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2020 का सफरनामा: त्रासदियों के साथ ऐतिहासिक आंदोलनों की इबारतें भी हैं शामिल

नया साल 2021 की पहली सुबह ऐतिहासिक किसान आन्दोलन टिकरी बॉर्डर दिल्ली के तम्बू में एक नया सकूँ दे रही है।

साल 2020 जनवरी की पहली सुबह भी आन्दोलन के साथ ही शुरू हुई थी। भारतीय फासीवादी सत्ता द्वारा अल्पसंख्यक मुस्लिमों व बहुसंख्यक गरीब आवाम के खिलाफ लाया गया काला कानून सिटिजनशिप अमेंडमेंट एक्ट CAA व नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप NRC जिसके खिलाफ भारतीय मुस्लिमों का ऐतिहासिक आन्दोलन 2019 में शुरू हुआ। इस आन्दोलन को मुल्क के प्रगतिशील पत्रकारों, छात्रों, नौजवानों, प्रोफेसरों, कलाकारों ने मजबूती से समर्थन दिया।

भारत की आजादी के बाद पहली बार मुस्लिम समुदाय ने एक संगठित और मजबूत आन्दोलन शुरू किया। इस आन्दोलन में मुस्लिम महिलाओं की मजबूत भागीदारी ने मुल्क के हुक्मरानों व धर्म के ठेकेदारों को हिला दिया। इसी आन्दोलन में शाहीन बाग जो इस आन्दोलन का केंद्र बिंदु था एक ऐतिहासिक जगह बन गया। आन्दोलन में शामिल दादी बिलकिस बानो पूरे विश्व में छा गयीं। 90 साल की दादी से सत्ता डरने लगी।

फासीवादी सत्ता की आईटी सेल व गोदी मीडिया ने इस आन्दोलन के खिलाफ बहुसंख्यक समुदाय में व्यापक झूठा प्रचार किया। आंदोलनकारियों को पाकिस्तान परस्त, अलगावादी, आंतकवादी, माओवादी कहा गया। आन्दोलन को देश विभाजन करने वाला बताया गया। मुल्क में जगह-जगह सत्ता समर्थकों ने आंदोलनकारियों पर हमले किये। दिल्ली में हिंदुत्वादी गुंडों ने प्रदर्शकारियों पर गोलियां चलाई। दिल्ली पुलिस सत्ता के इशारे पर गुंडों के साथ खड़ी रही।

सत्ता और मीडिया के झूठे प्रचार व व्यापक साजिश के चलते दिल्ली में कहने को तो हिंदू-मुस्लिम दंगे शुरू हुए लेकिन एक किस्म का ये एकतरफा नरसंहार था। सत्ता ने उत्तर प्रदेश से गुंडे बुलाकर दिल्ली में कत्लेआम किया। दिल्ली पुलिस भी सत्ता की इस साजिश का हिस्सा थी। दंगों के बाद आन्दोलन समर्थक बुद्विजीवियों व छात्रों खासकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों की गिरफ्तारी की गई। उतर प्रदेश व दिल्ली में मुस्लिम नौजवानों व आन्दोलन समर्थक बुद्विजीवियों को बड़ी तादाद में जेल में डाल दिया गया। उतर प्रदेश की सत्ता जो तानशाही में केंद्र की सत्ता से दो कदम आगे दिखने की होड़ मचाये हुए है इस सत्ता ने आंदोलनकारियों की सम्पत्ति कुर्क करने के नोटिस जारी किए गए। डॉक्टर काफिल, सदफ जफर, एस. दारापुरी, चन्द्रशेखर की गिरफ्तारी सबको मालूम है।

दंगों के कुछ समय बाद ही मुल्क को कोरोना महामारी ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। सत्ता ने मुल्क में लॉक डाउन लगा दिया। फासीवादी सत्ता ने एक बार फिर अपना धार्मिक गन्दा खेल खेला,  कोरोना महामारी को भारत में फैलने का मुख्य दोषी तब्लीगी जमात के एक कार्यक्रम को आधार बनाते हुए, अपने झूठे प्रचार तंत्र के सहारे भारतीय मुस्लिमों को बना दिया।

पूरे मुल्क में जगह-जगह मुस्लिमों को आम जनता व पुलिस द्वारा पीटा जाने लगा। सभी मुस्लिमों को घृणा की नजर से देखा जाने लगा। कोरोना में आई प्रत्येक कठनाई का गुस्सा सरकार पर निकलने की बजाए सरकार द्वारा बनाये गए छद्म दुश्मन मुस्लिमों पर निकलने लगा। कितनी ही जगह पागल लोगों को भी मुस्लिम समझ कर पीट दिया गया। इसी झूठे प्रचार के प्रभाव में आकर डॉक्टर जिसको भगवान का रूप माना गया। उसने अनेकों जगह मुस्लिमों का इलाज करने से मना कर दिया।

सत्ता के गैर जिम्मेदाराना और तानाशाही फैसलों के कारण मुल्क का करोड़ों मजदूर हजारों किलोमीटर तपती धूप में पैदल चलने को मजबूर हुआ। पैदल जा रहे मजदूरों पर सत्ता ने पुलिस के द्वारा लाठी-डंडों से दमन किया। सफर में हजारों मजदूरों ने दम तोड़ दिया।

कोरोना की आड़ में जब मुल्क के आवाम को घरों में कैद कर दिया गया। ठीक उस समय भारत की फासीवादी सत्ता ने श्रम कानूनों में मालिकों के पक्ष में बदलाव किया। काम के घण्टे 8 से 12 कर दिए गए। सार्वजनिक उपक्रमों रेल, एयरपोर्ट व दूसरी सार्वजनिक सम्पत्तियों को लुटेरे पूंजीपति को नमक के भाव में बेच दिया गया। कोरोना की आड़ में ही दिल्ली दंगों के झूठे केस में अनेक छात्र नेताओं को जेल में डाल दिया गया। उमर खालिद, शरजील इमाम, सफूरा जरगर, नताशा नारवाल, देवांगना, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान ये लिस्ट बहुत लम्बी है जिनको फासीवादी सत्ता ने 2020 में जेल की सलाखों के अंदर कैद कर लिया गया।

शिक्षा नीति जैसा काला कानून हो या श्रम सुधार के नाम पर मजदूरों को गुलाम बनाने का कानून हो। सत्ता ने बेशर्मी से इन कानूनों को लागू किया।

2020 ने अनेकों बुद्विजीवियों, कलाकारों, कवियों, फिल्मकारों को भी हमसे सदा-सदा के लिए छीन लिया। राहत इंदौरी, इरफान, ऋषि कपूर का जाना बहुत पीड़ादायक था।

खेती से जुड़े तीनों काले कानूनों को भी संवैधानिक मूल्यों को ताक पर रखते हुए संसद से पास करवा लिया गया।

लेकिन सत्ता को शायद अंदाजा नहीं था कि वो शेर के मुँह में हाथ डाल रही है। हरियाणा में एक कहावत है कि “दही के चक्कर में कपास ना खा जाइये” मुल्क की सत्ता के साथ भी ऐसा ही हुआ।

इन तीनों काले कानूनों के खिलाफ पंजाब की जमीन से आवाज उठनी शुरू हुई। धीरे-धीरे पूरे पंजाब में आन्दोलन फैल गया। पंजाब के लगते हरियाणा के इलाकों में भी आन्दोलन ने रफ्तार पकड़ी। इनके साथ ही जीटी रोड बेल्ट हरियाणा में भी आन्दोलन शुरू हुआ। हरियाणा के पिपली में हुआ किसान प्रदर्शन जिस पर हरियाणा की सत्ता ने भयंकर लाठीचार्ज किया।

पंजाब सूबे के हर कोने में जत्थे बंधिया हुईं। पक्के मोर्चे, रेल लाइनों, टोल नाकों पर शुरू हुए। तानशाही सत्ता ने किसानों से बात करने की बजाए रेल के मार्फ़त पंजाब जाने वाला खाद्यान, तेल, खाद सब रोक दिया।

सत्ता के इस तानाशाही रैवये से किसानों में गुस्सा और ज्यादा बढ़ गया। इस रैवये को पंजाब का किसान जो बहुमत सिख है, सिख जिनका तानाशाही और घमंडी सत्ताओं से लड़ने का इतिहास रहा है। पंजाब ने एक बार फिर घमंडी सम्राट को उसकी औकात दिखाने के लिए कमर कस ली। पूरे पंजाब में जमीनी स्तर पर दिल्ली कूच के लिए तैयारी तेज हो गयी।

26 नवम्बर का वो ऐतिहासिक दिन जब पंजाब के किसानों ने दिल्ली के लिए रवानगी की इसके जवाब में हरियाणा की तानाशाही सत्ता ने संविधान को धता बताते हुए हरियाणा के सभी पंजाब के लगते बॉर्डर को व दिल्ली आने वाले सभी रास्तों को जगह-जगह खुदवा दिया, बड़े-बड़े पत्थरों से कंटीले तार लगा कर बैरिकेटिंग कर दी गयी। लेकिन पंजाब व हरियाणा के किसानों के काफिलों ने तानाशाह की इन जुगाड़ बंधी को ताश के पत्ते की तरह उड़ा दिया। किसान पूरे जोश से ढोल नगाड़े बजाते हुए। दिल्ली के बॉर्डर पर आ डटे। किसानों ने बॉर्डर से 20 किलोमीटर तक सड़कों पर अपने लाव लश्कर लगा दिए।

सत्ता ने एक बार फिर अपना अचूक हथियार चलाया। सत्ता और उसकी गोदी मीडिया ने आन्दोलनकारी किसानों को खालिस्तानी, माओवादी, अलगाववादी, मुल्क के विकास को बाधा पहुंचाने वाले, देशद्रोही की संज्ञा दी।

लेकिन इस बार सत्ता का दांव उल्टा पड़ गया। जितना सत्ता ने किसानों के खिलाफ जहर उगला उतना ही हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश का किसान अपने लाव लश्कर के साथ दिल्ली बॉर्डर की तरफ रवाना होता गया।

नया साल 2021 की पहली किरण तक दिल्ली को सत्ता ने एक किले में तब्दील कर दिया। दिल्ली आने वाले सारे रास्ते कंटीले तार लगे बैरिकेटिंग लगा कर बन्द कर दिए गए। इसके विपरीत किसानों ने भी बॉर्डर से 20 किलोमीटर तक सड़कों पर अपने लाव लश्कर डाल दिये। 2020 में दिल्ली ने अपनी आंखें CAA/NRC के खिलाफ चल रहे ऐतिहासिक आन्दोलन के साथ खोली थी। 2020 ने हजारों जख्म भारतीय सत्ता के कारण झेले हैं। लेकिन 2020 ने अपनी आंखें जब 31 दिसम्बर को बंद की तो उसकी आँखों में एक सुकूँ था। वो सुकूँ था फासीवादी सत्ता के खिलाफ महान किसान आन्दोलन की गूंज जो जीत की तरफ बढ़ रही थी। 2021 फासीवादी सरकार की हार के साथ मेहनतकश आवाम को एक नई सुबह की तरफ लेकर जाएगा इसी उम्मीद के साथ नए साल का स्वागत ऐतिहासिक किसान आन्दोलन के मैदान से करते हैं।

(उदय चे एक्टिविस्ट और पत्रकार हैं।)

This post was last modified on January 9, 2021 11:26 am

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