Wednesday, April 17, 2024

‘आतंकवादी का फर्ज़ी ठप्पा’: राज्य व्यवस्था की क्रूरता की सच्ची दास्तां

भारतीय राज्य व्यवस्था के बेपर्दा और क्रूर चेहरे को करीब से देखना हो तो मोहम्मद आमिर ख़ान की किताब (साथ में नंदिता हस्कर) ‘आतंकवादी होने का फर्ज़ी ठप्पा’ के पास जाइए। यह साल 2016 में आई मूल अंग्रेजी किताब ‘फ्रेम्ड ऐज़ ए टेरेरिस्ट’ का प्रोफेसर राजेंद्र चौधरी द्वारा किया गया अनुवाद है। इसे ‘गुलमोहर किताब’ ने इसी साल प्रकाशित किया है।

‘आतंकवादी होने का फर्ज़ी ठप्पा’ पुरानी दिल्ली के एक नौजवान मोहम्मद आमिर ख़ान की सच्ची और हौलनाक कहानी है; जिसे आतंकवाद के निहायत झूठे इल्ज़ामात में चौदह साल उस आजाद मुल्क की जेलों की सलाखों के पीछे काटने पड़े-जिसे हम मुकम्मल आज़ाद होने का भ्रम 1947 से लेकर अब तक पाले हुए हैं। इस भ्रम का यथार्थ मोहम्मद आमिर ख़ान की रूह और जिस्म पर रिहाई के बाद भी मौजूद है।

‘आतंकवादी का फर्ज़ी ठप्पा’ महज आमिर की कहानी नहीं है बल्कि उन सरीखे हजारों बेगुनाह अल्पसंख्यकों और हाशिए के लोगों की कहानी भी है, जो अमानवीय सरकारी तंत्र का शिकार होकर बरसों-बरस से नरक से बद्तर जेलों में सड़ रहे हैं। बेगुनाही के बावजूद कई जेलों में ही मर-खप जाते हैं और बेशुमार जब अंधेरी सुरंगों से बाहर आते हैं तो नागरिक और मनुष्य होने का हक़ काल कोठरियों में छोड़ आते हैं।

हर कोई मोहम्मद आमिर ख़ान जैसा खुशनसीब नहीं होता, जो लौटकर नया व आशावादी मुस्तकबिल तलाशे और बाकायदा किताब लिखकर अवाम को स्टेट का असली चेहरा दिखाए। बताए कि अल्पसंख्यक-खासतौर पर मुसलमान होने की सज़ा इस देश में कैसे दी जाती है। खाकी अपने मूल चरित्र में किस हद तक अल्पसंख्यक विरोधी हो चुकी है, यह किताब इसकी भी एक पुख्ता बानगी है।

आमिर मोहम्मद ख़ान ने तकरीबन अठारह वसंत देखे होंगे कि ख़ुफ़िया एजेंसियों और पुलिस ने बाकायदा व्यापक साजिश रचकर उन्हें बम विस्फोट और हत्या के लिए गुनाहगार साबित करते हुए खतरनाक आतंकवादी घोषित कर दिया। पूरे तेरह साल दस महीने उन्होंने बतौर अपराधी जेल में बंद रहकर काटे। जबकि उन्हें जेल भेजने वाले भी बखूबी जानते थे कि उनका असल अपराध बेगुनाही है!

लगभग चौदह साल मानवविरोधी जीवन जीने के बाद वह जब रिहा होकर बाहर आए तो 32 साल के हो चुके थे। यानी एक किशोर जेल में अपनी जवानी खो चुका था। इस दरमियान उन्हें सिर्फ दो घंटे की रिहाई मिली जब वह अपने अब्बा से मिलने अस्पताल गए। बेटे के इंसाफ के लिए टूट गए पिता असामायिक जीवन संध्या में थे। बाद का संघर्ष बूढ़ी और बीमार मां के हवाले हो गया। जेल में बंद आमिर अपने पिता को अपने हाथों से सुपुर्द-ए-ख़ाक भी नहीं कर पाए। लाश में तब्दील हो गए अपने प्यारे अब्बू के आखिरी दीदार भी नहीं कर पाए। यह भी उनकी बेबसी का शिखर था।

भारतीय खुफिया एजेंसी का एजेंट (कथित) ‘गुप्ता’ आमिर मोहम्मद ख़ान से पाकिस्तान की जासूसी करवाना चाहता था। आमिर की एक बहन की शादी कराची हुई थी। वह उससे मिलने पाकिस्तान का वीजा लगवाने दूतावास गए तो इस एजेंट ने उनसे संपर्क किया और कहा कि देश हित में वह पाकिस्तान से कुछ जानकारियां और दस्तावेज़ लेकर आएं। देशप्रेम की भावना में आमिर इसके लिए तैयार हो गए लेकिन बगैर प्रशिक्षण के यह संभव नहीं था और ट्रेनिंग के लिए वक्त नहीं मिला। सो यह काम वह (भावनात्मक आग्रहों के बावजूद) पाकिस्तान जाकर भी कर नहीं पाए।

भारतीय खुफिया एजेंसी का जाल बिछ चुका था। वतन लौटने के बाद उन्हें काबू कर लिया गया। नाकामयाबी की सजा बेहद बर्बर यातनाओं के रूप में दी गई। खुफिया एजेंसी के इशारे पर मोहम्मद आमिर खान का अपहरण करके जबरदस्त कहर ढाया गया। कई दिन अवैध हिरासत में रखा गया। बाद में पाकिस्तान से उनके तार जोड़कर, बम विस्फोट करने वाला आतंकवादी बताकर उन्हें जेल भेज में डाल दिया। अवैध हिरासत में तो घोर अमानवीय यातनाएं दी ही गईं, रिमांड-दर-रिमांड अठारह साल के, जवानी की दहलीज पर खड़े किशोर के जिस्म और आत्मा को बेतहाशा तोड़ा गया।

पुलिस और सरकारी तंत्र से तब के मिले जख्म अब भी रिस्ते हैं। आमिर ने ‘आतंकवादी का फर्ज़ी ठप्पा’ में विस्तार से पुलिस हिरासत और जेल में किए गए थर्ड डिग्री टॉर्चर का जिक्र किया है। उसे पढ़ने के बाद एक बेचैनी और गुस्सा आपकी रगों में दौड़ता है। आप खुद को असहज पाते हैं। तब तो और भी ज्यादा, जब इस तथ्य की ओर ध्यान जाता है कि ऐसा रोज़ और मुद्दतों से हजारों बेगुनाहों के साथ हो रहा है। व्यवस्था का यह दमनचक्र तब से रफ्तार पकड़ गया है; जब से नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली दक्षिणपंथी भाजपा सरकार केंद्र में आई है। विभिन्न राज्यों में भी अल्पसंख्यक कुछ ज्यादा ही पुलिसिया जुल्म का शिकार हैं जहां-जहां भाजपा का शासन है। खासतौर से उत्तर प्रदेश में।

‘आतंकवादी का फर्ज़ी ठप्पा’ में मोहम्मद आरिफ ख़ान ने बारम-बार लिखा है कि उनका यकीन धर्मनिरपेक्ष मूल्यों मं है लेकिन वह इस हकीकत को भी सामने रखते हैं कि जो सुलूक उनके साथ हुआ, बेगुनाही के बावजूद चौदह कीमती साल सलाखों के पीछे काटे-उसके पीछे सबसे बड़ी वजह ‘मुसलमान’ होना है! यहां वह जेल में बंद हजारों नौजवानों का सच सामने रखते हैं जो सिर्फ इसलिए अंधेरी दुनिया के वासी बना दिए गए कि वे मुसलमान अथवा अल्पसंख्यक हैं। गोया मुसलमान और अल्पसंख्यक होना अपने आप में गुनाह है! अपने वतन में वे पराए ही नहीं गद्दार भी हैं। कांग्रेस के शासन में जो परनाले में होता था-भाजपा के शासन में खुलेआम/सरेआम हो रहा है। अल्पसंख्यक विरोधी नैरेटिव निचले तथा गहरे स्तर तक निरंतर फैल रहा है। जहरवाद की जड़ों को समझने के लिए भी मोहम्मद आमिर ख़ान की किताब पढ़नी जरूरी है।

एक बेगुनाह व्यक्ति जवानी के चौदह साल यातनाएं सहते हुए जेल में काट देता है लेकिन उसकी वतन-परस्ती बरकरार रहती है। वह कहता है कि उसे मुसलमान होने की सजा दी गई लेकिन उसे किसी से रत्ती भर भी नफरत नहीं। इसे वह अपनी किताब में विशेष रूप से रेखांकित करता है कि जेलबंदी के दौरान उसके मददगार हाथों में से ज्यादातर हिंदू थे। रिहाई के बाद भी उसे खुलकर गैरमुसलमानों का साथ हासिल हुआ। मोहम्मद आमिर ख़ान खुलदिली से इसे कबूल करते हैं तो आश्वस्ति मिलती है कि भारतीय नागरिक समाज का वास्तविक ताना-बाना सत्ता के तमाम हथकंडों के बावजूद पूरी तरह-तहस-नहस नहीं हुआ है। उम्मीद अभी बाकी है। एकजुटता से लड़कर लड़ाई जीती जा सकती है।

‘आतंकवादी का फर्ज़ी ठप्पा’ में मोहम्मद आमिर ख़ान मार्मिक और वाजिब चिंता जाहिर करते हैं कि उनकी आठ साल की बेटी अनुशा जब बड़ी होगी तो उसे कैसा समाज कैसी दुनिया मिलेगी? जो समाज जो दुनिया अब बनाई जा रही है वह तो… लेकिन इस सबके खिलाफ जंग भी तो जारी है! खैर, यह किताब इसलिए भी पढ़ी जानी चाहिए कि हम मोहम्मद आमिर ख़ान और उन सरीखे युवाओं को हौसला दें। उनके लफ़्ज़ों का सम्मान एक ऐसे शख्स का सम्मान होगा जिसे व्यवस्था की विसंगतियों ने आतंकवादी का झूठा ठप्पा लगाकर सालों तक मौलिक अधिकारों और सम्मानित जिंदगी से वंचित रखा। बेशर्म व्यवस्था और उसके पाए व पैरोकार तो मोहम्मद आमिर ख़ान से माफी मांगने से रहे!

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