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बिहार में एनडीए की क्यों नहीं पड़ रही है CAA-NRC को मुद्दा बनाने की हिम्मत!

19 अक्तूबर को पश्चिम बंगाल में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक मंच से बयान दिया कि “आप सभी को नागरिकता संसोधन कानून का लाभ मिलेगा। इसे संसद में पारित किया गया है। कोरोना महामारी के चलते इसके कार्यान्वयन में देरी हुई है। लेकिन जैसे-जैसे हालात सुधर रहे हैं इसके कार्यान्वयन पर काम चल रहा है । सीएए को बहुत जल्द लागू किया जाएगा। सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध है।”

जाहिर है जेपी नड्डा का ये बयान अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्दे-नज़र आया है। लेकिन ताज्जुब की बात ये कि लगभग 17 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले बिहार में एनडीए या महागठबंधन की किसी भी पार्टी ने सीएए-एनआरसी का नाम तक नहीं लिया है। जबकि कांग्रेस, सभी कम्युनिस्ट पार्टियां और राजद ने मुखरता से एनआरसी और सीएए का विरोध किया था और सभी ने सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी भी की थी।

ऐसा नहीं है कि भाजपा बिहार चुनाव में नफ़रत का इस्तेमाल नहीं कर रही है। उसके दो केंद्रीय मंत्री बिहार के चुनावी मंचों से कश्मीर के आतंकवादियों के बिहार में शरण लेने और राजद के रास्ते माओवाद के सत्ता तक पहुंचने की बात कर चुके हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से जैसे कि भाजपा का चरित्र रहा है और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ‘कपड़ों से पहचान करने’ जैसा सांप्रदायिक बयान चुनावी मंचों से दे चुके हैं।

जबकि खुद गृहमंत्री अमित शाह झारखंड और दिल्ली चुनाव में खुलकर देशव्यापी एनआरसी कराने की बात कह चुके हैं। लेकिन बिहार चुनाव में भाजपा अपने पसंदीदा सांप्रदायिक ज़हरखुरानी पर नहीं खेल रही है। हालांकि दरभंगा जिले की जाले विधानसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी मशकूर अहमद उस्मानी को लेकर जदयू-भाजपा ने उन्हें जिन्ना और पाकिस्तान समर्थक बताकर घेरने की कोशिश ज़रूर की है।

बता दें कि मशकूर साल 2017 में अलीगढ़ मुस्लिम य़ूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे थे। उनके छात्रसंघ अध्यक्ष रहते ही एएमयू के हाल से जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग को लेकर भाजपा ने बवाल काटा था। मशकूर उस्मानी को बिहार में सीएए-एनआरसी के खिलाफ हुए आंदोलन के चेहरे के रूप में भी जाना जाता है। और मशकूर को कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया हुआ है।   

वहीं विपक्ष भी लगातार मुस्लिम मुद्दों पर लगातार चुप्पी साधे हुए है। शायद कहीं न कहीं महागठबंधन के दलों को भी सीएए-एनआरसी के मुद्दे पर सांप्रदायिक विभाजन होने और उसका फायदा एनडीए को मिल जाने का डर है। इसीलिए सड़क पर उतरकर सीएए-एनआरसी का विरोध करने वाली पार्टी भी बिहार चुनाव में सीएए-एनआरसी के मुद्दे को उठाने से बचती नज़र आ रही हैं। जबकि पूरे बिहार में कई जगह दिल्ली के शाहीन बाग़ की तर्ज़ पर अनिश्चित कालीन धरना-प्रदर्शन हुआ था।

47 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं मुस्लिम मतदाता

हालांकि 17 प्रतिशत आबादी के साथ मुस्लिम मतदाता बिहार की हर सीट पर समान महत्व रखते हैं। लेकिन बिहार की 47 सीटों पर उनकी भूमिका ज़्यादा प्रभावशाली नज़र आती है। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के कोर वोटर यादव-मुस्लिम गठजोड़ की तर्ज़ पर ही बिहार में भी यादव-मुस्लिम मतदाता एक समय लालू नीत राष्ट्रीय जनता दल के कोर वोटर रहे हैं। इन्हीं के दम पर लालू यादव ने 15 सालों तक बिहार पर शासन किया। क्योंकि 1989 में भागलपुर दंगे के बाद लालू ने मंडल आयोग की सिफारिशों के मुताबिक पिछड़ी मुस्लिम जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया था।

हालांकि लालू का जनाधार खिसकने और नीतीश कुमार की सेकुलर छवि के चलते मुस्लिम मतदाता जदयू की ओर शिफ्ट हुए थे। लेकिन जिस तरह से नीतीश कुमार ने नागरिकता संशोधन कानून समेत तमाम मुस्लिम विरोधी मुद्दों पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को सपोर्ट किया है, और गठबंधन के सहयोगी को धोखा देकर भाजपा को बिहार की सत्ता में एक नहीं दो बार सहयोगी बनाया है उसके बाद से तो मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा पूरी तरह से नीतीश कुमार से उठ गया है।

बिहार में 47 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक स्थिति में हैं। इन इलाक़ों में मुस्लिम आबादी 20 से 40 प्रतिशत या इससे भी अधिक है। 11 विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक है। 7 विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी 30-40 प्रतिशत है। जबकि 29 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी 20-30 प्रतिशत है। हालांकि मुस्लिम वोट बंट जाने के चलते साल 2010 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को इन 47 सीटों में 25 पर जीत हासिल हुई थी।

साल 2015 में मुस्लिम प्रत्याशियों का दल वार प्रदर्शन

पिछली बार 2015 के चुनाव में 24 मुस्लिम विधायक विधानसभा पहुंचे थे। इनमें से 12 राजद के और 5 जदयू व 6 कांग्रेस के थे। साल 2015 में राजद ने सबसे अधिक 80 मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था जिसमें से 11 विधायक (14%) चुने गए थे।

इसके बाद जदय़ू ने 71 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे जिनमें से 5 (7%) ही चुने गए थे।  कांग्रेस ने 27 मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे जिनमें से 6 (22 प्रतिशत) को जीत मिली थी। जबकि पिछले चुनाव में भाजपा ने 53 मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था। उनमें से सिर्फ़ एक को ही जीत नसीब हुई थी। यानि 2 प्रतिशत।

तमाम राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस से मुस्लिम मतदाताओं के कट जाने की बात करते हैं। लेकिन साल 2015 में सबसे अधिक मुस्लिम प्रत्याशियों की जीतने का प्रतिशत देखें तो कांग्रेस के टिकट पर सबसे ज़्यादा 22 प्रतिशत मुस्लिम उम्मीदवार विधानसभा पहुंचे थे।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 24, 2020 6:20 pm

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