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डॉ.कमला प्रसाद: प्रगतिशील आंदोलन का अनथक योद्धा

सज्जाद जहीर और भीष्म साहनी के बाद प्रगतिशील लेखक संघ को एक नई दिशा व ऊर्जा देने वाले डॉ. कमला प्रसाद पांडेय समूची साहित्यिक बिरादरी में अद्भुत सांगठनिक क्षमता और नेतृत्वशीलता के लिए जाने-पहचाने जाते थे। अपनी जिन्दगी के आखिरी समय तक वे कई मोर्चों पर एक साथ सक्रिय रहे। चाहे एक संगठनकर्ता की भूमिका हो, प्रशासक, या आलोचक, या फिर एक सम्पादक की। गोयाकि उन्होंने अपने को मिली हर जिम्मेदारी के साथ इंसाफ किया। सभी समानधर्मा वामपंथी लेखक संगठन एक मंच पर आएं और एक मजबूत वामपंथी सांस्कृतिक मोर्चा बने, यह उनका सपना था। प्रगतिशील लेखक संघ के माध्यम से कमला प्रसाद ने देश में कई पीढ़ियों को वैचारिक रूप से शिक्षित-प्रशिक्षित किया। ऐसे सैकड़ों सर्जनात्मक, रचनात्मक शिविर लगाए, जिनमें नए लेखक एक नई दिशा ग्रहण करते हैं।

उन्होंने लगातार अकादमिक दुनिया और दूर-दराज में बैठे लेखक के बीच एक पुल का काम किया। डॉ. कमला प्रसाद की कोशिशों का ही नतीजा है कि आज सारे देश में प्रगतिशील लेखक संघ की इकाईयां दिखलाई देती हैं। कमला प्रसाद जब तक जिन्दा रहे, प्रगतिशील लेखक संघ के हर छोटे से लेकर बड़े क्रियाकलाप और कार्यक्रम में उनकी छाप दिखलाई देती थी। हर आयोजन में वे केन्द्र में रहते। उनकी शख्सियत ही कुछ ऐसी थी कि वे सबको अपना बना लेते। साहित्यिक बिरादरी में वे एक मशहूर, मारूफ और हरदिल अजीज इंसान थे। अपने करीबी दोस्तों और संगठन में वे कमांडर के नाम से प्रसिद्ध थे और अपने इस नाम को उन्होंने हकीकी जिंदगी में भी चरितार्थ किया।
14 फरवरी, 1938 को मध्यप्रदेश के सतना जिले के धौरहरा गांव के किसान परिवार में जन्मे कमला प्रसाद ने सागर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. के बाद पीएचडी और डी. लिट् की उपाधियां प्राप्त कीं।

उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अध्यापन को अपना पेशा चुना। रीवा के अवधेश प्रसाद विश्वविद्यालय में पहले उन्होंने प्राध्यापक और फिर बाद में विभाग अध्यक्ष के रूप में काम किया। रीवा में कमला प्रसाद ने ‘अंतरभारती’ जैसे बहुकला केन्द्र की नींव रखी। ‘महाकवि केशव अध्यापन एवं अनुसंधान केन्द्र’ के भी वे निदेशक रहे। नौकरी से रिटायर होने के बाद कमला प्रसाद हमेशा के लिए भोपाल के हो गए। भोपाल में वे कई वर्षों तक ‘मध्यप्रदेश कला परिषद्’ के निदेशक रहे। परिषद् में रहकर उन्होंने कई उल्लेखनीय कार्य और आयोजन किए। उनके कार्यकाल में भोपाल पूरे देश में सांस्कृतिक राजधानी के रूप में उभरा।

वे कुछ समय तक ‘केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा’ के उपाध्यक्ष भी रहे। लेकिन इन सब कार्यों के दौरान उनकी संलग्नता और पूरी प्रतिबद्धता प्रगतिशील लेखक संघ से बनी रही। उनका साफ तौर पर मानना था,‘‘प्रतिबद्धता के बिना कोई रचनाकार मुमकिन नहीं।’’ प्रशासनिक और अकादमिक कार्य के साथ-साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ को पूरे देश में मजबूत करने के काम में लगे रहे। साल 2003 में हैदराबाद में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. कमला प्रसाद, संगठन के राष्ट्रीय महासचिव पद के लिए चुने गए। बेगूसराय, बिहार में हुए प्रलेस के 14वें राष्ट्रीय अधिवेशन में उन्हें लगातार दूसरी बार यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। अपने आखिरी समय तक वे इस पद पर कार्य करते रहे।

डॉ. कमला प्रसाद पांडेय के कट्टर विरोधी भी उनकी सांगठनिक क्षमता और नेतृत्वशीलता का लोहा मानते थे। संगठन को बढ़ाने के लिए वे दिन-रात काम करते। संगठन के काम-काज की वजह से हालांकि, उनका लेखन भी प्रभावित हुआ। लेकिन फिर भी कभी उन्होंने यह सांगठनिक कामकाज नहीं छोड़ा। प्रगतिशील लेखक संघ के काम को वे एक जिम्मेदारी की तरह लेते थे। भीष्म साहनी के निधन के बाद प्रगतिशील लेखक संघ संस्था के तौर पर जब तकरीबन टूटने की कगार पर था, तब उन्होंने उसे एक नई जिंदगी दी। प्रगतिशील लेखक संघ के वे वास्तविक कमांडर थे। संगठन के जानिब उनका गजब का जुनून था। वे इसके लिए ही जीते और मरते थे। उनकी नजर में प्रगतिशीलता‘‘रुढ़ियों और यांत्रिकताओं से निरंतर संघर्ष करते हुए रचनाशील और सौंदर्यप्रेमी होना था।’’ उनके मन में सामूहिकता का बोध हमेशा रहा।

सामूहिकता को वे एक ताकत मानते थे। सामूहिकता के बारे में अपने एक इंटरव्यू में डॉ. कमला प्रसाद ने कहा था,‘‘समय की जटिलताओं ने लोगों को परस्पर अविश्वसनीय बनाया है, संवेदन तंत्र उथला हो रहा है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती सामूहिकता की रक्षा है। क्योंकि, इस सामूहिकता के बिना देशभक्ति और मनुष्य प्रेम की कल्पना नहीं की जा सकती।’’ सामूहिकता में कमला प्रसाद का यह यकीन ही था कि उन्होंने एक समय, एक साथ ‘प्रगतिशील लेखक संघ’, ‘भारतीय जन नाट्य संघ’ (इप्टा) और ‘मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन’ में केन्द्रीय भूमिका निभाई। कमला प्रसाद ने लेखक, व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के सानिध्य में मार्क्सवाद का ककहरा सीखा। उन्हीं की प्रेरणा और जिंदगी के माध्यम से उनके व्यक्तित्व का रूपान्तरण हुआ।

कमला प्रसाद ने एक इंटरव्यू में खुद यह बात स्वीकारी थी,‘‘मार्क्सवाद के दर्शन के प्रति मेरी दिलचस्पी, एक मात्र हरिशंकर परसाई की वजह से हुई। वे मेरे वास्तविक दीक्षा गुरू सिद्ध हुए।’’ हरिशंकर परसाई के वे चहेते शिष्यों में शामिल रहे। हरिशंकर परसाई पर केन्द्रित महत्वपूर्ण किताब ‘आंखन देखी’ का उन्होंने सम्पादन किया। हिंदी साहित्य में ‘आंखन देखी’, परसाई के व्यक्तित्व और कृतित्व का समग्र मूल्यांकन करने वाली पहली किताब है।

इस किताब के अलावा डॉ. कमला प्रसाद की लिखित और संपादित किताबों की संख्या पैंतालीस के आस-पास है। जिसमें ‘रचना और आलोचना की द्वंद्वात्मकता’ उनकी प्रतिनिधि किताब है। यह किताब उन्होंने पूरे मनोयोग से लिखी है। प्रख्यात आलोचक और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. नामवर सिंह ने इस किताब की समीक्षा करते हुए लिखा है,‘‘इस किताब में आधुनिक हिंदी कविता के संदर्भ में रचना और आलोचना के द्वंद्वात्मक संबंधों पर पहली बार वस्तुपरक ढंग से ब्यौरेवार विचार किया गया है। अपने आप में यह एक बहुत बड़ा विषय है और थोड़ा महत्वपूर्ण भी, पर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि कमलाप्रसाद ने विषय के इस विस्तार और जटिलता के बावजूद उसके विश्लेषण की जो पद्वति अपनाई है, वह वस्तुनिष्ठ और तर्कसंगत है। रचना और आलोचना के द्वंद्वात्मक संबंध की व्याख्या के साथ उन्होंने उन ऐतिहासिक संदर्भों की व्याख्या की है, जिसमें ये उत्पन्न होती है। और इस प्रकार यहां पहली बार पूरी समस्या का एक गंभीर समाजशास्त्रीय विवेचन प्रस्तुत किया गया है।’’

डॉ. कमला प्रसाद की अन्य प्रकाशित महत्वपूर्ण किताबें हैं-‘साहित्य-शास्त्र’, ‘छायावाद-प्रकृति और प्रयोग’, ‘छायावादोत्तर काव्य की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि’, ‘साहित्य और विचारधारा’, ‘आधुनिक कविता और आलोचना की द्वंद्वात्मकता’, ‘समकालीन हिंदी निबंध’, ‘मध्ययुगीन रचना और मूल्य’, ‘कविता तीरे’, ‘आलोचक और आलोचना’, ‘वार्तालाप’, ‘यशपाल’ आदि। उन्होंने आलोचना के अलावा निबंध भी खूब लिखे। साहित्य और साहित्येतर विषयों पर वे अखबारों में बराबर कॉलम लिखा करते थे। प्रगतिशील लेखक संघ की मुख्य पत्रिका ‘वसुधा’ में उनके लिखे सम्पादकीय विषय की व्यापकता और तर्कशीलता की वजह से साहित्य में एक अलग ही मुकाम रखते हैं। हरिशंकर परसाई ने उनकी निबंधों की किताब ‘गिरा अनयन’ की भूमिका में लिखा है,‘‘विपुल अनुभव, समाज से अत्यंत निकट संपर्क, दृष्टि की व्यापकता, विद्रूप को पकड़ने की क्षमता, साथ ही चिंतनशीलता कमला प्रसाद का मूल धन है। उनके निबंधो में वैज्ञानिक दृष्टि और तर्कशीलता है। इस कारण ये निबंध पाठक को अपने समाज को समझने में मदद करते हैं। ये निबंध उत्तम सामाजिक आलोचना हैं।’’

डॉ. कमला प्रसाद ने कई किताबों का सम्पादन किया। जिसमें बीसवीं सदी के सातवें दशक में कुछ समय तक कथाकार ज्ञानरंजन के साथ ‘पहल’ और उसके बाद ‘वसुधा’ का सम्पादन भी शामिल है। उनके सम्पादन में ‘वसुधा’ के कई महत्वपूर्ण विशेषांक निकले। मसलन-‘डॉ. नामवर सिंह’ (दो खंड), ‘सज्जाद जहीर’, ‘दलित साहित्य’, ‘समकालीन उर्दू साहित्य’ (दो खंड), ‘समकालीन मराठी साहित्य’, ‘जम्मू-कश्मीर की सृजन अभिव्यक्ति’, ‘स्त्री मुक्ति का सपना’, ‘हिंदी सिनेमा’, ‘1857 का महासंग्राम’, ‘समकालीन कहानी’ (दो खंड) और ‘दलित स्त्री एवं मुक्ति का प्रश्न’ आदि।  प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के तौर पर कमला प्रसाद पांडेय निरंतर नई-नई योजनाएं बनाते रहते थे। रुकना, हारना और थक कर बैठ जाना, तो जैसे उन्होंने सीखा ही नहीं था। रक्त कैंसर जैसे असाध्य रोग से घिर जाने के बाद भी उन्होंने अपने आखिरी दम तक हार नहीं मानी। 25 मार्च, 2011 को कैंसर से जूझते हुए, कमला प्रसाद ने इस दुनिया से अपनी विदाई ली। वे सचमुच एक अनथक योद्धा थे। ऐसे अनुपम योद्धा, कलम के सिपाही, प्रगतिशील आंदोलन के जुझारू कमांडर डॉ. कमला प्रसाद पांडेय का व्यक्तित्व और कृतित्व नई पीढ़ी के रचनाकारों को हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल मध्य प्रदेश के शिवपुरी में रहते हैं।)

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This post was last modified on February 14, 2021 6:49 pm

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