Mon. Nov 18th, 2019

अजीबोगरीब होने के बावजूद ऐतिहासिक हो सकता है यह फैसला

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फैसला सुनाने वाली बेंच के सदस्य।

अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने वही फैसला दिया है जो पहले से अपेक्षित था। पिछले कुछ दिनों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े तमाम नेताओं के जिस तरह के बयान आ रहे थे, उनसे इसी तरह का फैसला आने के संकेत मिल रहे थे। पिछले सप्ताह रेडियो पर ‘मन की बात’ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले के मद्देनजर लोगों से शांति और संयम बरतने तथा सर्वोच्च अदालत के फैसले का सम्मान करने की अपील की थी। यही नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सूत्र संचालन में चल रहे राम मंदिर आंदोलन से जुड़े तमाम संगठनों के नेता और धर्माचार्य भी पिछले कुछ दिनों से इसी आशय की अपील कर रहे थे, जो किसी समय सीना तानकर कहा करते थे कि अयोध्या का मामला उनकी आस्था से जुड़ा हुआ है और आस्था से जुड़े मामले अदालत से तय नहीं हो सकते।

इन्हीं लोगों और संगठनों ने कुछ महीनों पहले केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी मानने से इनकार कर दिया था और उसके खिलाफ प्रदर्शन किए थे। उस वक्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं और केंद्र सरकार के मंत्रियों ने तो बाकायदा स्पष्ट शब्दों में न्यायपालिका को नसीहत दी थी कि अदालतें वही फैसले दें, जिन पर लोगों के लिए अमल करना और सरकारों के लिए अमल कराया जाना संभव हो। इन सारे बयानों की रोशनी में अयोध्या मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखा जाए तो साफ जाहिर है कि सरकार, सत्तारूढ़ दल और उससे जुडे अन्य संगठनों को पूरी तरह यही फैसला आने का यकीन था और अदालत ने भी उनकी भाव-भंगिमा को ध्यान में रखते हुए फैसला दिया है।

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निचली अदालतों से होते हुए कई दशकों बाद सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे इस विवाद में कानूनी दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर फैसला इस बात को लेकर होना था कि विवादित जमीन पर मालिकाना हक किसका है। करीब 40 दिनों तक लगातार चली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने भी कई मौकों पर कहा कि अदालत को यह तय नहीं करना है कि राम का जन्म कहां हुआ था, बल्कि उसे कानूनी दस्तावेजों और साक्ष्यों की रोशनी में सिर्फ इस बात पर फैसला देना है कि विवादित जमीन पर वास्तविक मालिकाना हक किस पक्ष का है। फैसला सुनाते वक्त भी उन्होंने यही बात कही। लेकिन पांच जजों की पीठ का जो सर्वसम्मत फैसला आया, वह बताता है कि अदालत ने जो कहा और जो किया, उसमें काफी विरोधाभास है। अदालत ने मामले का अंतिम रूप से निबटारा करते हुए जो व्यवस्था दी है वह बताती है कि मामले के कानूनी पहलुओं से ज्यादा उसके राजनीतिक पहलुओं पर गौर किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह तो माना है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह बाबर ने नहीं कराया था, जैसा कि मंदिर आंदोलन से जुड़े लोग मनगढ़ंत ऐतिहासिक तथ्यों के सहारे शुरू से प्रचारित करते रहे हैं। सबूतों के आधार पर फैसले में यह भी माना गया है कि वर्ष 1949 में हिंदू पक्ष ने विवादित स्थान पर रात के अंधेरे में जिस तरह मूर्तियां रख दी थीं, वह एक गैरकानूनी काम था। सुप्रीम कोर्ट ने 6 दिसंबर 1992 को बलपूर्वक बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को भी गैरकानूनी माना।

अदालत ने कहा कि मस्जिद का विवादित ढांचा गिराया जाना ‘सोचा-समझा कृत्य’ था। लेकिन वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण जैसी धार्मिक पुस्तकों, राजपत्रों, मौखिक बयानों, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट और लोक आस्थाओं के आधार पर विवादित जमीन को राम का जन्म स्थान मानते हुए और उस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज करते हुए उसे राम मंदिर के पक्षकारों को सौंपने का आदेश दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ निर्देश दिया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या की सीमा में ही उचित स्थान पर पांच एकड़ जमीन उपलब्ध कराई जाए।

सवाल है कि अगर अयोध्या की विवादित जमीन पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा गैरकानूनी है तो फिर उसे पांच एकड़ जमीन क्यों दी जानी चाहिए? आखिर यह तुष्टीकरण क्यों? क्या यह मुस्लिम समुदाय को अदालत का फैसला स्वीकार करने की एवज में एक तरह का मुआवजा नहीं है? इस बात की क्या गारंटी है कि मुसलमानों को मस्जिद के लिए दी जाने वाली यह पांच एकड़ जमीन एक नए विवाद को जन्म नहीं देगी?

गौरतलब है कि 1990 के दशक में जब दोनों पक्षों के बीच अदालत से बाहर समझौते के प्रयास हो रहे थे तब एक प्रस्ताव यह भी आया था कि मुसलमान विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ दें और बदले में उन्हें अयोध्या के भीतर ही मस्जिद निर्माण के लिए दूसरी जमीन दे दी जाए। मुसलमानों की प्रतिक्रिया आने से पहले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा बनाए गए राम जन्मभूमि न्यास ने उस प्रस्ताव को सिरे से नकारते हुए कहा था कि वह अयोध्या की सीमा के भीतर मस्जिद का निर्माण उसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कट्टरपंथी और विवादप्रेमी हिंदुत्व के अग्रदूत क्या मुसलमानों को दी जाने वाली पांच एकड़ भूमि को लेकर विवाद पैदा नहीं करेंगे?

दरअसल, यह मामला अगर शुद्ध रूप से धार्मिक होता और संघ परिवार ने इसे उसी रूप में उठाया होता तो यह अदालत के बाहर दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से बहुत पहले ही खत्म हो गया होता। भारत के मुसलमान इतने तंगदिल भी नहीं हैं कि वे अपने हिंदू भाई-बहनों की धार्मिक इच्छा का सम्मान न कर सकें। लेकिन हुआ यह कि जब से इस मुद्दे को स्थानीय स्तर से ऊपर लाया गया, तभी से इसे शक्ति प्रदर्शन का मामला बना दिया गया। हर चुनाव के मौके पर वोट हासिल करने के लिए इस मामले का राजनीतिक इस्तेमाल किया गया। संघ परिवार की ओर से हमेशा यह जताया गया कि हमें किसी की अनुकंपा से राम मंदिर नहीं चाहिए, वह जमीन तो हमारी ही है और हम उसे अपनी ताकत के बल पर लेकर रहेंगे। इसी सिलसिले में लगातार कहा गया कि यह उनकी आस्था का मामला है जो कि संविधान और अदालत से ऊपर है। इसी मानसिकता के तहत सुप्रीम कोर्ट में झूठा हलफनामा दाखिल कर बाबरी मस्जिद को फासीवादी तरीके से ध्वस्त कर दिया गया।

संघ परिवार के इसी रवैये ने मुस्लिम कट्टरपंथ के लिए खाद-पानी का काम किया। वैसे सच्चाई यह भी है कि देश के आम मुसलमानों को बाबरी मस्जिद से न पहले कोई लेना-देना था और न ही आज कुछ लेना-देना है, लेकिन अयोध्या के सवाल पर संघ परिवार के आक्रामक रवैये ने उनके दिल-दिमाग में यह आशंका जरूर पैदा कर दी है कि अगर आज सद्भावना दिखाते हुए उन्होंने अयोध्या की विवादित जमीन पर अपना दावा छोड़ दिया तो कल देश में उनकी दूसरी इबादतगाहों पर भी संघ परिवार इसी तरह अपना दावा जताने लगेगा। उनकी यह आशंका निराधार भी नहीं है, क्योंकि संघ परिवार ने ऐसे मामलों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार कर रखी है और उसके बगल-बच्चा संगठनों का यह नारा ‘अयोध्या तो झांकी है, मथुरा-काशी बाकी है’ न सिर्फ मुसलमानों को बल्कि देश के हर अमन और भाईचारा पसंद व्यक्ति को डराता है।

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी यह आशंका खत्म नहीं हुई है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट का फैसले पर प्रतिक्रिया जताते हुए संघ के सर संघचालक मोहन राव भागवत ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी है और कहा है कि किसी को भी इस फैसले को हार-जीत की तरह नहीं देखना चाहिए। उन्होंने सभी से अनुरोध किया कि वे इस फैसले पर संयमित और सात्विक तरीके से अपनी खुशी जाहिर करें और अतीत की सभी बातों को भुलाकर अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण में सहयोग करें। लेकिन इस सिलसिले में उन्होंने मथुरा और काशी के संबंध में पूछे जाने पर कोई स्पष्ट जवाब न देते हुए इतना ही कहा कि अयोध्या का मामला हमारे लिए एक अपवाद था, अन्यथा आंदोलन करना संघ का काम नहीं है।

लेकिन मोहन भागवत का यह बयान आश्वस्त नहीं कराता है कि संघ या उसके अनुषांगिक संगठन अब किसी और धार्मिक स्थल को लेकर कोई विवाद खड़ा नहीं करेंगे। राम मंदिर आंदोलन के दौरान संघ परिवार के कई नेताओं के आए बयानों और संघ के विभिन्न प्रकाशनों में छपे लेखों से साफ जाहिर हुआ है कि संघ परिवार का राम मंदिर अभियान उसकी उस व्यापक मानसिकता और मांगपत्र का हिस्सा रहा है, जिसके बाकी हिस्से कभी गोहत्या पर पाबंदी की मांग और गोरक्षा के नाम पर हिंसा, कभी धर्मांतरण रोकने के लिए कानून, कभी कथित लव जेहाद, कभी ईसाई मिशनरियों को देश निकाला देने की मुहिम, कभी गिरजाघरों, पादरियों और ननों पर हमले, कभी धार की भोजशाला हिंदुओं के सुपुर्द करने की मांग, कभी समान नागरिक संहिता की मांग, कभी स्कूलों और मदरसों में वंदे मातरम तथा सरस्वती वंदना का गायन अनिवार्य करने की मांग और कभी शहरों तथा सार्वजनिक स्थानों के नाम बदलने के हास्यास्पद उपक्रम के रूप में सामने आते हैं। इनमें से कोई एक मुहिम परिस्थितिवश कमजोर पड जाती है तो दूसरी को शुरू कर दिया जाता है।

बहरहाल यह संतोष की बात है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठनों तथा उनके नेताओं ने फैसले पर भले ही असंतोष जताया हो, लेकिन किसी ने भी उग्र प्रतिक्रिया नहीं दी है। किसी भी प्रमुख संगठन ने फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर करने की बात भी नहीं की है। कमोबेश सभी राजनीतिक दलों ने भी फैसले का स्वागत किया है। राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े नेताओं ने भी फैसले पर संयमित शब्दों में अपनी खुशी जताई है और दूसरे पक्ष को उकसाने वाली कोई बात नहीं की है। यही भावनाएं आगे भी कायम रहती हैं और कोई नया विवाद खड़ा नहीं होता है तो तमाम खामियों से युक्त और सवालों से घिरा होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक माना जाएगा।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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