Wednesday, December 1, 2021

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नए नेतृत्व की तलाश में दलित राजनीति

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इतिहास सिखाता है और अपने आपको दोहराता भी है। बहुत साफ-साफ यह सच दलित, शोषित और वंचितों के आन्दोलन में दिखाई दे रहा है। समतामूलक समाज की अवधारणा के पहले के सूत्रधार महान सन्त रैदास के बाद भारत की भूमि पर असमानता व गैर बराबरी के खिलाफ सशक्त व्यक्तित्व के रूप में 11 अप्रैल सन् 1827 को ज्योतिराव फुले का जन्म हुआ। इसके बाद 26 जून सन् 1874 में शाहू जी महराज का जन्म हुआ, जिन्होंने शोषण अन्याय के खिलाफ खड़ा होकर सामन्तवादी व जातिवादी ताकतों से लोहा लिया।

अब इनके बाद 17 सितम्बर सन् 1879 में दक्षिण एशिया के सुकरात कहे जाने वाले ई.वी.रामास्वामी पेरियार का जन्म भारत की भूमि पर हुआ, इनका पूरा जीवन जातिवादी सत्ता, पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ एवं जाति विहीन समाज के निर्माण के लिए एक मिसाल है। फिर 14 अप्रैल सन् 1891 में बाबा साहब डा. बी.आर. अम्बेडकर का जन्म भारत की भूमि पर हुआ, जिनका संघर्ष और त्याग आज पूरी दुनिया में बड़ी मिसाल है। इसके बाद 15 मार्च सन् 1934 को मान्यवर कांशीराम साहब इस दुनिया में आये और दलित, शोषित और वंचित की सशक्त लड़ाई भारत में लड़े और एक प्रदेश में सरकार भी बनाया।

ज्योतिराव फुले के जीवन संघर्ष से हम बात शुरू करते हैं। फुले ने संघर्ष किया और संगठन बनाया ‘सत्य शोधक समाज’। इस संगठन के माध्यम से समाज की आवाज उठाने का पूरा प्रयास किया। फुले की मृत्यु के बाद उनका संगठन धीरे-धीरे निष्क्रिय हो गया। फुले के बाद शाहू जी महाराज ने उस लड़ाई व विचारधारा को आगे बढ़ाया। शाहू जी ने फूले की विचारधारा को लिया, उनके संगठन को जिन्दा करने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली। आगे शाहू जी के दुनिया से जाने के बाद ई.वी. रामास्वामी पेरियार ने उस लड़ाई को आगे बढ़ाने का आन्दोलन चलाया।

पेरियार ने भी फुले, शाहू की विचारधारा और उनके मकसद को लिया। पेरियार प्रारम्भ में तो कांग्रेस के साथ रहे, लेकिन जल्द ही कांग्रेस छोड़ा और सामन्तवादियों, पूंजीपतियों के खिलाफ समाजवाद की सोच लेकर दक्षिण भारत में काम किया। पेरियार के साथ ही बाबासाहब डा. बी. आर. अम्बेडकर ने महाराष्ट्र को केन्द्र बनाकर लड़ाई का नेतृत्व अपने हाथ में लिया। बाबासाहब ने फुले, शाहू को अपना आदर्श माना और उनसे भारी मदद भी ली, लेकिन डा. अम्बेडकर ने भी उन महापुरुषों का सिर्फ विचारधारा, उनका मिशन अपने हाथ में लिया। उनके संगठन या पार्टी को नहीं लिया।

उनके संगठनों को भी जिन्दा करने का प्रयास नहीं किया, बाबासाहब ने खुद अपना संगठन बनाया फिर अपनी राजनीतिक पार्टी बनायी और लड़ाई लड़े। इसी धारा को आगे बढ़ाते हुए जब मान्यवर कांशीराम साहब ने आन्दोलन का नेतृत्व अपने हाथ में लिया तो उन्होंने भी फुले, शाहू, पेरियार, अम्बेडकर को अपना आदर्श, प्रेरणा मानते हुए उन महापुरुषों का मिशन व आन्दोलन अपने हाथ में लिया। फुले, शाहू, पेरियार, डॉ. अम्बेडकर की पार्टियों, संगठनों (सत्य शोधक समाज, जस्टिस पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी आफ इण्डिया- आरपीआई) का अध्ययन व अनुभव तो किया लेकिन उनके द्वारा बनाई गयी संगठन या पार्टी में काम नहीं किया, बल्कि खुद का संगठन व पार्टी बनाया और उस मिशन व आन्दोलन को आगे बढ़ाया।

उक्त घटनाक्रम यह स्पष्ट करता है कि महापुरुषों का विचार, उनका मिशन व आन्दोलन महत्वपूर्ण होता है। महापुरुषों द्वारा बनाया गया संगठन व पार्टी महत्वपूर्ण नहीं होता है। बहुजन महापुरुषों का इतिहास व उदय हमको यही बताता है और सिखाता है। कोई भी महापुरुष संघर्ष करके संगठन या पार्टी खड़ा करता है तो उसके जीवित रहते हुए उनका संगठन या पार्टी सही रास्ते पर काम करता है, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उस संगठन या पार्टी को चालाक व चालबाज लोग तिन-तिकड़म से हासिल कर लेते हैं। फिर कुछ दिन तक उस पार्टी या संगठन को बेचते हैं और निजी लाभ के लिए मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं। फिर समाज का लगाव भी उस पार्टी या संगठन से खत्म हो जाता है। लेकिन स्थापित करने वाले महापुरुष की विचारधारा को समाज मान लेता है। जैसे फुले, शाहू, पेरियार, डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा को तो समाज मानता है, लेकिन उनकी पार्टी व संगठन को भूल चुका है।

आज दलित आन्दोलन फिर अपना इतिहास दोहराने के लिए तैयार है, वर्तमान स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे पूर्व के महापुरुषों के साथ हुआ, अब वही घटना मान्यवर कांशीराम साहब के बनाए संगठन व पार्टी के साथ होना प्रारम्भ हो चुका है। कांशीराम ने डीएस-4, बामसेफ व बहुजन समाज पार्टी बनाया, दलित शोषित समाज में कांशीराम हमेशा अनुकरणीय व प्रेरणा के आधार रहेंगे, उनका सम्मान भी निरन्तर बढ़ेगा, लेकिन अब कांशीराम का संगठन व पार्टी खत्म हो जाएगी, इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। जिस बसपा को चुनाव में विधानसभा की हर सीट पर लगभग 30-40 हजार वोट पाना निश्चित रहता था, आज उस बसपा को विधानसभा की एक सीट पर 3 हजार से भी कम वोट मिले, जो सीधा संकेत है। जो समाज यानी आधार मतदाता ने संकेत दिया, इस संकेत को यदि कोई हल्के में लेता है तो यह भारी भूल होगी। क्योंकि समाज ना तो मूर्ख है और ना लालची।

समाज सही समय पर यह संदेश स्पष्ट देता है कि अब हमें नया नेतृत्व चाहिए। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि संगठन या पार्टी जो व्यक्ति स्थापित करता है वो अपना मिशन समाज को बताता है, और उस पर वो काम करता है लेकिन कोई भी जब दूसरे का बनाया संगठन या पार्टी चालाकी से हासिल करता है तो हासिल करने वाला व्यक्ति हमेशा अपने निजी लाभ के लिए संगठन व पार्टी का उपयोग करता है। यही काम कांशीराम साहब की बनाई संगठन व पार्टी को हासिल करके बहन कु. मायावती ने भी किया। भाई व भतीजा का प्रेम, भाई की कम्पनी को हजारों, लाखों करोड़ का फायदा कैसे हो इसके लिए बसपा प्लेटफार्म का सीधा दुरुपयोग जितना हो सकता है उतना खूब किया। बहन मायावती ने जो कुछ किया वो समाज को पसन्द नहीं है, फिर भी सुधरने का अवसर देते हुए कि आगे सुधार होगा, इसलिए साथ भी दिया इंतजार भी किया।

समाज के इसी साथ व इन्तजार का मतलब बहन मायावती ने गलत निकाला और यह मान लिया कि समाज उनका अन्धभक्त या गुलाम बन गया है जो हमेशा हमारे इशारे पर नाचेगा इस बड़ी गलतफहमी ने बहन जी को सुधरने के बजाय बड़ा तानाशाह बना दिया। फिर क्या बहन जी ने दलित, शोषित समाज में कोई और नेतृत्व या नेता ना उभरे इसके लिए हमेशा साजिश रचने लगीं। दलित, शोषित समाज की समस्या व दुख दर्द पर ध्यान न देकर दिन-रात पूरी ऊर्जा के साथ सिर्फ यही काम करने लगीं कि दलित समाज के उभरते हुए नेतृत्व या नेता को खत्म या बदनाम कैसे किया जाए। यह मिशन बहन जी ने अपने लिए बनाया। बहन मायावती ने पहले तो बसपा में जो भी कांशीराम साहब के साथ काम करने वाले प्रतिभाशाली व जनाधार वाले नेता थे उन सभी को बारी-बारी से कोई न कोई आरोप लगाकर पार्टी से निकाल दिया। पार्टी के अन्दर अपने यस मैन को भर लिया, जो उनके सामने सिर झुकाकर खड़े रहे और जो कुछ बोल न सके और बोले तो सिर्फ ‘जी बहन जी’ यही बोले और कुछ कहने की हिम्मत ना हो।

सिकुड़ती हुई सोच बहन मायावती की भारी गलतफहमी ही एक महान नेता मान्यवर कांशीराम का आन्दोलन पतन की तरफ ले जाने लगा। जो समाज सहन करने को तैयार नहीं है। इसीलिए समाज ने शान्त मुद्रा में रहते हुए क्षेत्रवार युवा नेता यानी नया नेता खड़ा करने का फैसला कर लिया। गुजरात में जिग्नेश मेवानी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चन्द्रशेखर रावण, निर्देश सिंह, पूर्वी उत्तर प्रदेश में श्रवण कुमार निराला, मध्य प्रदेश में फूल सिंह वरैया, महाराष्ट्र, हरियाणा के साथ-साथ अन्य प्रदेशों में युवा दलित नेतृत्व का उभार कोई घटना नहीं है, बल्कि दलित शोषित समाज का रणनीतिक योजना पर आम सहमति का फैसला है।

यहां पर यह भी बताना जरूरी है कि उपरोक्त उभरती हुई जो लीडरशीप है उसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश में श्रवण कुमार निराला का नाम एक ऐसा नाम है, जिसके पास संगठन खड़ा करने का कुशल अनुभव है, और इस कुशलता का उपयोग पूर्वी उत्तर प्रदेश में बहुत ही बेहतरीन तरीके से श्रवण कुमार निराला कर रहे हैं, जिसका अभी शोर तो बहुत नहीं है पर जमीनी स्तर पर दखल बहुत मजबूत है, जिसकी एक झलक 12 जनवरी 2020 को गोरखपुर में श्रवण कुमार निराला के नेतृत्व में आयोजित अम्बेडकर जन मोर्चा की महारैली में उमड़ी पचासों हजार की संख्या में जनसैलाब का जुटना प्रमाण है।

स्पष्ट है कि दलित, शोषित, वंचित समाज की अब अगले दस साल तक कोई सेन्ट्रल लीडरशिप नहीं होगी। क्षेत्रीय आधार पर नया नेता या नेतृत्व तैयार होगा और संघर्ष भी सीधा होगा। समाज भी उसी के साथ खड़ा होगा जिसमें सीधा संघर्ष करने की हिम्मत और जुनून होगा।

इसका मतलब यह भी नहीं कि भारत में सेन्ट्रल लीडरशिप अब मान्यवर कांशीराम साहब जैसा नहीं मिलेगा। सेन्ट्रल लीडरशिप दलित, वंचित समाज को मिलेगा, लेकिन कम से कम इसमें अब अगला दस साल लगेगा, क्योंकि जब क्षेत्रीय आधार के नेता उभर रहे हैं तो इसमें से ही कोई लम्बी रेस का नेतृत्वकर्ता निकलेगा।

यह बात स्पष्ट है कि बहन मायावती का नेतृत्व स्वयं ही दलित वंचित समाज छोड़ देगा। इसका प्रमाण 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में मिल जाएगा। जिसका संकेत आना शुरू भी हो गया है, उ.प्र. में 2019 के उपचुनाव में कुछ सीटों पर 3000 से भी कम वोट मिलना बहन मायावती से दलित समाज की बढ़ती दूरी और असहमति है, क्योंकि अब दलित बंगले में बैठ कर कम्पनियों जैसी मैनेजमेंट की राजनीति से ऊब चुका है। अब नेता वही जो समाज से सीधा जुड़ेगा, और सीधा संवाद करेगा, और समस्या के खिलाफ सड़क पर उतर कर संघर्ष करेगा।

    (सीमा गौतम दलित एक्टिविस्ट हैं। गोरखपुर ( यूपी) में रहती हैं।)

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