फिर केंद्र में आ गया स्वतंत्र फिलिस्तीन का सवाल

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इजराइल पर हमास के सात अक्टूबर को हुए हमले के बाद से दुनिया इजराइली नेताओं का बर्बर चेहरा देख रही है। गाजा इलाके में इजराइल के हमलों में जैसी बर्बरता दिखी है, वैसा संभवतः दूसरे विश्व युद्ध के बाद कभी नहीं हुआ। इसलिए रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन ने जब गाजा की घेरेबंदी की तुलना दूसरे विश्व युद्ध के समय लेनिनग्राद पर जर्मनी की नाजी सेना की घेरेबंदी से की, तो आम तौर पर दुनिया में उसे एक सटीक तुलना माना गया।

इजराइली सेना इस तरह की कार्रवाइयां खुल कर पा रही है, तो उसका एकमात्र कारण यह है कि देश के राजनीतिक नेतृत्व का हाथ उसकी पीठ पर है। असल में इजराइली नेतृत्व ने अगर हर परिभाषा के तहत युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध माने जाने वाली कार्रवाइयों को समर्थन दे रखा है, तो उसकी वजह उसकी पीठ पर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों का हाथ होना है।

गाजा में कैसे हालात बने हैं, इसकी झलक रेड क्रॉस क्रीसेंट सोसायटी के शुक्रवार को जारी एक बयान से मिली। रेडक्रॉस ने कहा- “अस्पतालों में मौजूद बीमार, घायलों, बुजुर्गों और विकलांगों को बाहर निकालने के लिए हमारे पास संसाधन नहीं हैं। गाजा पट्टी में कोई सुरक्षित इलाका नहीं है। मानवता दांव पर लगी हुई है।”

रेडक्रॉस का यह बयान इजराइल द्वारा 24 घंटों के अंदर उत्तरी गाजा को खाली करने की धमकी देने के बाद जारी किया गया है। इस बीच यह खबर गर्म है कि यह अवधि खत्म होते ही इजराइली फौज गाजा पर जमीनी हमला शुरू कर देगी। यह हमला क्या रूप लेगा और इसका क्या परिणाम होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन है।

अमेरिकी वेबसाइट ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने अपने सार्वजनिक बयान में प्रस्तावित हमले का समर्थन किया है, लेकिन प्राइवेट तौर पर उसने इजराइली नेतृत्व को इसके नतीजों को लेकर आगाह किया है। अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में अपने अनुभवों के आधार पर कहा है कि जमीनी हमले में संभव है कि इजराइल उस क्षेत्र में लंबी अवधि के लिए उलझ जाए और निर्णायक जीत हासिल कर पाना उसके लिए संभव ना रहे।

बहरहाल, जहां तक जुबानी प्रतिक्रियाओं की बात है, उसमें उग्रता और आक्रामकता दिखाने में पश्चिमी देशों के नेता इजराइली नेताओं को टक्कर दे रहे हैं। इजराइली नेताओं ने किस तरह का मर्यादाविहीन और बेशर्म रुख दिखाया है, इसकी एक मिसाल इजराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफताली बेनेट का बयान है।

जब उनसे टीवी चैनल स्काई न्यूज के संवाददाता ने यह पूछा कि इनक्यूबेटर्स पर रखे गए नवजात शिशुओं समेत अस्पतालों में भर्ती फिलिस्तीनी नागरिकों की सहायता के लिए इजराइल क्या कर रहा है, तो बेनेट ने कहा- ‘क्या आप हमसे सचमुच फिलिस्तीनी नागरिकों के बारे में पूछ रहे हैं? क्या आपका दिमाग खराब हो गया है? क्या आपने देखा नहीं कि हमारे यहां क्या हुआ है? हम नाजियों से लड़ रहे हैं’। इसके पहले इजराइल के रक्षा मंत्री फिलिस्तीनियों को मानव पशु कह चुके थे।

उधर अमेरिका में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने हमास लड़ाकों द्वारा यहूदी बच्चों का गला काटने की झूठी खबर को अपने बयान में शामिल किया, जबकि खुद अमेरिकी मीडिया का एक हिस्सा इसे फेक न्यूज बता चुका था। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के सीनेटर लिंडसे ओ ग्राहम ने इजराइलियों को संबोधित करते हुए फॉक्स न्यूज चैनल के एक कार्यक्रम में कहा- ‘अपनी रक्षा में जो करना है, आप करो। पूरे इलाके को ध्वस्त कर दो’।

उन्होंने इस लड़ाई को धार्मिक युद्ध करार दिया। उधर एक अन्य रिपब्लिकन सीनेटर मार्को रुबियो ने हमास के हमले का उससे कहीं अधिक उग्र जवाब देने की वकालत करते हुए उसके जड़मूल से नष्ट कर देने का आह्वान किया। इसी पार्टी की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की होड़ में उतरीं निकी हेली ने हमास का जिक्र करते हुए कहा- ‘ये बीमार लोग हैं और हमें उनसे वैसा सलूक करना चाहिए, जो बीमारी के इलाज और उन्मूलन के लिए जरूरी हो’।

फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार ने फिलिस्तीन के समर्थन में सड़कों पर प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। ये दीगर बात है कि इस प्रतिबंध का उल्लंघन करते हुए दसियों हजार लोग पेरिस और अन्य शहरों की सड़कों पर उतरे। ब्रिटेन में वहां की गृह मंत्री सुएला ब्रेवरमैन ने सार्वजनिक बयान दिया कि फिलिस्तीन का झंडा लेकर चलना अवैध माना जा सकता है।

तो जब अपने को लोकतंत्र और मानव अधिकारों का झंडाबरदार कहने वाले पश्चिमी देशों का अपने को बेनकाब करने वाला ऐसा रुख सामने हो, तो अपने सिक्युरिटी सिस्टम के अभेद्य होने का भ्रम टूटने और अपने अहंकार के चोटिल होने के कारण गुस्से में उबलते इजराइली नेता अगर प्रतिशोध की भावना में बदहवास नजर आ रहे हों, तो उसमें कोई हैरत की बात नहीं है।

इसके विपरीत शनिवार को हमास ने विश्व मीडिया के लिए जो बयान जारी किया, उसमें अपने हमले का तर्क समझाने के अलावा यह संदेश देने की भरपूर कोशिश शामिल है कि निहत्थे लोगों को निशाना ना बनाने के अंतरराष्ट्रीय कायदों का पालन करने के लिए वह वचनबद्ध है।

हमास के बयान का सार यह है कि उसका हमला एक हताश प्रतिक्रिया थी। 17 वर्ष से इजराइल ने गाजा को जेल बना कर रखा है और इस बीच उसने लगातार फिलिस्तीनियों को उनकी जमीन से बेदखल किया है। हाल में उसने फिलिस्तीनियों की पवित्र मस्जिद अल अक्सा पर नियंत्रण करने की कोशिश की। इस दौरान इजराइली सेना की ज्यादतियां जारी रही हैं।

हमास ने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने यह सब रोकने और संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के मुताबिक फिलिस्तीनियों को इंसाफ दिलाने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया, तो हमला करने के अलावा उसके पास कोई और चारा नहीं बचा था।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमास के हमलों से जो लोग असहमत हैं और यहां तक कि जिन्होंने उसके हमलों को ‘आतंकवादी कार्रवाई’ बताया, वे भी इस तथ्य से इनकार करने की स्थिति में नहीं हैं कि समस्या का असली कारण फिलिस्तीनियों के स्वतंत्र राज्य की स्थापना से इजराइल का इनकार है। हमलों के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल के साथ खड़े होने की घोषणा के बावजूद भारत सरकार ने बाद में जारी अपने बयान में कहा कि फिलिस्तीनियों के संप्रभु, स्वतंत्र एवं संभव राज्य की स्थापना ही इस समस्या का हल है।

असल में हमास के हमलों ने इस प्रश्न को दुनिया के विमर्श के केंद्र में ला दिया है। पश्चिमी देशों के सत्ताधारी हलकों में भले इजराइल के समर्थन में उन्माद छाया हुआ हो, लेकिन पूरे विकासशील विश्व की प्रतिक्रिया में स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को केंद्रीय महत्व मिला है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने दो टूक कहा है कि इजराइल को अपनी रक्षा करने का अधिकार है, लेकिन उसकी सुरक्षा सिर्फ स्वतंत्र फिलिस्तीन की स्थापना से ही सुनिश्चित हो सकती है।

यूरोपियन यूनियन के विदेश नीति प्रमुख जोसेफ बोरेल की 12-14 अक्टूबर की चीन यात्रा के दौरान हुई साझा प्रेस कांफ्रेंस में चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा- फिलिस्तीन के लोगों के साथ आधी सदी से अत्याचार हो रहा है। स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना की वकालत करते हुए वांग ने कहा कि चीन संयुक्त राष्ट्र में युद्ध रुकवाने के लिए आपातकालीन विचार-विमर्श की पहल करेगा और साथ ही वह गाजा पट्टी में मानवीय सहायता भेजेगा।

मानवीय सहायता के मुद्दे गाजा में टकराव जैसी स्थिति है। मिस्र, जॉर्डन आदि ने ऐसी सहायता भेजने की शुरुआत की है, लेकिन खबर है कि इजराइल उसे वहां पहुंचने नहीं दे रहा है। ऐसे में चीन भी ऐसी सहायता भेजने के लिए आगे आया है, तो इस घटना के महत्त्व को सहज ही समझा जा सकता है।

इजराइल ने लेबनान के बाद सीरिया में स्थित ठिकानों पर भी हमला कर इस युद्ध का दायरा बढ़ा दिया है। इससे पश्चिम एशिया और अरब के इस्लामी देशों की उसके खिलाफ लामबंदी की संभावना मजबूत होती जा रही है। रूस और चीन का समर्थन ऐसी लामबंदी को मिलेगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

इस बीच फिलहाल निगाह गाजा पर इजराइल के संभावित जमीनी हमलों पर टिकी हुई है। उसका क्या परिणाम होगा, कहना कठिन है। लेकिन संभव है कि इजराइल का यह दांव महंगा पड़े। संभव है कि यहां से वह प्रक्रिया शुरू हो, जिससे अब सेंटर में आ चुके स्वतंत्र फिलिस्तीन के सवाल का जवाब ढूंढने के लिए बाकी दुनिया मजबूर हो जाए।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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