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अजय सिंह: प्रतिबद्ध जीवन की आत्मीय कविता

नई दिल्ली। वरिष्ठ वामपंथी बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट, पत्रकार व कवि अजय सिंह के जो चाहने वाले पिछले सप्ताह उनके चिकनगुनिया जैसी बीमारी से पीड़ित होने को लेकर चिंतित थे, वे दो दिन पहले सोमवार को उनकी कविताएं सुनने के लिए दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में जमा थे। बीमारी और उम्र का असर उनके हौसले पर नहीं था। उम्र भर पॉलिटिकली करेक्ट रहने और साथियों को भी लगातार सचेत करते रहने की कोशिश में मुब्तिला रहे अजय सिंह की कविताएं भी साहस के साथ यह काम करती हैं। अपनी नई कविताओं में उन्होंने साहस और रेटरिक के अपने पुराने तरीक़े के साथ प्रेम व जीवन के दूसरे आत्मीय प्रसंगों और छवियों को भी शामिल किया है। कविता पाठ के इस कार्यक्रम की ख़ास बात यह रही कि कविताओं के बहाने राजनीति, समाज, मनुष्य और कविता के तौर-तरीक़ों पर दिलचस्प और गंभीर बातचीत भी हुई।     

`हत्यारे को हत्यारा कहना

भाषा के सही इस्तेमाल की पहली सीढ़ी है`

इन कविता पंक्तियों वाले `गुलमोहर किताब` बैनर के तले हुए कवितापाठ में अजय सिंह ने इस लिहाज से निराश नहीं किया। उनकी राजनीतिक कविताएं प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को सीधे संबोधित थीं तो वामपंथ के अंतर्विरोधों पर भी बेबाकी से मुखर थीं। उन्होंने अपना कवितापाठ प्रो. सैयद अहमद गिलानी को भारतीय मानवाधिकार आंदोलन के एक मज़बूत स्तंभ के रूप में याद करते हुए समर्पित किया। गो, उनके साथी वक्ताओं ने उनकी कविताओं में राजनीतिक-सामाजिक हालातों से उपजी निराशा और मायूसी भी महसूस की पर उन्होंने अर्जेंटीना आदि लातिन अमेरिकी देशों में वामपंथ के उभार का हवाला देते हुए पूंजीवादी-साम्राजयवादी ताकतों द्वारा की जाने वाली `वामपंथ के अंत की घोषणा` को झूठा करार दिया।

अजय सिंह ने विशुद्ध राजनीतिक कविताओं के अलावा ऐसी भी कई कविताएं सुनाईं जो एक राजनीतिक कार्यकर्ता के आत्मीय प्रसंगों, बिछुड़ गए साथियों, उदासियों और मुहब्बतों और कुल मिलाकर एक मनुष्य के कोमल व्यक्तित्व को सामने लाती थीं। इन कविताओं में बहुत सी पंक्तियां ख़ुश और उदास करती थीं। बिछुड़ गए साथियों के लिए लिखी गई कविताओं की कुछ पंक्तियां देखिए।

कवि और पत्रकार अजय सिंह, संपादक और कहानीकार पंकज बिष्ट और कवि मंगलेश डबराल समेत दूसरे श्रोतागण।

`निर्मला ठाकुर, तुम्हारी ज़िंदगी / उस समर्पित तानपुरे की तरह थी / जिसे कपड़े की खोली ओढ़ाकर / कमरे के एक कोने में रख दिया गया / कभी बजाय़ा नहीं गया/ जिस पर धूल जमती रही`।

`तुम जब मरे / हिदी कहानी जगत ने / अपनी कृतघनता में चैन की सांस ली` (मोहन थपलियाल के लिए)।

`उसका प्यार ही उसका पोलिटिकल स्टेटमेंट होता था` (अजंता लोहित के लिए)

`तुम हाय इलाहाबाद-हाय इलाहाबाद करते रहे / मरे दिल्ली में`। (नीलाभ के लिए)

अपने पुराने मित्र नीलाभ की याद में लिखी गई कविता इस लिहाज से भी मार्मिक थी कि अजय सिंह उनकी ख़ूबियों को भी शिद्दत के साथ याद कर रहे थे और उनके अंतर्विरोधों को लेकर कड़े भी थे।

वीरेन डंगवाल और पंकज सिंह पर भी उन्होंने कविताएं सुनाईं और इस श्रृंखला में एक शोक कविता अपने लिए भी शामिल की। अजय सिंह के लिए लिखी गई अजय सिंह की इस कविता में इन पंक्तियों को देखिए –

`उसके ज़्यादातर समकालीन / प्रेम को महाफ़ालतू, महा समयखाऊ, महावाहियात काम समझते थे / हालांकि औरत के लिए उनकी लपक देखते बनती थी`।

रामचन्द्र शुक्ल को हिन्दी के खलनायक की तरह चिह्नित करने वाली कविता `हिन्दी के पक्ष में ललिता जयंती एस रामनाथन का मसौदा प्रस्तव : एक संक्षिप्त बयान` एक सच को दर्ज़ करने वाली कविता थी।

`हिन्दी हिन्दू हुई जा रही है

हिन्दी न हुई

हिन्दू महासभा हो गई

जिसका सरगना मदन मोहन मालवीय था`

`हिन्दी को हिन्दू होने से बचाना है

तो उसे रामचन्द्र शुक्ल से बचाना होगा

और उन्हें पाठ्यक्रम से बाहर करना होगा

और नये सिरे से लिखना होगा

हिन्दी साहित्य का इतिहास`

(हिन्दी के पक्ष में…` कविता के अंश)

वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने इस कविता के बारे में कहा कि कुछ ऐसी बातें जो सब जानते हुए भी छुपाते हैं या कहने का साहस नहीं करते हैं या उससे हमारी किसी स्थिति पर आंच आती है। मसलन, हिन्दी नवजागरण की बहस। रामचंद्र शुक्ल के बारे में जो कहा गया है, वो अक्षरश: सत्य है। रामचंद्र शुक्ल रूसी क्रांति के भी और ग़ालिब के बहुत जबर्दस्त ख़िलाफ़ थे। शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास एक सवर्ण दस्तावेज है। असद ज़ैदी का तो मानना है, हिन्दी कविता वहां से शुरू होती है जहाँ रामचंद्र शुक्ल का हिन्दी का इतिहास बंद हो जाता है, जहां बिल्कुल बंद कर दिया जाता है।

डबराल ने कहा कि अजय सिंह की कविताएं देश में बढ़ रहे अंधेरे व बदबख़्ती, वामपंथ की बढ़ती विफलता और इसके साथ बढ़ती कवि की बेचैनी की कविताएं हैं। अजय सिंह की कविताएं कभी घोषणापत्र की तरह, कभी किसी विरोध प्रस्ताव की तरह और कभी किसी दस्तावेज की तरह लगती हैं जिन्हें कवि का आवेग कविता की शक़्ल दे देता है। रेटरिक के अच्छे इस्तेमाल की खूबी अजय सिंह की कविताओं को पठनीय और विचारणीय बनाती है।

इस बहाने मंगलेश डबराल ने कविता में रेटेरिक के इस्तेमाल को लेकर ख़ूबसूरत बातें साझा कीं। उन्होंने कहा कि रेटेरिक का इस्तेमाल कुछ कांच की तरह होता है। `कारगह-ए-शीशागरी` की तरह जिसे हैंडल करना बड़ा मुश्किल होता है। वो बड़ा बलवान होता है लेकिन होता बड़ा नाज़ुक है। उसका बहुत अच्छा इस्तेमाल करना बहुत कम लोग जानते हैं। मसलन महाकवि शमशेर जानते थे। जैसे कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो एक कविता है। हालांकि. उन्होंने अजय सिंह की कविताओं में आकस्मिकता गायब होने की शिकायत भी की । उन्होंने कहा, मेरी निगाह में कविता बहुत आकस्मिक पैदा होती है। उसमें आकस्मिकता शामिल रहती है। `समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई` बहुत आकस्मिक पंक्ति है जैसे `हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है`। `समथिंग हैपन्स ऑल ऑफ ए सडन`. कविता इससे उड़ान लेती है।

मार्क्सवाद औऱ आम्बेडकरवाद की एकता की कोशिशों से जुड़ी बहस इस कविता गोष्ठी में भी छायी रही। अजय सिंह की कविता में वामपंथ के ऐसे पुनर्जीवन की इच्छा थी जो दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों सब को साथ लेकर चल सके। आम्बेडकरवादी चिंतक प्रो. हेमलता महिश्वर भी अजय सिंह के कवितापाठ के बाद अपनी टिप्पणी में कह चुकी थीं कि आम्बेडकर के बिना भारत में परेशानियां खत्म होने वाली नहीं हैं। मंगलेश डबराल ने कहा कि आम्बेडकर और मार्क्सवाद में एकता स्थापित करने की जो कोशिशें हुईं, वे विफल हुई हैं। इतिहास अनवरत कहता है, मैं वापस जाऊंगा। इतिहास बार-बार लौटकर आता है, आजादी से पहले का भी, आज़ादी के तुरंत बाद का भी। मार्क्सवाद और आम्बेडकरवाद में जो बाइनरीज खड़ी कर दी गई हैं, उनको पाटना उस इतिहास के कारण मुश्किल है।

राजसत्ता का स्वरूप फासिस्ट है। हमारे यहां बहुभाषिकता, बहुधार्मिकता, बहु सांस्कृतिकता और आचरण की बहुलता नहीं होती तो यहां जर्मनी से भी भयंकर फासिज़्म कब का आ चुका होता। फ़िलहाल हिन्दूकरण बड़े पैमाने पर हो चुका है। फ़ासिस्टों के जीतने का यही राज है। मार्क्सवाद, आम्बेडकरवाद और नारीवाद, इन तीनों ताकतों के एक हुए बिना भारत में बुनियादी बदलाव असंभव है। बीच की खाई को कैसे पाटा जाए, यह एक बहुत बड़ा सवाल है।

आम्बेडकरवादी लेखिका-चिंतक प्रो. हेमलता  महिश्वर ने अजय सिंह की कविता में शामिल वामपंथ के पुनर्जीवन की चिंता का ज़िक्र करते हुए कहा कि वामपंथ निश्चित तौर पर एक बहुत बड़ी विचारधारा है। विचारधारा को बर्बाद करने वाले उसके फॉलोअर्स होते हैं। आम्बेडकर के बगैर भारत में परेशानियां खत्म होने वाली नहीं हैं। दलित, स्त्री, इन दोनों को लेकर जिस तरह का एक बहुत गंभीर विमर्श आम्बेडकर, फुले खड़ा करते हैं, वो चीज़ें वहां दिखाई नहीं देंगी।

प्रो. हेमलता ने कहा कि अजय सिंह कविता से सार्थक सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप करते हैं। ऐसे समय में जब साहित्यकार दो खेमों – एक सत्ता के साथ और एक समाज के, में बंटे हुए हैं, यह महत्वपूर्ण है। उन्होंने डॉ. आम्बेडकर को उद्धृत करते हुए कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि बुद्धिजीवी वर्ग किसके साथ खड़ा है। बुद्धिजीवी वर्ग अपने शाब्दिक चातुर्य के कारण धूर्त भी होता है। प्रो. हेमलता ने कहा कि अजय सिंह ने रामचंद्र शुक्ल पर बड़ा खुलकर कहा। हम जैसे लोग तो कहते हैं कि यह हिन्दी साहित्य नहीं, हिन्दू साहित्य है। मैं एक बड़ी रेखा रामचंद्र शुक्ल के लिए ही नहीं, रामविलास शर्मा के लिए भी खड़ी करती हूँ।

रामविलास शर्मा जब हिन्दी नवजागरण की बात कर रहे हैं तो उनके यहाँ से ज्योतिबाफुले पूरी तरह गायब हैं। प्रार्थना समाज उनकी चिंता के केंद्र में है पर सत्यशोधक समाज जो पूरी मानवता के लिए काम कर रहा था, वो सिरे से गायब है। बुद्धिजीवी वर्ग चयनित लोगों को ही अपनी चर्चा का केंद्र में बनाएगा समय उसे कभी माफ़ नहीं करेगा। अलक्षित चीजें तक सामने आएं पर लिखित दस्तावेजों से मुंह मोड़ लेना, अपने स्थापित होने का नाजायज़ फायदा उठाना है।

समयांतर के संपादक और जाने-माने कहानीकार पंकज बिष्ट ने कहा कि आइडियोलोजिकल पैरामीटर्स फिट रखने वाले अजय सिंह अभी तक उनके लिए क्रांति के कवि थे। अब वे क्रांति और प्रेम के कवि हैं। उन्होंने कहा कि आवेग के कवि अजय सिंह में वे पहली बार निराशा, थकान और ठहराव सा महसूस कर रहे हैं। शायद इसलिए कि विचारधारा और एक व्यक्ति के तौर पर जो होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि हम समकालीन लोग जब लेखन के जरिये ख़ुद को अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रहे थे और राजनीति की समझ विकसित कर रहे थे तो ऐसी उदासी और मायूसी के दौर की कल्पना दूर-दूर तक नहीं थी।

देश और दुनिया में जिस तरह की उथल-पुथल थी और प्रोग्रेसिव ताक़तें जिस तरह की कामयाबियां हासिल कर रही थीं, एक बेहतर बदलाव की उम्मीदें बन रही थीं। क्रांति और विरोध की यह गूंज लातिन अमेरिका से लेकर हमारे यहां तक कविताओं में भी थी। आज जिस तरह का राजनीतिक व सामाजिक पतन दिखाई देता है, निश्चित रूप से निराशा होगी ही। वाम आंदोलन का पतन व बिखराव और भी निराश करता है। अजय सिंह की कविताओं मे जो बदलाव दिखाई दे रहा है, उसकी एक वजह यह है।

वरिष्ठ कवयित्री सविता सिंह ने कहा कि अजय सिंह की कविताओं में कवि का जीवन है। यह बड़ी बात है कि कविता ही जीवन न हो बल्कि जीवन भी कविता हो जाए। इन कविताओं में एक सच्चाई है और यह एक बहुत ईमानदार किस्म का  बयान है। ऐसा बहुत कम ही होता है कि लोग बिना इगोइस्टिक हुए जीवन के बारे में बातचीत करें। इन कविताओं से यह लगा ही कि ये पॉलिटिकल एलिएशन का दौर है। आज का भारतीय मनुष्य थोड़े समय में ही भूल रहा है कि एक अच्छा जीवन क्या होता है, प्यार भरा मानवीय जीवन क्या होता है, कौन सी संवेदनाएं हैं जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती हैं।

ये कविताएं सुनते हुए एक ऐसी दुनिया मिलती है जिसे मैं जानती थी। कविताओं में दुख समझने की और एक स्त्री को समझने की कोशिश बहुत अच्छी है। बहुत डाय़रेक्टली किस्म की, नाम लेकर बोलने वाली कविताएं जिनमें अजय सिंह सच को सच की तरह बताना चाह रहे हैं, दुस्वपन की तस्वीरों की तरह हैं। कला इस समय का सबसे बड़ा व्यंग्य और विडंबना है। इन कविताओं की मानवीयता सबसे बड़ी चीज़ है।

कविताओं में सपाटबयानी की कुछ श्रोताओं की शिकायत पर कवयित्री विपिन चौधऱी ने कहा कि अजय सिंह की कविताएं एक एक्टिविस्ट और पत्रकार के जीवन को ध्यान में रखकर पढ़ी जानी चाहिए। कवि-पत्रकार मुकुल सरल ने स्वागत वक्तव्य दिया। कार्यक्रम का संचालन भाषा सिंह ने किया।

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)

This post was last modified on November 7, 2019 1:10 pm

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