अनुमान के मुताबिक शहरी भारत में लगभग 19 करोड़ परिवार ठीक से निर्मित निवास इकाइयों में नहीं रहते हैं। लेकिन, शहरी भारत में, 10.2 मिलियन घर खाली हैं, और उनमें से बहुत से 2-3 साल या इससे अधिक के लिए खाली पड़ा है। ये विरोधाभास ये दर्शाता है कि आधे से ज्यादा लोग बेघर हो रहे हैं वो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के हैं।

ये पूंजीवादी विडंबना है। या कहें कि पूंजीवादी संकट जैसे-जैसे दो वर्गों के बीच ये आर्थिक अंतर बढ़ता जाएगा बेघरों की संख्या भी संकट के स्तर तक बढ़ती जाएगी। ऐसे में सरकार को दो साल से खाली पड़े घरों को अपने अधीन करके बेघरों के हवाले कर देना चाहिए। या फिर सरकार मकान मालिक से वो घर किराए पर लेकर उसमें लोगों के रहने की व्यवस्था करे। साथ ही सरकार शहर कमाने आने वाले लोगों को बड़ी मात्रा में सामुदायिक बस्तियां बनाकर उपलब्ध करवाए। 

(सुशील मानव लेखक और पत्रकार हैं। वह दिल्ली में रहते हैं।)

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