जीवन से खिलवाड़ कर रहीं ठेका कंपनियां, बिना सुरक्षा उपकरण खतरनाक काम करने को मजबूर संविदा कर्मी

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प्रयागराज। बीती रात आयी आंधी में कई जगह बिजली के खम्भे टूटे। कई जगह तार भी टूटकर गिर गये। आस पास के इलाकों में कुल चार ट्रांसफॉर्मर फुंक गये। बिजली विभाग के संविदा कर्मी शिव शंकर और उनके एक साथी एक बाइक पर ज़रूरी तार लिये एक के बाद एक बारी-बारी से उन गांवों में जा रहे हैं, ताकि व्यवधानों को दूर करके बिजली सेवा बहाल की जा सके।

शिव शंकर नंगे पैर, नंगे हाथ, बिना सेफ्टी शूज, बिना सेफ्टी ग्लव्स बिजली के खम्भे पर चढ़ रहे हैं। 12 फुट ऊपर लोहे के दो खम्भों पर टंगे ट्रांसफॉर्मर में बीती रात शॉर्ट सर्किट से आग लग गयी। शिव शंकर नंगे हाथ, नंगे पैर ट्रांसफॉर्मर की दशा-दिशा चेक कर रहे हैं। वो बारी-बारी से एक-एक कर ट्रांसफॉर्मर के तीनों फेस, तीनों खूंटियों को चेक करते हैं।

जांच की प्रक्रिया से फारिग होते ही, ज़मीन से 12 फुट ऊपर ट्रांसफॉर्मर पर बैठे-बैठे ही वो लाइनमैन को फोन लगाते हैं। “फला गांव का ट्रांसफॉर्मर शॉर्ट सर्किट से फुंक गया है। दो फेस बुरी तरह डैमेज हो गया है। तीसरा फेस नहीं उड़ा है। दूसरी साइड से लाइनमैन आदेश देता है तीसरा फेस भी ट्रांसफॉर्मर से खोलकर अलग कर दो।

शिव शंकर तीसरा फेस भी खोलकर ट्रांसफॉर्मर से अलग कर देते हैं और खम्भे से नीचे उतर आते हैं। तभी गांव के एक बाबू साहेब आ पहुंचते हैं। और पूछते हैं- क्या हुआ? बिजली बनी? शिवशंकर उन्हें बताते हैं कि ट्रांसफॉर्मर फुंक गया है। कंप्लेन कर दीजिए तो दो-तीन दिन में आकर लग जाएगा।

बिना सेफ्टी उपकरण खंभे पर चढ़ता ठेका कर्मचारी

बाबू साहेब चौंकते हैं तीन दिन लगेगा। वो शिव शंकर से कहते हैं और तुमने तीसरा फेस भी खोल दिया है। उससे कम से कम यह तो होता कि बल्ब जल जाते, मोबाइल चार्ज हो जाता।

शिव शंकर दलील देते हैं कि ट्रांसफॉर्मर में शॉर्ट सर्किट हो गया है, ट्रांसफॉर्मर प्रॉपर काम नहीं कर रहा है, ऐसे में तीसरा फेस जोड़कर बिजली सप्लाई जारी रखने में ख़तरा है। हो सकता है 240 वोल्ट के बजाए 11 हजार वोल्टेज की लाइन जाने लगे, फिर आपके सारी बिजली के उपकरण भी फुंक जायेंगे।

बाबू साहेब डपटते हुए कहते हैं कल रात से अब तक उसी फेस से उन लोगों ने बिजली लिया। कहीं कुछ नहीं हुआ। शिव शंकर फिर हिम्मत बटोरकर कहता है कल कुछ नुकसान नहीं हुआ तो इसका मतलब यह नहीं कि आगे भी नुकसान नहीं होगा। वो दो-तीन गांवों का नाम गिना कर बताते हैं कि वहां हाई वोल्टेज आने से दो मोटर जल गये, चार इन्वर्टर, दर्जनों पंखे और बल्ब डैमेज हो गये।

बाबू साहेब बहुत प्रेशर बनाते हैं। आखिर में शिव शंकर सारी बात लाइनमैन पर छोड़ देता है। बाबू साहेब लाइनमैन को फोन लगाते हैं। लाइनमैन भी पहले वही सारी दलीलें देता है और फिर कहता है जेई साहेब से बात कर लीजिए वो कह देंगे तो जोड़ देंगे। निजी बिजली व्यवस्था में बिना जीवन की सुरक्षा, सामंतवादी माहौल और आर्थिक असुरक्षा के बीच यह एक संविदा बिजलीकर्मी के रोज़मर्रा की ज़िंदगी की विडम्बना है।

बिना सेफ्टी शूज, बिना सेफ्टी ग्लव्स और बिना सेफ्टी उपकरण के आप लोग अपना जीवन ख़तरे में डालकर बिजली के खम्भों पर क्यों चढ़ते हो? जवाब में शिव शंकर कहते हैं कि क्या करें, जब ठेकेदार नहीं देता?

बिना सेफ्टी उपकरण ट्रांसफार्मर ठीक करता कर्मचारी

पत्रकार अगला सवाल दागता है कि आप लोग सभी संविदा बिजलीकर्मी एकजुट होकर मांग क्यों नहीं करते कि बिना सुरक्षा उपकरण के बिजली के खम्भों का काम नहीं करेंगे। जवाब में उनके चेहरे पर एक पीड़ा उभर आती है। बहुत ही निरीह भाव से शिव शंकर बताते हैं कि मांग ही तो करने गये थे। क्या हुआ, सबकी दो-दो दिन की सैलरी काट ली गयी।

दरअसल शिव शंकर 16-18 मार्च के बीच हुई तीन दिवसीय बिजली कर्मियों की हड़ताल की ओर इशारा कर रहे हैं, बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद सभी बिजली कर्मियों की दो-दो दिन की तनख्वाह काट ली गयी थी।

उत्तर प्रदेश में बिजली के निजीकरण का प्रयास बहुत तेजी से हो रहा है। बिजली उपकेंद्रों के परिचालन, लाइनों के ऑपरेशन, मीटर लगाने से लेकर मरम्मत करने तक का काम सब ठेके पर हो रहा है। उत्तर प्रदेश में ‘प्राइम वन’ कंपनी को प्रयागराज और वाराणसी जिले में टेंडर दिया गया है। जबकि ग्लोबल क्रिएशन्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी भी यूपी पॉवर कार्पोरेशन के लिए आउटसोर्सिंग के जरिए बिजली कर्मियों को हायर एंड फॉयर करती है।

शिव शंकर बताते हैं कि संविदा पर रखे गये एक नॉन स्किल्ड बिजली कर्मी की तनख्वाह 8 हजार और कुशल बिजली कर्मी की मासिक तनख्वाह 10 हजार रुपये हैं। इसमें पीएफ भी शामिल है। बिजली सप्लाई बहाल करने की भाग-दौड़ में जो बाइक का पेट्रोल जलाते हैं उसका पैसा नहीं दिया जाता है। सामाजिक सुरक्षा के नाम पर केवल एक्सीडेंटल बीमा का प्रावधान है। वो भी काम के दौरान एक्सीडेंट होता है तो। वर्किंग पीरियड के आगे पीछे यानि काम से घर या घर से काम पर आते वक्त अगर कोई दुर्घटना होती है तो वो बीमा में नहीं है।

दूसरा दृश्य एक अन्य गांव का है। बाज़ार की मुख्य सड़क से जोड़ने वाली गांव की सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा है। सड़क लोक निर्माण विभाग के प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी थी। इस सड़क के मरम्मत का काम ठेके पर हो रहा है। मौके पर ठेकेदार का मेठ काम करवा रहा है। दोपहर का समय है सिर पर चिलचिलाती धूप है, और नीचे सड़क पर खौलते कोलतार (डामर) में सनी गिट्टियां।

बिना सेफ्टी उपकरण सड़क बनाते मजदूर

एक मज़दूर एक कनस्टर (रिफाइंड ऑयल का 15 लीटर का टिन) का हैंडल पक़डकर खौलते डामर का सड़क पर छिड़काव कर रहा है। न उसके मुंह पर जहरीली गैस से बचाव करने वाला मास्क है, न हाथों में सेफ्टी ग्लव्स। उस मज़दूर के पीछे-पीछे आधा दर्जन मज़दूर घिसा-पिटा हवाई चप्पल पहने बेल्चा से सड़क पर गिट्टी फैलाने का काम कर रहे हैं।

ऐसे में इन मज़दूरों के हाथ, पांव पर गलती से डामर गिर जाये या छलककर आ जाये तो खाल उधड़ना तय है। डामर से इनके जलने के पूरी गुंजाइश बनी हुई है। बिना सेफ्टी मास्क के लम्बे समय तक काम करते रहने से इन मज़दूरों के फेफड़ों में संक्रमण होने की भी आशंका है।

बिना सेफ्टी उपकरण के क्यों काम कर रहे हो? पूछने पर कई मज़दूर एक साथ बोल पड़ते हैं ठेकेदार नहीं दे रहा। यही सवाल मेठ से पूछने पर मज़दूरों को बहुत पतला लेयर डालने और एक समान गिट्टी फैलाने का आदेश देता हुआ वो भी वही मज़दूरों वाला जवाब दोहराता है और काम का बहाना करके दूर हट जाता है। साथ ही वो मज़दूरों को भी लगातार आदेश देता हुआ काम में इंगेज रखने की कोशिश करता है ताकि मज़दूर बात न कर सकें।

ये मज़दूर दिहाड़ी पेशा हैं यानि इनकी महीने की कोई बंधी हुयी तनख्वाह नहीं है। शायद इसलिए भी ठेकेदार ने इन मज़दूरों को सेफ्टी उपकरण देना मुनासिब नहीं समझा।

बिना सेफ्टी उपकरण सड़क बनाते मजदूर

सड़क के किनारे मौजूद घर के ड्राइंग रूम में टीवी चल रही है। आवाज़ सड़क तक आ रही है। तेज वॉल्यूम टीवी पर धूम्रपान से ख़तरे का एक विज्ञापन चल रहा है। आवाज़ से जेहन में एक दृश्य उभरता है। एक मॉचोमैन फेफड़ों पर रखे स्पंज को निचोड़कर एक गिलास टार निकालता है और कहता है इतना टार आपको बीमार बना सकता है। लेकिन इन बिना मास्क के डामर फैलाने वाले मज़दूरों की बीमारी पर कोई बात नहीं करता।

दो दशक से संगठित और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले डॉक्टर कमल उसरी कहते हैं कि ठेका प्रथा आधुनिक ग़ुलामी है, यह उसी का असर है। ठेकेदार/आउटसोर्सिंग नियोजकों को सिर्फ़ मुनाफ़ा चाहिए, वो जीवन रक्षक औजारों पर पैसे कहां ख़र्च करते हैं? उनके लिए मजदूरों के जीवन की कोई क़ीमत नहीं होती है। क्या सचमुच इन मज़दूरों का सामाजिक मूल्य, आर्थिक मूल्य और जीवन मूल्य मौजूदा व्यवस्था में कुछ भी नहीं है?

(प्रयागराज से सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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