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शख्सियतों के खिलाफ देशद्रोह का केस दर्ज करवा कर मुज़फ्फरपुर सीजेएम ने उड़ाया ज्यूडिशियरी का मजाक

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गुहा, अपर्णा सेन और मणिरत्नम।

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उच्चतम न्यायालय का आदेश देश का कानून माना जाता है, इसलिए उच्चतम न्यायालय भी अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश नहीं पारित कर सकता जो कानून के पूरी तरह प्रतिकूल हो। ऐसे में जब उच्चतम न्यायालय ने कई बार फिर साफ-साफ कहा है कि सरकार की आलोचना करने पर किसी के खिलाफ राजद्रोह या मानहानि के मामले नहीं थोपे जा सकते। विधि आयोग ने देशद्रोह  विषय पर एक परामर्श पत्र में कहा कि देश या इसके किसी पहलू की आलोचना को देशद्रोह नहीं माना जा सकता ।8 सितम्बर 2019 को उच्चतम न्यायालय के जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा था कि सरकार की आलोचना करने वाला व्यक्ति कम देशभक्त नहीं होता।

जस्टिस दीपक गुप्ता ने याद दिलाया था कि केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य, 1962 सुप्रीम कोर्ट 2 एससीआर 769 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दिया था कि केवल सरकार या उसकी नीतियों की आलोचना करने के लिए देशद्रोह के आरोप नहीं लगाए जा सकते। इसके बावजूद जुलाई महीने में भारत के 49 सेलिब्रिटीज द्वारा देश में बढ़ रही भीड़ हिंसा यानी लिंचिंग के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गये पत्र को लेकर इनके खिलाफ बिहार के मुजफ्फरपुर में देशद्रोह के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई है। अधीनस्थ न्यायालय के पीठासीन अधिकारियों द्वारा कानून की सीमाओं से परे जाकर दिए गए फैसले तमाम तरह की विसंगतियां पैदा कर रहे हैं और संविधान एवं कानून के शासन की अवधारणा का खुलेआम मजाक उड़ा रहे हैं।

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मुजफ्फरपुर के स्थानीय वकील सुधीर कुमार ओझा ने दो महीने पहले मुजफ्फरपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट यानी सीजेएम सूर्यकांत तिवारी की कोर्ट में अर्जी दी थी कि इन लोगों ने ऐसा करके देश के प्रधानमंत्री की छवि धूमिल की है जो कि राजद्रोह जैसा जुर्म है, इसलिए इनके खिलाफ राजद्रोह का मामला दर्ज होना चाहिए। सीजेएम ने ओझा की याचिका पिछले महीने बीस अगस्त को स्वीकार कर ली थी जिसके बाद गुरुवार यानी तीन अक्टूबर को सदर पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज हुई।

एफआईआर में ओझा ने आरोप लगाया है कि देश की इन जानी-मानी हस्तियों ने देश और प्रधानमंत्री मोदी की छवि को कथित तौर पर धूमिल किया। याचिकाकर्ता ने इन सभी लोगों पर अलगाववादी प्रवृत्ति का समर्थन करने का भी आरोप लगाया। अब आदतन इस तरह के मामले अदालतों में बार बार दाखिल करके वकील सुधीर कुमार ओझा अपने अहं की तुष्टि के लिए अदालतों का समय बर्बाद करते हैं और सीजेएम जैसे दंडाधिकारी को उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गयी रूलिंग की जानकारी नहीं है। यह देश की अधीनस्थ न्यायालयों की दशा है और इस बात को रेखांकित करता है कि अधीनस्थ न्यायालय के पीठासीन अधिकारीयों के लिए प्रति तीन वर्ष के अन्तराल पर रिफ्रेशर कोर्स अनिवार्य किया जाना अत्यंत जरूरी है।

इस मामले में इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा, फिल्मकार मणिरत्नम और अपर्णा सेन समेत 50 शख्सियतों का बस यही अपराध था कि उन्होंने मॉब लिंचिंग के खिलाफ प्रधानमंत्री को पत्र लिख दिया। वह भी तब जब खुद प्रधनामंत्री अच्छे शासन के लिए जनता से सुझाव मांगते रहते हैं। यह न्याय प्रक्रिया का पूरी तरह दुरूपयोग है। यह प्रकरण पूरी की पूरी न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा कर रहा है।

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने 5 सितम्बर  2016 को एक बार फिर साफ-साफ कहा था कि सरकार की आलोचना करने पर किसी के खिलाफ राजद्रोह या मानहानि के मामले नहीं थोपे जा सकते। इसी के साथ कोर्ट ने पुलिस और ट्रायल जजों सहित सभी अथॉरिटीज को निर्देश दिया कि वे इस मामले में उसकी संविधान पीठ के उस फैसले का पालन करें जिसमें कहा गया था कि सिर्फ हिंसा भड़काने और समाज में गड़बड़ी पैदा करने के मामले में ही राजद्रोह का मामला लगाया जा सकता है। पीठ ने कहा था कि यदि कोई सरकार की आलोचना करने के लिए बयान दे रहा है तो वह राजद्रोह या मानहानि के कानून के तहत अपराध नहीं करता। धारा 124 (ए) आईपीसी यानि देशद्रोह की धारा को लागू करने के लिए उच्चतम न्यायालय के पहले के एक फैसले के अनुसार कुछ दिशा निर्देशों का पालन करना होगा।

विधि आयोग ने ‘देशद्रोह’ विषय पर एक परामर्श पत्र में कहा कि देश या इसके किसी पहलू की आलोचना को देशद्रोह नहीं माना जा सकता और यह आरोप उन मामलों में ही लगाया जा सकता है जहां इरादा हिंसा और अवैध तरीकों से सरकार को अपदस्थ करने का हो। आयोग ने कहा कि देशभक्ति का कोई एक पैमाना नहीं है। लोगों को अपने तरीके से  देश के प्रति स्नेह प्रकट करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। आयोग ने यह भी कहा कि देशद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा ‘124 ए’ के संशोधन का अध्ययन करने के लिए, इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आईपीसी में इस धारा को जोड़ने वाले ब्रिटेन ने दस साल पहले देशद्रोह के प्रावधानों को हटा दिया है। परामर्श पत्र में कहा गया है कि देश या इसके किसी पहलू की आलोचना को देशद्रोह के रूप में नहीं देखा जा सकता और ना ही देखा जाना चाहिए।

प्रेलेन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट, अहमदाबाद द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में वकीलों को संबोधित करते हुए उच्चतम न्यायालय के जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने “लॉ ऑफ सेडिशन इन इंडिया एंड फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन” विषय पर बात रखते हुए कहा था कि दुर्भाग्य से आम धारणा यह बन रही है कि या तो आप मुझसे सहमत हैं या आप मेरे दुश्मन हैं और इससे भी बदतर कि एक आप राष्ट्रद्रोही हैं। उन्होंने कहा, “एक धर्मनिरपेक्ष देश में प्रत्येक विश्वास को धार्मिक होना जरूरी नहीं है। यहां तक कि नास्तिक भी हमारे संविधान के तहत समान अधिकारों का आनंद लेते हैं। चाहे वह एक आस्तिक हो, एक अज्ञेयवादी या नास्तिक हो, कोई भी हमारे संविधान के तहत विश्वास और विवेक की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है। संविधान द्वारा अनुमत लोगों को छोड़कर उपरोक्त अधिकारों पर कोई बाधा नहीं है।

जस्टिस गुप्ता ने असहमत होने के अधिकार के महत्व को बताते हुए कहा कि जब तक कोई व्यक्ति कानून को नहीं तोड़ता है या संघर्ष को प्रोत्साहित नहीं करता है, तब तक उसके पास हर दूसरे नागरिकों और सत्ता के लोगों से असहमत होने का अधिकार है और जो वह मानता है उस विश्वास का प्रचार करने का अधिकार है। उन्होंने अवगत कराया कि विद्रोहियों की आवाज को चुप कराने के लिए ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में राजद्रोह का कानून पेश किया गया था। जबकि उन्होंने यह तय किया कि यह प्रावधान लोगों को उनकी ताकत और अधिकार के इस्तेमाल से रोकने के लिए था। यह कानून प्रकट रूप से वैध असंतोष या स्वतंत्रता की किसी भी मांग को रोकने के लिए इस्तेमाल किया गया था।

उन्होंने कहा कि संविधान के संस्थापकों ने संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्र भाषण के अधिकार के अपवाद के रूप में राजद्रोह को शामिल नहीं किया, क्योंकि वे कहते थे कि राजद्रोह केवल तभी अपराध हो सकता है जब वह सार्वजनिक अव्यवस्था या हिंसा के लिए प्रेरित करे या भड़काए।

मुजफ्फरपुर में वकील सुधीर कुमार ओझा आदतन चिर असंतुष्ट श्रेणी के व्यक्ति हैं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह हों या सदी के नायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन, आध्यात्मिक गुरु निर्मल बाबा हों या भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले अन्ना हजारे या मनसे प्रमुख राज ठाकरे, ऐश्वर्या राय बच्चन हों या शाहरुख खान, सोनाक्षी हों या सलमान। शायद ही कोई सुधीर कुमार ओझा से बच पाया। दुनिया चाहे जो कहे। सुधीर ओझा को इससे फर्क नहीं पड़ता कि लोग उन्हें क्या कहते हैं। बहुत लोग कहते हैं कि उन्हें नाम कमाने का फितूर है तो कुछ इसे बिना वजह समय की बर्बादी मानते हैं। पर ओझा को कोई फर्क नहीं पड़ता।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।) 

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