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आखिर देश में क्यों हो रहा है स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला?

स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले के खिलाफ़ भारत सरकार द्वारा 22 अप्रैल को एक अध्यादेश लाया गया। इसके लिए 123 साल पुराने ‘एपिडमिक डिजीज एक्ट 1897’ में बदलाव किया गया है। इस प्रावधान में हमलावरों के खिलाफ़ बहुत ही सख्त प्रावधानों किए गए हैं और इसे गैर-जमानती श्रेणी में रखते हुए हमलावरों के लिए 7 साल की सजा का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा 50 हजार से 2 लाख तक का प्रावधान किया गया है।

सही है, कानून बना दिया सरकार ने अच्छा ही किया, लेकिन इस कानून के बनने के बाद भी हमले होंगे तो। तो क्या होगा। कानून दरअसल असल समस्या के समाधान तक नहीं जाता। रेप के बाद हत्या की घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि सख़्त कानून ज़्यादा संगीन अपराध को बढ़ावा देता है।

बहरहाल बात स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले की। आखिर स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले हो क्यों रहे हैं। पहले तो इन हमलावरों की पहचान इनके धर्म के आधार पर की गई और पूरे मुद्दे को राष्ट्र बनाम राष्ट्रद्रोही, कोरोना जेहादी आदि के फ्रेम में मढ़कर पूरी तरह सांप्रदायिक करने की कोशिश की गई। कई फर्जी खबरें भी प्रोपोगैंडा संस्थानों द्वारा चलाई गई। कुछ रामा हॉस्पिटल कानपुर के सांप्रदायिक पूर्वाग्रही स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा मनगढ़ंत तौर पर फैलाई गई। लेकिन बाद में जब बहुसंख्यक समुदाय के लोगों द्वारा भी स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले होने की बात आने लगी तो सरकार को अपना पैंतरा बदलना पड़ा।

पीपीई किट बनाम कानून

स्वास्थ्यकर्मियों को पीपीई किट मुहैया करवा पाने में असफल सरकार लगातार विरोध का सामना कर रही थी। एम्स समेत कई संस्थानों में पीपीई किट मांगने पर स्वास्थ्यकर्मियों के खिलाफ़ निलंबन तक की कार्रवाई की गई।

सरकार ने पहले स्वास्थ्यकर्मियों के सम्मान में ताली, थाली और फिर मोमबत्ती, दीया फ्लैशलाइट जलवाकर उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश की लेकिन स्वास्थकर्मियों के लगातार कोविड-19 संक्रमित होते जाने की सच्चाई सामने आने से स्वास्थ्यकर्मियों ने ऐसे असुरक्षा के माहौल में काम न करने की धमकी दी तो पहले ही पीपीई किट मसले पर घिरी भाजपा सरकार ने पैंतरा बदलते हुए कानून बनाकर बिना हींग फिटकरी के स्वास्थ्यकर्मियों का साथ और सहानुभूति अर्जित करने के रास्ते पर आगे बढ़ गई।

स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले की असल वजह क्या है

असल वजह है क्वारंटाइन सेंटर से आए स्वास्थ्यकर्मियों का असंवेदनशील बर्ताव और बदइंतजामी के वीडियोज। ये वीडियो सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय की ओर से नहीं आए। बल्कि बहुसंख्यक समुदाय के एलीट वर्ग और ऊंचे पदों पर आसीन लोगों के वीडियो हैं जो वीडियो के जरिए क्वारंटाइन सेंटर के बदहाली और स्वास्थ्यकर्मियों की उपेक्षा की शिकायत कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ वीडियोज पर नज़र डालते हैं पहले-

आगरा शहर हॉटस्पॉट बना हुआ है। उत्तरप्रदेश में सबसे ज़्यादा कोरोना संक्रमितों के केस आगरा से ही आए हैं। 28 अप्रैल को आगरा के अछनेरा स्थित एक क्वारंटाइन सेंटर का वीडियो वायरल हुआ था।

वीडियो में देखा जा सकता है कि क्वारंटाइन सेंटर में रखे लोगों को जानवरों की तर्ज पर लोगों के सामने खाना फेंककर दिया जा रहा था। और क्वारंटाइन सेंटर के लोग बिना सोशल डिस्टेंसिंग की परवाह किए खाने का सामान लेने के लिए तुंह पे मुंह किए जा रहे थे।

इससे पहले 8 अप्रैल को भोपाल, मध्यप्रदेश की प्रीति पांडेय का वीडियो वायरल हुआ। प्रीति पांडेय के जीवन साथी राजकुमार पांडेय राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन राज्य कार्यालय भोपाल में आईटी सलाहकार के पद पर कार्यरत हैं। जो कि कोरोना पोजिटिव पाए गए हैं।

प्रीति ने वायरल वीडियो में आरोप लगाया है कि दो दिन हो चुके हैं उनके पति कोरोना वायरस पॉजिटिव हैं। उन्हें भोपाल के एम्स में रखा गया है। लेकिन उनका सही तरीके इलाज नहीं हो रहा है और ना ही उनका और उनके बच्चे का सैंपल लेने के लिए कोई आया। इसके अलावा घर और आसपास सैनिटाइजेशन भी नहीं किया गया है।

प्रीति पांडेय ने कहा कि- “मेरे पति स्वास्थ्य विभाग द्वारा बुलाई गई बैठक में हिस्सा लेने के लिए गए थे। जहां से वह कोरोना से इनफेक्टेड हो गए। इसके बाद वो भोपाल एम्स में भर्ती हो गए लेकिन 2 दिन से वहां पर उनका कोई ईलाज नहीं हो रहा है। एम्स के ज्यादातर डॉक्टर छुट्टी पर हैं। 2 दिन में उन्हें कोई देखने तक नहीं आया सिर्फ आइसोलेशन के नाम पर वहां डाल रखा है।”

बता दें कि भोपाल में कोरोना के कुल संक्रमितों में से पचास प्रतिशत तो स्वास्थ्य विभाग के लोग हैं। खुद स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख सचिव पल्लवी जैन संक्रमित होने के बाद तक विभाग जाती रही थीं।

फिर दिल्ली कांस्टेबल सचिन कुमार तोमर का वीडियो आया। उन्होंने अपने मोबाइल से वीडियो शूट करके सोशल मीडिया पर डाला।

वीडियो में सचिन कुमार तोमर बताते हैं कि “मैं कोरोना पीड़ित हूँ। मुझे चौधरी ब्रह्म प्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान दिल्ली में क्वारंटाइन किया गया है। यहां किसी को बुखार है गले में दर्द है तो दवाइयां नहीं दी जा रही हैं। दो दिन से चादर तक नहीं बदले जाते। 20 लोगों पर एक बाथरूम है। वो भी बेहद गंदा। न गर्म पानी दिया जा रहा है।”

वो आगे बताते हैं कि “थाना तिलकनगर के चौकी तिलक बिहार में पोस्टेड था। 17 अप्रैल को मैं कोरोना पोजिटिव पाया गया तब से आज तक चार दिन हो गए लेकिन आज तक मेरे बीवी बच्चों का टेस्ट नहीं हुआ। मैं कहता हूँ तो वो कहते हैं सिटी लैब फोन करो। एक आदमी का 4500 रुपए लगेगा। पैसे अरेंज करो। न हैंडवाश दिया न सैनेटाइजर। मांगने पर मना कर देते हैं।”

20 अप्रैल को दिल्ली जहाँगीर पुरी जी ब्लॉक निवासी प्रतिभा गुप्ता नामक बेटी-मां का वीडियो वायरल हुआ।

वीडियो में मां बेटी कहती हैं, “16 अप्रैल की रात 2 बजे मेरे पति बेहोश हुए तो हम उन्हें फोर्टिस अस्पताल शालीमार बाग़ ले गए।  कोरोनो टेस्ट पोजिटिव आने के बाद उन्हें बिना परिवार के राय लिए लोक नायक अस्पताल शिफ्ट कर दिया। 18 तारीख को 8-9 बजे रात को उन्हें कई घंटे के इंतजार के बाद आईसीयू में एडमिशन दिया गया और फिर अगले दिन 12 बजे तक उन्हें कोई खाना नहीं दिया गया। फिर अगले दिन 9 बजे उन्हें नाश्ता मिला। लो शुगर और हाइपरटेंशन के मरीज हैं। उनको खाना नहीं मिलता तो उनका ग्लूकोज बढ़ जाता है। 20 तारीख को मेरे पिता का फोन आया कि उन्हें 102 बुखार है। और उनसे उठा नहीं जा रहा है। उन्होंने डॉक्टरों और नर्सों को कहा लेकिन कोई रिस्पांस नहीं कर रहा है। उनको कल बोला गया कि उन्हें क्वारंटाइन फैसिलिटी के लिए नरेला लेकर जाया जाएगा। 9 घंटे प्रतीक्षा किया। लेकिन नहीं ले गए। तीन दिन से डॉक्टर ने उनको नहीं देखा। और इस वीडियो के बाद मां बेटी रोने लगी।

वहीं 27 अप्रैल को ग़ाजियाबाद के लोनी के उत्तरांचल कॉलोनी के निवासी मनीष कुमार तिवारी और उनके दो बेटों का वीडियो वायरल हुआ।

वीडियो में वो और उनके दो बेटे रो रोकर सरकार से गुहार लगाते कह रहे हैं, “मेरी बीवी कोविड-19 संक्रमित पाई गई । वो पहले से ही कैंसर पीड़ित थी और राजीव गांधी में उसका ईलाज़ चल रहा था। उसे आज रात डेढ़ बजे ले गए। उसने मुझे वीडियो कॉल से दिखाया जिसमें परिवार रो रोकर अपनी बात बताई। उन्होंने बताया कि खाने पीने को नहीं दिया गया। शौचालय, बाथरूम की सुविधा भी नहीं थी। न ही कोई पूछने वाला है। सुबह हो गई अभी तक उसे कुछ खाने को नहीं दिया गया। न खाना, न दवाई। उसमें कोई लक्षण नहीं था। सर्जरी होनी थी उसके पहले हमने कोविड-19 टेस्ट करवाया। और खुद सरकार के नंबर पर फोन करके मदद के लिए बुलाया। उसका ये नतीजा हुआ कि मेरी बीवी को ऐसी जगह ले जाकर फेंक दिया गया जहाँ न खाने पीने को कुछ दिया गया न कोई सुविधा है।”

इससे पहले 5 अप्रैल को उत्तर प्रदेश, बस्ती जिले के आकाश गुप्ता का वीडियो वायरल हुआ था। जिसे उसने खुद कैली अस्पताल से शूट किया था।

आकाश गुप्ता वीडियो में कराहते हुए कह रहा है, “पहले मैं जिला अस्पताल में था वहां से मुझे कैली अस्पताल लाया गया। रात में मुझे सर्दी, खासी बुखार था। मैं तड़पता रहा सिस्टर से कहता रहा कि मुझे दवा दो, दवा दो पर उन्होंने मेरी एक ना सुनी वो सब कमरे में जाकर सो रही थीं। सब  कह रहे थे कि अंदर जाकर सो जाओ। जब मेरी सांस फूल रही है, सांस फूल रही है तो मैं कैसे सो सकता हूँ। अब मैं यहां से भाग जाऊंगा और 10 लोगों को छुऊंगा, वो 10 लोग 100 को छुएंगे फिर वो 100 लोग हजार लोगों को छुएंगे। मैं चेतावनी देता हूँ अगर अस्पताल में ये लोग इतनी लापरवाही करेंगे तो मैं भाग जाऊँगा। मैं डीआईजी, सीएमओ, एसआई जितने भी सीनियर थे सबको फोन कर दिया पर रात से अभी तक कोई झांकने तक नहीं आया।”

इसके बाद दिल्ली के कनॉट प्लेस में एक पब्लिक बैंक के कर्मचारी अजय भट्ट जिन्हें 21 अप्रैल को बुखार आने के बाद ग्रेटर नोएडा के गवर्नमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस ले जाया और टेस्ट के बाद उन्हें क्वारंटाइन कर दिया गया । दो दिन बाद जगह न होने का हवाला देकर उन्हें ग्रेटर नोएडा के ही एक दूसरे क्वारंटाइन सेंटर शिफ्ट कर दिया गया।

अजय भट्ट बताते हैं कि, “उस क्वारंटाइन सेंटर में आकर मैंने देखा कि ऊपर के फ्लोर से नीचे आकर 40-45 लोग उसमें औरतें और बच्चे भी सोशल डिस्टेंसिंग का मजाक उड़ाते हुए एक जगह इकट्ठा होकर खाने का इंतजार कर रहे थे। ये सब करीब आधा-पौन घंटा चला। उसके बाद स्टाफ के कुछ लोग 15 लोगों का खाना लेकर आये और उन्हें थमाकर कहा सब लोग बाँटकर खा लो। मुझे सारा दिन खाना नहीं मिला। मांगने पर कहा रात को मिलेगा। किसी डॉक्टर ने मेरा हाल तक नहीं पूछा न कोई जांच हुई। साफ-सफाई तक नहीं हुई है। पता नहीं क्या बना रखा है ये।”

आज बिहार के लखीसराय के कालू यादव का वीडियो वायरल हुआ। कालू यादव कोविड-19 संक्रमित मरीज हैं। इन्हें नजदीकी स्कूल में क्वारंटाइन करके रखा गया है।  इनके मां की कोविड-19 से संक्रमित होकर मौत हो चुकी है। कालू यादव बताते हैं कि वह कंपाउंडर हैं और गांव के बहुत से लोग इनके संपर्क में आए हैं लेकिन न तो गांव में किसी की जांच हुई न इनके परिवार के लोगों की जांच की गई। लोग टेंपरेचर नाप कर चले गये हैं। कालू को दवा ईलाज कुछ नहीं मिल रहा है।

जबकि बिहार सरकार  बिहार में डोर टू डोर स्क्रीनिंग के दावे कर रही है। लोग शिकायत कर रहे हैं कि कागज़ों पर तो उनके पूरे जिले में स्क्रीनिंग हो चुकी है लेकिन उनके घर पर कोई आया तक नहीं।

जज ने बिहार में कोरोना मरीजों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को किया उजागर

बिहार में एक अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश न्यायाधीश त्रिभुवन नाथ ने जिले में स्थापित किये गये आइसोलेशन वार्ड का निरीक्षण करते हुए पाया कि मरीज़ों को जिस स्थानीय होटल से लाकर भोजन परोसा जा रहा था- उसी होटल का प्रयोग क्षेत्र के अन्य निवासी भी अपने खानपान के लिये कर रहे थे।

न्यायाधीश ने यह भी खुलासा किया है कि डॉक्टर और अधिकारी पीपीई सूट पहने बग़ैर ही आइसोलेशन वार्डों में घूम रहे थे, क्योंकि उन्हें ऐसे सूट उपलब्ध नहीं कराये गये थे। त्रिभुवन नाथ उत्तर बिहार में शिवहर जिले के जिला और सत्र न्यायाधीश हैं और वे एक स्थानीय बालिका विद्यालय में स्थापित कोविड -19 क्वारंटाइन वार्ड का निरीक्षण कर रहे थे।

न्यायाधीश ने पाया कि वहां भर्ती किये गये पांच कोविड -19 मरीज़ों के लिये कोई सामुदायिक रसोई की सुविधा मौज़ूद नहीं थी। वास्तव में, स्कूल के कर्मचारी एक स्थानीय होटल से मरीज़ों के लिये भोजन खरीद रहे थे। वहीं होटल पास के एक छात्रावास में रहने वाले इंजीनियरिंग छात्रों को भी भोजन उपलब्ध करा रहा था।

अधिकारियों ने न्यायाधीश को बताया कि जिस डॉक्टर को प्रतिदिन आकर भोजन की गुणवत्ता की जांच करनी थी, वह कभी भी नहीं आया था और भोजन के पैकेट बिना किसी जांच के रोगियों को दिये जा रहे थे। न्यायाधीश को सबसे अधिक हैरत इस बात पर हुई कि स्थानीय अधिकारियों ने बिना किसी सुरक्षात्मक गियर के इस आइसोलेशन सेन्टर को चालू कर दिया था। पीपीई सूट की तो बात ही छोड़ दें, वे तो मास्क या दस्ताने भी नहीं पहन रहे थे।

आइसोलेशन सेंटर की सुरक्षा के लिये जिन पुलिस अधिकारियों को प्रतिनियुक्त किया गया था, उन्होंने कोई मास्क या दस्ताने नहीं पहने थे। जब न्यायाधीश ने आइसोलेशन वार्ड में प्रवेश किया, तो उन्होंने पाया कि वहां मौजूद दो डॉक्टर मास्क पहने हुए थे, लेकिन पीपीई सूट नहीं। जब उन्होंने उनसे इसका कारण पूछा, तो उन्हें बताया गया कि पीपीई सूट का ‘अभाव’ है।

बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और क्रूर सरकार

स्वास्थ्यकर्मियों पर लगातार हो रहे हमले के लिए सिर्फ और सिर्फ सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बर्बाद करने वाली क्रूर सरकारें जिम्मेदार हैं। पिछले सदी के आखिरी दशक में देश पर थोपे गए उदारीकरण के बाद से देश और तमाम राज्यों में जो भी सरकार और पार्टी सत्ता में आई है उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बर्बाद करने में पिछली सरकार से होड़ ही लगाई है।

1 फरवरी 2020 को प्रस्तुत किए गए वर्ष 2020-21 के बजट में रक्षा बजट को 4,71,378 करोड़ रुपए आवंटित किए गए जो कि वर्ष 2020-21 के कुल बजट का 15.49 प्रतिशत है।

जबकि वर्ष 2020-21 के हेल्थ बजट के लिए 69,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए। जो कि कुल बजट 3,242,230 का महज 2.268 प्रतिशत ही है।

भारत का हेल्थ बजट चुनावी वर्ष 2019-20 के लिए 61,398 करोड़ है जबकि इससे एक साल पहले यानि 2018-19 में 52,800 करोड़ रुपए था। जबकि 2019-20 का अंतरिम रक्षा बजट 4,31,011 करोड़ रुपए था।

स्वास्थ्य सेवा सुलभ होने के मामले में भारत दुनिया के 195 देशों में 154वें पायदान पर है। यहां तक कि यह बांग्लादेश, नेपाल, घाना और लाइबेरिया से भी बदतर हालत में है। स्वास्थ्य सेवा पर भारत सरकार का खर्च (जीडीपी का 1.15 फीसदी) दुनिया के सबसे कम खर्चों में से एक है। देश में स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे और इस क्षेत्र में काम करने वालों की भी बेतहाशा कमी है ।

भारत में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च सबसे कम है। स्वास्थ्य सेवा उपलब्धता के मामले में प्रति डॉलर प्रति व्यक्ति सरकारी खर्च की बात की जाए, तो भारत में यह 1995 में 17 डॉलर था जो 2013 में 69 और 2017 में 58 डॉलर प्रति व्यक्ति सालाना हो गया।

दूसरे देशों के साथ तुलना की जाए तो हम इस मामले में बेहद, बेहद पीछे खड़े हैं।

मलेशिया में यह खर्च 418 डॉलर है, चीन में 322, थाइलैंड में 247 फिलीपींस में 115, इंडोनेशिया में 108, नाइजीरिया में 93 श्रीलंका में 88 और पाकिस्तान में 34 डॉलर है।

सकल घेरलू उत्पाद (जीडीपी) में से स्वास्थ्य क्षेत्र में  होने वाले खर्च के आंकड़े को देखें तो वहां भी हमारा देश दूसरे देशों की तुलना में कहीं नहीं ठहरता। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद ये स्थिति भयावह होती गई। वर्ष 1995 में यह 4.06 फीसदी था जो 2013 में घटकर 3.97 फीसदी हो गया। मोदी सरकार बनने के बाद साल 2017 में ये आँकड़ा भयावह हद तक घटता हुआ 1.15 फीसदी हो गया।

भारत की तुलना में अगर दूसरे देशों का आँकड़ा देखें तो अमेरिका में यह जीडीपी का 18 फीसदी, मलेशिया में 4.2 फीसदी, चीन में 6, थाइलैंड में 4.1 फीसदी, फिलीपींस में 4.7 फीसदी, इंडोनेशिया में 2.8, नाइजीरिया में 3.7 श्रीलंका में 3.5 और पाकिस्तान में 2.6 फीसदी है।

चूंकि कोविड-19 वैश्विक महामारी से निपटने के लिए सिर्फ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था ही मोर्चे पर है जबकि पिछले तीन दशक में इसकी रीढ़ ही तोड़ दी गई है। सार्वजनिक क्षेत्र के स्वास्थ्यकर्मियों के पास पीपीई किट तक नहीं है। उपरोक्त आँकड़ों और वीडियोज से स्पष्ट है कि एक बेरीढ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को कोविड-19 के मोर्चे पर जबर्दस्ती धकेल दिया गया है।

बिना उसे ज़रूरी संसाधन मुहैया करवाए। ऐसी व्यवस्था में जहां उपयुक्त समय पर दवाईयों और खाना न मिलने से कई शुगर मरीजों के क्वारंटाइन सेंटर में दम तोड़ने के भी वीडियोज वायरल हुए हैं। क्वारंटाइन सेंटर की बदहाली और अव्यवस्था की कथा सुनाते तमाम वायरल वीडियोज लोगों को पैनिक कर रहे हैं। जिसके चलते वो स्वास्थकर्मियों पर हमले कर रहे हैं। सिर्फ़ कानून बनाकर इन हमलों को नहीं रोका जा सकता। इस कानून से सिर्फ आप पीड़ित को ही अपराधी ही बनाएंगे लेकिन अपराधी बनने की शर्त पर भी लोग हमले करेंगे क्योंकि वो एक खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था के क्वारंटाइन सेंटर में बिना खाना, बिना दवाई के भूख और पीड़ा से नहीं मरना चाहते।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on May 1, 2020 12:25 pm

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