Tuesday, October 19, 2021

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“कश्मीरी महिलाएं इस अमानवीय घेराबंदी की सबसे बड़ी शिकार”

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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श्रीनगर। 05 अगस्त के बाद, जब भारत ने कश्मीर का विशेष दर्जा रद्द किया और वहां मिलिट्री लॉकडाउन कर दिया, उज़मा जावेद कई दिनों तक घर से नहीं निकलीं।

हर चंद घंटे बाद श्रीनगर में स्थित अपने परिवार के दो-मंजिला घर की खिड़की से बाहर देखती थीं। 20 वर्षीय छात्रा जावेद जो आम तौर पर केरल में रहती थी, ईद अपने रिश्तेदारों के साथ मनाने के लिए घर लौटी थी।

पर खुशियां मनाने के बजाय उन्होंने खुद को जैसे पिंजरे में कैद पाया, जबकि बाहर सशस्त्र भारतीय अर्धसैनिक बल लगभग खाली सड़कों पर पहरा दे रहे थे। कुछ नागरिक सिपाहियों से सड़क पर बिछीं बाड़ों को पार करने की इजाज़त के लिए मिन्नतें कर रहे थे।

जावेद कहती हैं “इस समय कश्मीर में मौजूद हर शख्स वशीभूत है। लेकिन महिलायें इस अमानवीय घेराबंदी की सबसे बड़ी शिकार हैं।”

जावेद खासकर करीब रहने वाली अपनी उस सहेली को लेकर चिंतित थीं, जिससे वह एक सप्ताह से अधिक समय में मिल नहीं पायी हैं।

“मुझे नहीं पता मुनाज़ा कैसी है। पुरुष किसी तरह नमाज़ के लिए बाहर निकल जाते हैं… हम यह भी नहीं कर सकते।”

उन्होंने कहा कि “सशस्त्र बलों को देख कर ही मैं सहम जाती हूं।” और आगे जोड़ा, “मैं अपने भाई और पिता को भी बाहर जाने नहीं देना चाहती पर कोई और चारा नहीं है। उन्हें खाने-पीने और अन्य रोज़मर्रा की ज़रूरतों का सामान लाने के लिए घर से निकलना ही पड़ता है।”

हाल ही में जावेद के घर के बाहर एक बड़ा विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया जब प्रदर्शनकारी और भारतीय सुरक्षा बल भिड़ गए।

वह घर पर मां के साथ अकेली थीं और यही सोचती रहीं कि कहीं उनका भाई और पिता प्रदर्शनकारियों में न हों।

जब उस रात वह दोनों घर लौटे, जावेद को हॉस्पिटल ले जाना पड़ा क्योंकि उनका रक्तचाप काफी बढ़ गया था।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 ने क्षेत्र को स्वायत्तता दी थी। यह हटाने के बाद, भारत ने कश्मीर को पूरी तरह से नज़रबंद कर दिया।

फ़ोन और इन्टरनेट लाइनें बंद कर दी गयीं, जिससे क्षेत्र के सत्तर लाख लोग बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं कर पा रहे थे। भारत कह रहा है कि अब संचार आंशिक रूप से बहाल किया गया है।

फैसले की घोषणा करने से पहले, सरकार का अनुच्छेद 370 हटाने का एक तर्क था कि इससे मुस्लिम बहुल क्षेत्र में लैंगिक समानता बढ़ेगी और महिलाओं को मुक्ति मिलेगी। लेकिन कुछ ही दिनों में भारत में सत्तारूढ़ हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने कश्मीरी महिलाओं को लेकर लिंगभेदी टिप्पणियां कीं।

10 अगस्त को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा, “कुछ लोग अब कह रहे हैं कि कश्मीर खुल गया है, दुल्हनें वहां से लायेंगे। लेकिन मज़ाक की बात जाने दें, यदि (लैंगिक) अनुपात सुधरता है, तो समाज में सही संतुलन होता है।”

इससे पूर्व बीजेपी के एक विधायक विक्रम सैनी ने कहा था, “मुस्लिम पार्टी कार्यकर्ताओं को नए प्रावधानों का जश्न मनाना चाहिए। अब वह कश्मीर की गोरी त्वचा वाली महिलाओं से शादी कर सकेंगे।”

नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने कहा, “यह जीत और लूट की उद्घोषणाएं हैं और 370 हटाने के पीछे का वास्तविक उद्देश्य है।”

सोशल मीडिया में उक्त विचार पर पोस्ट से स्त्रीद्वेष ऑनलाइन भी फैला।

रिपोर्टों के अनुसार 5 अगस्त पर “कश्मीरी महिलाओं से शादी कैसे करें” बहुतायत में गूगल किया जाने लगा।

श्रीनगर से 22 वर्षीय मेक-अप आर्टिस्ट समरीन कहती हैं, “भारत में जिस तरह रोज़ कश्मीर की महिलाओं का विदेशीकरण और वस्तुकरण किया जा रहा है, जिस तरह उनके शरीरों को वलनरेबल बताया जा रहा है और डर पैदा किया जा रहा है, उसने शिकार हो जाने की भावना को बढ़ा दिया है।”

“हम आज पुरषों के मुकाबले ज्यादा प्रताड़ित महसूस कर रही हैं।”

संचार लाइनें बंद होने के कारण समरीन नई दिल्ली में अपनी बहन से संपर्क नहीं कर पा रही थीं। उन्होंने कहा कि “मैं एक टिकट बुक कराना चाहती थी, देखने के लिए कि क्या वह ठीक है। हम यह भी नहीं कर सकते।” एक उड़ान बुक करने के लिए उन्हें 20 किलोमीटर दूर हवाई अड्डे पर जाना पड़ रहा था।

“मेरी मां बहुत चिंतित थीं”, उन्होंने कहा और बताया कि उन्होंने अपने पिता के साथ स्कूटर पर हवाई अड्डे पर जाने की कोशिश की पर भारतीय सुरक्षा बलों की उपस्थिति ने उन्हें रोक दिया।

श्रीनगर की ही निवासी 22 वर्षीय मिस्बाह रेशी को इस बढ़ती लिंगविरोधी सोच पर कोई आश्चर्य नहीं है। वह बताती हैं कि खुद को मुस्लिम महिलाओं का “मसीहा” के रूप में दर्शाने की बीजेपी की कोशिश वास्तविक नहीं है।

वह कहती हैं, “मैं उम्मीद करती हूं कि भारत के लोग पार्टी में प्रचलित महिला विरोधी सोच को समझ सकेंगे और देख पायेंगे कि वास्तविक उद्देश्य कश्मीरी महिलाओं की रक्षा नहीं है।”

व्यवस्थागत यौन उत्पीड़न और लिंग-आधारित हिंसा के अन्य स्वरूपों को अक्सर युद्ध में हथियार के रूप में अमल में लाया जाता है।

सीपीआई (एमएल) की नेता कविता कृष्णन 5 अगस्त के बाद भारत से कार्यकर्ताओं को कश्मीर ले गयी थीं। उन्होंने बताया कि महिलायें और लड़कियां बढ़ती अर्धसैनिक और सैन्य उपस्थिति से घबराई हुई थीं।

कृष्णन के अनुसार “उन्होंने हमें बताया कि 5 से 9 अगस्त के बीच सम्पूर्ण कर्फ्यू के कारण उन्हें अपने बच्चों के लिए दूध और सब्जियां तक लाने में बहुत मुश्किलें आयीं। उन्हें इस बात ने भी काफी व्यथित किया कि नौ से दस साल के बच्चों और किशोरों को गैरकानूनी हिरासत में लिया गया।”

कृष्णन ने कहा कि कुछ महिलाओं और लड़कियों ने “ऐसी छापेमारी के दौरान यौन उत्पीड़न की अपनी आशंकाओं के बारे में भी बात की”।

मास रेप के पुराने आरोप

भारतीय सुरक्षा बलों पर पहले कश्मीर में यौन हमलों के आरोप लगे हैं।

23 फरवरी 1991 को एक बड़े सैन्य ऑपरेशन में कुपवाड़ा जिले के कुनान और पोशपोरा गावों में 30 महिलाओं से सैनिकों ने कथित रूप से बलात्कार किया। भारतीय सेना इन आरोपों को गलत बताती रही है।

लेकिन जुलाई में एक रिपोर्ट में यूएन ने कहा: “1991 के कुनान पोशपोरा मास रेप मामले में कोई प्रगति नहीं है और अधिकारी लगातार पीड़ितों के इन्साफ पाने के प्रयासों को विफ़ल कर रहे हैं।”

इसने भारत को यौन हिंसा के सभी मामलों में कानूनी कारवाई करने, चाहे वह सरकारी तत्वों ने की हो या गैर सरकारी तत्वों ने, और पीड़ितों को न्याय मुहैया कराने को भी कहा था।

कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के बीच तनाव का माहौल है, श्रीनगर से 22-वर्षीय मास्टर्स छात्र जानीस लंकर स्त्री-विरोध की जड़ों के बारे में बात करती हैं। राजनीतिक वर्ग पर सेक्सिस्ट रवैये को बढ़ावा देने को ज़िम्मेदार ठहराने के साथ वह भारतीय सिनेमा में कश्मीरी महिलाओं के प्रस्तुतीकरण पर भी ध्यान दिलाती हैं।

वह कहती हैं: “कश्मीरी महिलाओं को भोली-भाली, नासमझ और सजी-धजी दिखाया जाता है, जो उन्हें वस्तु की तरह पेश करने जैसा है।”

वह बताती हैं कि उनके सोशल मीडिया फ्रैंड्स ऐसे मीम से भरे पड़े हैं जिनमें “हिजाब के साथ गोरी लड़कियां” यौन इच्छा के ऑब्जेक्ट के रूप में दर्शाई गयी हैं जो घिनौना है।

इतिहासकार इरफ़ान हबीब मानते हैं कि बीजेपी के कुछ तबकों से आ रही भाषा का इस्तेमाल पार्टी के हिन्दू जनाधार को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

यह सांप्रदायिक है और नफ़रत से भरा भी। पर व्यापक सन्दर्भ में देखें तो यह भारत में 500 साल पहले मुस्लिम शासन में जो हुआ, यह अलग बात है कि उनमें आधी चीज़ें झूठ हैं, उसका बदला लेने का विचार दर्शाता है।

(“अल जजीरा” पोर्टल पर अंग्रेजी में प्रकाशित अदनान भट्ट के लेख का हिंदी अनुवाद।)

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