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सीएए-एनआरसी के खिलाफ देश भर में सड़कों पर ‘शाहीन’

जामिया और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में छात्र-छात्राओं पर हुई पुलिसिया बर्बरता के बाद शाहीन बाग़ की एक महिला ने कहा बस बहुत हो चुका अब और नहीं सहा जाता। उसका ये कहना था कि तीन महिलाएं साथ आ खड़ी हुईं। इसके बाद दिल्ली के शाहीन बाग़ में अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया।

दिल्ली नोएडा संपर्क मार्ग (13 ए) पर चार महिलाओं से शुरू हुआ शाहीन बाग़ का कारवां आज इतना बड़ा और व्यापक हो चुका है कि एनआरसी-सीएए-एनपीआर विरोधी धरना प्रदर्शन पूरी तरह से स्त्रियों का विरोध प्रदर्शन बन चुका है। शाहीन बाग में हजारों महिलाएं एक साथ, बिना थके, बिना रुके लगातार आंदोलनरत हैं। आलम ये है कि बड़े-बड़े राजनेता से लेकर चिंतक बुद्धिजीवी यानि हर आम-ओ-खास शाहीन बाग़ में हाजिरी लगाने जाता है।

दिल्ली के शाहीन बाग में चल रहे महिलाओं के धरने की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है।

शाहीन बाग़ की चर्चा देश से लेकर विदेशों तक में है। यही कारण है कि 12 जनवरी इतवार को यूनाइटेड नेशन्स का एक डेलीगेशन शाहीन बाग़ की महिलाओं से मिलने, उनसे संवाद करके उनका पक्ष, उनका संघर्ष जानने आया। उस दिन शाहीन बाग़ में उमड़े जनसमूह का आलम ये था कि चारों तरफ के रास्ते दो किलोमीटर तक खचाखच भरे हुए थे। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में पुलिस के दमन के एक दौर के समय शाहीन बाग़ में पूरी तरह गांधीवादी मुखालफ़त अडिग होकर सत्ता के दमन को बेअसर करता रहा। आज शाहीन बाग़ एक रोल मॉडल की तरह रोशन बाग़, (मंसूर अली पार्क, इलाहाबाद), मोहम्मद अली पार्क, कानपुर, खरेजी (दिल्ली) आदि कई स्थानों पर फैल गया है।

शाहीन बाग़ की 80 वर्षीय बिल्कीस कहती हैं, “क्या सितम है कि हमें इस उम्र में अपने मुल्क को बचाने के लिए अपनी ही चुनी सरकार के खिलाफ़ धरना देना पड़ रहा है। ये लोग अपने ही मुल्क के लोगों पर गोलियां चलवा रहे हैं। ये मुल्क हमने हमारे पुरखों ने बनाया है। हमें नागरिकता की धौंस देने वाले मोदी-शाह कौन होते हैं। बताएं ये कि इनके पुरखों ने देश की आजादी की लड़ाई में कितना और क्या योगदान दिया है? ये बताएं कि इनका योगदान इस मुल्क के बनने में क्या है?”

उन्होंने कहा कि वक्त बहुत बलावान होता है। उसके जुल्मी अंग्रेज नहीं टिके जो ये कहते थे कि हमारे राज में सूरज नहीं डूबता तो इनकी बिसात ही क्या है! ये हमारा मुल्क़ है हमने अपने ख़ून-पसीने से सींचकर इसे बनाया है। इसको बचाने के लिए कितनी कुर्बानियां दी हैं ये वो नहीं समझ सकते जो इस मुल्क़ को बर्बाद करने में लगे हैं।”

कानपुर के मो. अली पार्क में भी महिलाएं धरना प्रदर्शन कर रही हैं।

चमनगंज, मोहम्मद अली पार्क, कानपुर
चमनगंज स्थित मोहम्मद अली पार्क में सात जनवरी 2020 से ही महिलाएं सीएए-एनआरसी के खिलाफ़ अनिश्चितकालीन धरने पर हैं। कानपुर की महिलाओं की भी मांग है कि प्रधानमंत्री सीए कानून को रद्द करें और एनआरसी कराने का फितूर अपने दिमाग से निकालें। नहीं तो कानपुर का हर पार्क महिलाओं द्वारा बेमियादी धरना स्थलों में बदल दिए जाएंगे। लोकतंत्र बचाओ आंदोलन के बैनर तले शुरू हुए चमनगंज कानपुर के धरने में हर वर्ग, हर मजहब की महिलाएं शामिल हैं।

खास बात यह है कि घर के कामकाज निपटाकर यहां पहुंची महिलाएं माइक पर इस कानून के विरोध में बोलती दिखीं। इंकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ शुरू होने वाले प्रदर्शन में आजादी की नज्में, देश भक्ति के गीत गाए जाते हैं। आखिर में राष्ट्रगान होता है। कार्यक्रम में बुद्धिजीवी मोहम्मद सुलेमान, कुलदीप सक्सेना, सैयद अबुल बरकात नजमी समेत अनेक लोग रोजाना आते हैं और महिलाओं का हौसला बढ़ाते हैं।

धरने पर बैठी महिला सलमा ने कहा कि ये देश महात्मा गांधी का है, जिनकी किताबें पढ़कर हम बढ़ हुए। उन्होंने अहिंसा के बल पर अंग्रेजों से हमें आजादी दिलाई। अब हम उन्हीं के बताए रास्ते पर चलते हुए सीएए के विरोध में लड़ाई जारी रखेंगे। वहीं महिला रजिया ने कहा कि भारत अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता है। यदि भाजपा के लोगों को देखना है तो चमनगंज आ जाएं। यहां हमारे साथ सभी धर्म जाति के लोग धरने पर शामिल हैं। रजिया ने कानपुर में हुई हिंसा को दुखद बताते हुए उपद्रवियों पर कार्रवाई की मांग की।

खुरेजी आराम पार्क, जमनापार, दिल्ली
खुरेजी आराम पार्क में भी 13 जनवरी से सैंकड़ों की संख्या में महिलाएं बेमियादी धरने पर बैठी हैं। इस बीच सोमवार की रात दिल्ली प्रशासन ने खुरेजी पार्क धरना स्थल पर बड़ी मात्रा में पुलिस और अर्द्धसैन्य बल उतारकर प्रदर्शनकारी महिलाओं को बलपूर्वक हटाने की योजना बनाई। इलाके की बिजली बंद करके पुलिस के ठुल्ले धरने पर बैठी महिलाओं के साथ बदतमीजी और धक्कामुक्की करने लगे, उन्हें गिरफ्तार करने और फर्जी मुकदमों में फंसाने की धमकी देने लगे। समर्थन में आए युवकों को गिरफ्तार करने लगे।

दिल्ली के खुरेजी आराम पार्क में महिलाएं एनआरसी और सीएए के खिलाफ धरने पर हैं।

मंसूबा उस वक्त फेल हो गया जब इसकी भनक लगते ही दिल्ली-एनसीआर से निकलकर बड़ी मात्रा में जनसमूह खुरेजी आराम पार्क की धरनारत महिलाओं के समर्थन में पहुंचा। इतना बड़ा जन समूह देखकर प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए और उन्हें अपने मंसूबों से पीछे हटने के लिए विवश होना पड़ा।

खुरेजी आराम पार्क की बबिता कहती हैं, “हम महिलाएं उनकी लाठियों, गोलियों से नहीं डरती हैं। वो पहले भी उत्तर प्रदेश और कर्नाटक और दिल्ली में गोलियों और लाठियों का इस्तेमाल कर चुके हैं। जामिया में उन्होंने गोलियों और लाठियों का इस्तेमाल किया और क्या हुआ पूरी दुनिया जानती है। आंदोलन खत्म होने के बजाय और बड़ा और व्यापक हो गया।”

रोशन बाग़ मंसूर अली पार्क इलाहबाद
शाहीन बाग़ की ही तर्ज़ पर 11 जनवरी 2020 से इलाहाबाद के रोशन बाग़, मंसूर अली पार्क में हजारों स्त्रियां अनिश्चित कालीन धरना प्रदर्शन पर बैठ गई हैं। कड़ाके की ठंड और घने कोहरे में भी एकजुट महिलाएं रात-दिन धरनास्थल पर बैठी हैं, और प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद वो धरना स्थल से हटने को राजी नहीं हैं। उनकी मांग है कि सरकार फौरन सीएए वापस ले और एनआरसी न लागू करने की घोषणा करे। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर और गांधी की तस्वीरें हाथ में लिए वो लगातार सीएए वापिस लो के नारे लगा रही हैं। उनको देखकर हजारों लोगों का हुजूम उनकी ओर खिंचता चला आता है।  

इलाहाबाद की गायत्री कहती हैं, “शाहीन बाग़ की महिलाओं ने देश भर की औरतों को आंदोलन के लिए प्रेरित किया है और उनके रास्ते पर चलने का हौसला दिया है। एक महीने पहले हममें से अधिकांश के मन में सरकार और पुलिस के प्रति भय और आतंक था, लेकिन शाहीन बाग़ की महिलाओं के अप्रतिम संघर्ष और शांतिपूर्ण बेमियादी धरने से हमें बल और निडरता हासिल हुई है। अभी आप देखते जाइए सरकार अगर कुछ दिन और अपने ढीठ रवैये पर अड़ी रही तो पूरा देश ही शाहीन बाग़ बन जाएगा।”  

बिहार के मुजफ्फरपुर में भी महिलाओं ने सीएए-एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन की कमान अपने हाथों में ले ली है।

बेगूसराय, बिहार में अनिश्चितकालीन धरना
बेगूसराय में सीएए कानून, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ 12 जनवरी से अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया है। बेगूसराय के बलिया प्रखंड में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर संघर्ष समिति के बैनर तले सैकड़ों लोगों ने सीएए कानून के विरोध में धरना शुरू किया।

इसके अलावा संविधान चौक नागपुर में भी अनिश्चितकालीन धरने की ख़बर है। देवबंद उत्तर प्रदेश में भी में नए वर्ष की शुरुआत ही बेमियादी धरने के साथ की गई। इससे पहले 22 दिसंबर को देवबंद में ईदगाह मैदान पर सीएए-एनआरसी के खिलाफ़ लोग अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे।

(पत्रकार और लेखक सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on January 14, 2020 7:16 pm

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